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उत्तराखंडफीचर्ड

Uttarakhand: पौड़ी में गुलदार का आतंक बढ़ा: महिला की मौत के बाद भड़का जनआक्रोश, वन विभाग की जवाबदेही पर उठे सवाल

The Hill India News
Last updated: November 21, 2025 2:10 pm
The Hill India News
Published: November 21, 2025
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पौड़ी/गढ़वाल, 21नवंबर। उत्तराखंड के पौड़ी जिले में पिछले कुछ महीनों से वन्यजीवों की गतिविधियों में अप्रत्याशित वृद्धि ने ग्रामीणों का दैनिक जीवन कठिन बना दिया है। खासकर गुलदार (तेंदुआ) के लगातार बढ़ते हमलों ने पहाड़ी बस्तियों में भय का माहौल पैदा कर दिया है। शुक्रवार को खिर्सू ब्लॉक में घर के पास घात लगाए बैठे गुलदार ने एक महिला पर हमला कर उसे मौत के घाट उतार दिया। इस दर्दनाक घटना के बाद पूरे क्षेत्र में रोष फैल गया और ग्रामीणों ने विभाग की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराते हुए सड़क पर उतरकर जोरदार विरोध प्रदर्शन किया।

Contents
हाईवे पर विशाल प्रदर्शन, दो घंटे रुका यातायातग्रामीणों की मांगें: ‘हमलावर गुलदार को तुरंत मार गिराया जाए’मौके पर पहुंचे मुख्य विकास अधिकारी, किया संवादवन विभाग की भूमिका पर प्रश्नचिह्नगुलदार—पहाड़ों की बढ़ती चुनौतीग्रामीणों की दहशत: ‘शाम ढलते ही घरों से बाहर निकलना मुश्किल’प्रशासन ने दिए नए सुरक्षा निर्देशमानव–वन्यजीव संघर्ष पर व्यापक नीति की मांग

हाईवे पर विशाल प्रदर्शन, दो घंटे रुका यातायात

सुबह करीब आठ बजे से श्रीनगर–कोटद्वार राष्ट्रीय राजमार्ग पर सैकड़ों ग्रामीण इकट्ठा हो गए और सड़क को जाम कर विभाग की कार्यशैली के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी।
प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट कहा कि क्षेत्र में लगातार बढ़ रहे गुलदार के हमलों के बावजूद न वन विभाग की गश्त बढ़ाई गई और न ही गांवों के आसपास सुरक्षा उपाय। ग्रामीणों का कहना था कि यह मौत टाली जा सकती थी—यदि वन विभाग समय रहते उचित कदम उठाता।

प्रदर्शन के चलते लगभग दो घंटे तक राजमार्ग पर यातायात पूरी तरह बाधित रहा। श्रीनगर, कोटद्वार और देहरादून की ओर जाने वाले वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। बसों और एंबुलेंसों तक को इंतजार करना पड़ा। कई यात्रियों ने सोशल मीडिया पर वीडियो डालते हुए प्रशासन की धीमी प्रतिक्रिया पर सवाल उठाए।


ग्रामीणों की मांगें: ‘हमलावर गुलदार को तुरंत मार गिराया जाए’

आक्रोशित ग्रामीणों ने अपनी मांगों की सूची प्रशासन के सामने रखी। प्रमुख मांगें थीं—

  • हमलावर गुलदार को जल्द से जल्द ट्रैक कर मार गिराया जाए।
  • मृतक महिला के परिवार को तत्काल आर्थिक मुआवजा दिया जाए।
  • वन विभाग की रात्रि गश्त बढ़ाई जाए ताकि ग्रामीण सुरक्षित महसूस कर सकें।
  • गांवों के पास पिंजरे, ट्रैप कैमरे और निगरानी तंत्र को दोगुना किया जाए।
  • वन्यजीवों की गतिविधियों की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग व्यवस्था स्थापित की जाए।

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि पिछले छह महीनों में क्षेत्र में गुलदार दिखने की कई शिकायतें दर्ज हुईं, लेकिन विभाग की कार्रवाई सिर्फ कागजों में ही रही।


मौके पर पहुंचे मुख्य विकास अधिकारी, किया संवाद

प्रदर्शन की सूचना मिलते ही पौड़ी के मुख्य विकास अधिकारी (सीडीओ), स्थानीय थाना प्रभारी और वन विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे। सीडीओ ने ग्रामीणों के बीच जाकर संवाद स्थापित किया और घटना पर दुख व्यक्त करते हुए आश्वासन दिया कि—

  • सभी मांगों को तत्काल उच्चाधिकारियों तक भेजा जाएगा,
  • वन विभाग को आपातकालीन मोड में काम करने के निर्देश दिए जा रहे हैं,
  • और क्षेत्र में अतिरिक्त टीमें व ट्रैप कैमरे लगाए जाएंगे।

