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Reading: कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026: लिपुलेख दर्रे के इस्तेमाल पर नेपाल की आपत्ति और भारत का रुख
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The Hill India > Blog > देश > कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026: लिपुलेख दर्रे के इस्तेमाल पर नेपाल की आपत्ति और भारत का रुख
देशफीचर्ड

कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026: लिपुलेख दर्रे के इस्तेमाल पर नेपाल की आपत्ति और भारत का रुख

The Hill India News
Last updated: May 4, 2026 2:31 pm
The Hill India News
Published: May 4, 2026
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PHOTO- Getty Images
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नई दिल्ली: भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026 को फिर से शुरू करने की घोषणा के बाद, नेपाल की बालेंद्र शाह सरकार ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। नेपाल का दावा है कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी उसके संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा हैं और भारत को यहां से होकर तीर्थयात्रा या किसी अन्य गतिविधि के संचालन से बचना चाहिए।

Contents
भारत की घोषणा और नेपाल का ऐतराजभारत का स्पष्ट रुख: विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रियालिपुलेख का सामरिक और ऐतिहासिक महत्व

इस पूरे विवाद के बीच, आइए जानते हैं कि आखिर इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि क्या है और इस पर भारत सरकार का रुख क्या है।


भारत की घोषणा और नेपाल का ऐतराज

दरअसल, भारत के विदेश मंत्रालय ने 30 अप्रैल को कैलाश मानसरोवर यात्रा 2026 को फिर से शुरू करने की घोषणा की है, जिसका संचालन जून से अगस्त के बीच किया जाएगा। इस यात्रा के तहत 50-50 तीर्थयात्रियों के दस बैच उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से होते हुए तिब्बत की यात्रा करेंगे।

इस घोषणा के तुरंत बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान जारी किया। बयान में कहा गया कि 1816 की सुगौली संधि के अनुसार लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी (जो कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित हैं) नेपाल का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। नेपाल का कहना है कि उसने राजनयिक माध्यमों से भारत और चीन दोनों को अपनी चिंताओं से अवगत करा दिया है और मांग की है कि इस क्षेत्र में किसी भी तरह की व्यापारिक या तीर्थयात्रा संबंधी गतिविधि न की जाए।


भारत का स्पष्ट रुख: विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया

नेपाल की इस आपत्ति पर भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने प्रेस ब्रीफिंग में भारत का रुख बहुत स्पष्ट और पारदर्शी रखा है। प्रवक्ता ने कहा:

“इस बारे में भारत का रुख एक जैसा और साफ रहा है। लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का एक पारंपरिक रास्ता रहा है और इस रास्ते से यात्रा दशकों से होती आ रही है। यह कोई नई बात नहीं है। जहां तक ​​इलाके के दावों की बात है, भारत ने हमेशा कहा है कि ऐसे दावे न तो सही हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित हैं। इलाके के दावों को इस तरह एकतरफा तरीके से बढ़ाना सही नहीं है।”

विदेश मंत्रालय ने यह भी जोड़ा कि भारत नेपाल के साथ सभी द्विपक्षीय मुद्दों पर रचनात्मक बातचीत और कूटनीति के माध्यम से समाधान निकालने के लिए हमेशा तैयार है।


लिपुलेख का सामरिक और ऐतिहासिक महत्व

लिपुलेख दर्रा हिमालय की ऊंचाइयों पर स्थित एक महत्वपूर्ण दर्रा है। यह भारत के उत्तराखंड, नेपाल और चीन के बीच एक त्रिकोणीय जंक्शन (Tri-junction) का कार्य करता है।

  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1954 से ही भारतीय श्रद्धालु लिपुलेख पास के रास्ते से कैलाश मानसरोवर की यात्रा करते आ रहे हैं।

  • 1962 के बाद की स्थिति: 1962 के बाद से इस क्षेत्र पर भारतीय सुरक्षा बलों का पूर्ण नियंत्रण रहा है और भारत के पास इसके ऐतिहासिक और प्रशासनिक प्रमाण भी मौजूद हैं।

  • भारत और चीन के समझौते: 2015 में भारत और चीन ने लिपुलेख को व्यापार और यात्रा के लिए खोलने पर सहमति व्यक्त की थी, जिसमें नेपाल शामिल नहीं था। इसके बाद 2025 में भी दोनों देशों के बीच इसे दोबारा खोलने पर सहमति बनी, जिस पर नेपाल ने अपनी नाराजगी व्यक्त की थी। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने यह मुद्दा चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के समक्ष भी उठाया था, लेकिन इसका कोई ठोस समाधान नहीं निकला।

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