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उत्तर प्रदेशफीचर्ड

नोएडा में मजदूरों का उबाल: कम वेतन, बढ़ती महंगाई और न्यूनतम मजदूरी को लेकर सड़क पर संघर्ष

The Hill India News
Last updated: April 13, 2026 10:32 am
The Hill India News
Published: April 13, 2026
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नोएडा में इन दिनों फैक्ट्री मजदूरों का गुस्सा खुलकर सड़कों पर दिखाई दे रहा है। हजारों की संख्या में मजदूर प्रदर्शन कर रहे हैं और कई जगहों पर पुलिस के साथ झड़प की खबरें भी सामने आई हैं। इस आंदोलन की जड़ में सबसे बड़ा मुद्दा है—कम वेतन, बढ़ती महंगाई और न्यूनतम मजदूरी के नियमों का सही तरीके से पालन न होना। मजदूरों का कहना है कि उन्हें जो वेतन मिल रहा है, वह न केवल उनकी जरूरतों के लिए अपर्याप्त है, बल्कि सरकार द्वारा तय न्यूनतम मजदूरी से भी कम है।

क्या है पूरा मामला?

नोएडा की कई फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूरों का आरोप है कि उन्हें महीने में केवल 10 से 11 हजार रुपये तक का वेतन दिया जा रहा है। कुछ मजदूरों ने यह भी बताया कि उन्हें रोजाना करीब 300 रुपये ही मिलते हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में मजदूरी 500 से 600 रुपये तक है। ऐसे में शहर में महंगाई के बीच इतना कम वेतन उनके लिए बेहद मुश्किल भरा हो गया है।

मजदूरों का यह भी कहना है कि कंपनियां उनसे 8 घंटे से ज्यादा काम करवाती हैं, लेकिन ओवरटाइम का पैसा नहीं दिया जाता। इसके अलावा कार्यस्थल पर व्यवहार को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं—जैसे गाली-गलौज और महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार।

मजदूरों की प्रमुख मांगें

प्रदर्शन कर रहे मजदूरों ने अपनी कई अहम मांगें रखी हैं। इनमें सबसे प्रमुख है कि उनका मासिक वेतन बढ़ाकर कम से कम 20 हजार रुपये किया जाए। इसके अलावा वे यह भी चाहते हैं कि रोजाना मजदूरी 600 रुपये से कम न हो। मजदूरों का कहना है कि सभी कंपनियों पर एक समान नियम लागू किया जाए और मजदूरी बढ़ाने का लिखित आश्वासन दिया जाए।

हरियाणा और गुरुग्राम का उदाहरण क्यों?

नोएडा के मजदूरों के आंदोलन को तेज करने में हरियाणा सरकार का हालिया फैसला एक बड़ा कारण बना है। हरियाणा सरकार ने न्यूनतम मजदूरी में लगभग 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है, जिसे 1 अप्रैल 2026 से लागू किया गया है। इस फैसले के बाद वहां के मजदूरों की सैलरी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

हरियाणा में अब अकुशल मजदूरों का वेतन लगभग 15,220 रुपये, अर्ध-कुशल मजदूरों का 16,780 रुपये और कुशल मजदूरों का करीब 18,500 रुपये हो गया है। ऐसे में नोएडा के मजदूर सवाल उठा रहे हैं कि जब पड़ोसी राज्य में मजदूरी बढ़ सकती है, तो उत्तर प्रदेश में क्यों नहीं?

न्यूनतम मजदूरी के नियम क्या कहते हैं?

भारत में न्यूनतम मजदूरी तय करने का अधिकार केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के पास होता है। श्रम मंत्रालय के अनुसार मजदूरी तय करते समय तीन मुख्य बातों का ध्यान रखा जाता है—काम का स्थान, मजदूर का अनुभव और उसका कौशल स्तर।

मजदूरों को चार श्रेणियों में बांटा गया है—अकुशल, अर्ध-कुशल, कुशल और अत्यधिक कुशल। हर श्रेणी के लिए अलग-अलग न्यूनतम मजदूरी निर्धारित होती है।

केंद्र सरकार द्वारा तय नई दरों के अनुसार अकुशल मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी 783 रुपये प्रतिदिन, अर्ध-कुशल के लिए 868 रुपये, कुशल के लिए 954 रुपये और अत्यधिक कुशल के लिए 1035 रुपये प्रतिदिन है। मजदूरों का कहना है कि उन्हें इससे काफी कम भुगतान किया जा रहा है, जो नियमों का उल्लंघन है।

क्यों बढ़ रहा है असंतोष?

महंगाई लगातार बढ़ रही है—खाने-पीने की चीजों से लेकर किराया, शिक्षा और स्वास्थ्य तक हर चीज महंगी हो चुकी है। ऐसे में कम वेतन में जीवनयापन करना मजदूरों के लिए कठिन होता जा रहा है। यही वजह है कि अब उनका धैर्य जवाब दे रहा है और वे अपने हक के लिए खुलकर आवाज उठा रहे हैं।

इसके अलावा मजदूरों को यह भी लगता है कि कंपनियां और प्रशासन उनकी समस्याओं को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। बार-बार मांग करने के बावजूद जब कोई समाधान नहीं निकला, तो उन्हें सड़कों पर उतरना पड़ा।

आगे क्या?

नोएडा में मजदूरों का यह आंदोलन केवल वेतन बढ़ाने की मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह श्रमिक अधिकारों, सम्मानजनक कार्यस्थल और कानून के पालन की लड़ाई भी बन गया है। अगर प्रशासन और कंपनियां समय रहते इस मुद्दे का समाधान नहीं निकालती हैं, तो यह आंदोलन और बड़ा रूप ले सकता है।

फिलहाल सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार इस मामले में क्या कदम उठाती है और क्या मजदूरों को उनकी मेहनत का सही मूल्य मिल पाता है या नहीं।

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