सीडीओ के हस्तक्षेप और लिखित आश्वासन के बाद ग्रामीणों ने करीब दो घंटे बाद जाम हटाया और सड़क को आवाजाही के लिए खोल दिया।


वन विभाग की भूमिका पर प्रश्नचिह्न

घटना के बाद वन विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। क्षेत्र के कई ग्रामीणों ने बताया—

  • पिछले दो महीनों में गुलदार कई बार गांवों के पास देखा गया,
  • मवेशियों के शिकार की घटनाएँ बढ़ीं,
  • रात के समय गुलदार की दहाड़ और आवाजों से लोग बेहद डरे हुए थे।

स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार शिकायत करने के बावजूद वन विभाग ने न तो कोई सर्वे किया, न क्षेत्र में औपचारिक चेतावनी जारी की। ग्रामीणों ने विभाग पर “घोर उदासीनता” का आरोप लगाया, जिसके कारण यह दुःखद घटना हुई।

वन विभाग के अधिकारियों ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि टीम को गांवों में निगरानी के लिए तैनात किया जा रहा है और हमलावर गुलदार की मूवमेंट को ट्रैक किया जा रहा है। विभाग ने यह भी संकेत दिया कि यदि जानलेवा खतरा साफ रूप से साबित होता है, तो “प्रॉब्लम एनिमल” घोषित कर उसे खत्म किया जा सकता है।


गुलदार—पहाड़ों की बढ़ती चुनौती

विशेषज्ञों के अनुसार, उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में गुलदार का मानव बस्तियों के नजदीक आना कई वजहों से बढ़ गया है—

  • वन क्षेत्रों में भोजन की कमी
  • जंगलों में पानी के प्राकृतिक स्रोतों का सूखना
  • शहरों और गांवों का तेजी से जंगलों की ओर विस्तार
  • मानव–वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में बढ़ोतरी

पौड़ी, चंपावत, बागेश्वर और टिहरी जिलों में पिछले एक वर्ष में कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जहां गुलदार ने अकेले, बच्चों या महिलाओं को निशाना बनाया।


ग्रामीणों की दहशत: ‘शाम ढलते ही घरों से बाहर निकलना मुश्किल’

खिर्सू ब्लॉक के कई गांवों में गुलदार का भय इतना अधिक है कि लोग अंधेरा होने के बाद घरों से बाहर कदम नहीं रखते। स्थानीय लोगों के अनुसार—

  • खेतों में काम कम हो गया है,
  • महिलाएँ अकेले जंगल नहीं जा पा रहीं,
  • बच्चों की स्कूल जाने की दिनचर्या प्रभावित है।

मृतक महिला का परिवार गहरे सदमे में है। गांव के लोगों का कहना है कि अब “सुरक्षा सुनिश्चित होने तक सामान्य जीवन संभव नहीं” है।


प्रशासन ने दिए नए सुरक्षा निर्देश

घटना के बाद प्रशासन ने निम्न निर्देश जारी किए हैं—

  1. गांवों के आसपास 10 से अधिक अतिरिक्त ट्रैप कैमरे लगाए जाएंगे।
  2. वन विभाग की टीम 24×7 पेट्रोलिंग करेगी।
  3. बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को अकेले न जाने की सलाह।
  4. ग्रामीणों के लिए हेल्पलाइन नंबर सक्रिय किए जाएंगे।
  5. हमलावर गुलदार की तलाश के लिए विशेष वन्यजीव रेस्क्यू टीम तैनात।

मानव–वन्यजीव संघर्ष पर व्यापक नीति की मांग

यह घटना फिर साबित करती है कि पर्वतीय प्रदेशों में मानव–वन्यजीव संघर्ष तेजी से बढ़ रहा है और सरकार को इस पर व्यापक व दीर्घकालिक नीति लाने की जरूरत है। विशेषज्ञ मानते हैं कि—

  • जंगलों में पानी और भोजन व्यवस्था सुधारना,
  • गांवों के पास सुरक्षा प्रकाश व्यवस्था,
  • वन क्षेत्रों में नियमित सर्वे,
  • और वन विभाग की त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली इस समस्या को कम करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

खिर्सू ब्लॉक में गुलदार के हमले में महिला की मौत केवल एक घटना नहीं, बल्कि पहाड़ों में लगातार बढ़ते डर और जंगलों के बदलते व्यवहार का संकेत है। ग्रामीणों का जाम और विरोध यह दर्शाता है कि लोगों का धैर्य जवाब देता जा रहा है और अब वे तत्काल व ठोस कदमों की मांग कर रहे हैं।

प्रशासन के आश्वासन से तनाव फिलहाल शांत हुआ है, लेकिन क्षेत्र में तब तक सामान्य स्थिति लौट पाना मुश्किल है—जब तक हमलावर गुलदार पकड़ा या मार गिराया नहीं जाता और ग्रामीणों को सुरक्षा की ठोस गारंटी नहीं मिलती।

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