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बंगाल चुनाव 2026: 91 लाख नामों की ‘सफाई’ ने कैसे पलट दिया सियासी खेल, SIR बना सबसे बड़ा फैक्टर?

The Hill India News
Last updated: May 4, 2026 8:29 am
The Hill India News
Published: May 4, 2026
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने राज्य की राजनीति में बड़ा भूचाल ला दिया है। करीब डेढ़ दशक से सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस (TMC) को इस बार जिस तरह कड़ी चुनौती मिली, उसने राजनीतिक विश्लेषकों को भी चौंका दिया। चुनाव परिणाम आने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा जिस मुद्दे पर हो रही है, वह है निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव से पहले किया गया विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision)। इस प्रक्रिया के दौरान राज्य की मतदाता सूची से करीब 91 लाख नाम हटाए गए थे। अब यही दावा किया जा रहा है कि इस “सफाई अभियान” ने बंगाल की राजनीति का पूरा समीकरण बदल दिया।

निर्वाचन आयोग के अनुसार, मतदाता सूची से हटाए गए नामों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी जिनके नाम दो जगह दर्ज थे, जिनकी मृत्यु हो चुकी थी या जो लंबे समय से संबंधित क्षेत्र में रह ही नहीं रहे थे। हालांकि विपक्षी दलों ने इस कार्रवाई को लोकतंत्र को मजबूत करने वाला कदम बताया, जबकि टीएमसी ने इसे राजनीतिक साजिश करार दिया। लेकिन चुनाव परिणामों ने इस बहस को और तेज कर दिया है।

सबसे ज्यादा नाम जिन जिलों से हटाए गए, उनमें मुर्शिदाबाद, मालदा, उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना और नदिया शामिल हैं। ये वही इलाके हैं जिन्हें लंबे समय से टीएमसी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। दिलचस्प बात यह रही कि इन क्षेत्रों में इस बार बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को अप्रत्याशित बढ़त मिली। कई सीटों पर जीत-हार का अंतर बेहद कम रहा, जबकि मतदाता सूची से हटाए गए नामों की संख्या हजारों में थी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यही बदलाव चुनावी परिणामों का निर्णायक कारण बना।

विश्लेषकों के मुताबिक बंगाल की कई विधानसभा सीटों पर हार-जीत का अंतर सामान्य तौर पर 2 हजार से 5 हजार वोटों के बीच रहता है। ऐसे में अगर किसी सीट पर 20 से 25 हजार नाम हटते हैं, तो उसका सीधा असर चुनाव परिणाम पर पड़ना तय है। यही कारण है कि इस बार कई ऐसी सीटें, जहां टीएमसी लगातार जीतती रही थी, वहां विपक्ष ने बढ़त बना ली।

बीजेपी का आरोप लंबे समय से रहा है कि बंगाल में “फर्जी वोटिंग” और “डुप्लीकेट वोटर” चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करते रहे हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि SIR ने पहली बार वोटर लिस्ट को पारदर्शी बनाया और असली मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित की। उनका दावा है कि जैसे ही कथित फर्जी नाम हटे, कई सीटों पर वास्तविक जनादेश सामने आ गया। बीजेपी इसे “लोकतंत्र की सफाई” और “जनादेश की वापसी” बता रही है।

दूसरी ओर, टीएमसी ने इस पूरे अभियान पर सवाल उठाए हैं। पार्टी का कहना है कि बड़ी संख्या में गरीब, प्रवासी और अल्पसंख्यक समुदाय के वैध मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, जिससे चुनाव प्रभावित हुआ। टीएमसी नेताओं का आरोप है कि निर्वाचन आयोग ने निष्पक्षता नहीं बरती और विपक्ष के दबाव में काम किया। हालांकि आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पूरी प्रक्रिया तय नियमों और दस्तावेजी सत्यापन के आधार पर की गई थी।

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि बंगाल चुनाव 2026 केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं है, बल्कि यह चुनावी प्रबंधन और मतदाता सूची की शुद्धता के महत्व को भी दर्शाता है। कई दशकों से जिन क्षेत्रों में एकतरफा वोटिंग पैटर्न देखने को मिलता था, वहां इस बार बड़ा बदलाव दर्ज किया गया। बूथ स्तर पर वोटिंग प्रतिशत और परिणामों के आंकड़े बताते हैं कि जहां ज्यादा नाम हटे, वहां सत्ता पक्ष को अधिक नुकसान हुआ।

इस चुनाव ने यह भी साबित कर दिया कि मतदाता सूची केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि चुनावी राजनीति का सबसे अहम आधार है। 91 लाख नामों की “सफाई” ने बंगाल की राजनीति में ऐसा असर डाला, जिसकी कल्पना शायद किसी ने नहीं की थी। अब आने वाले दिनों में यह बहस और तेज होने वाली है कि क्या SIR वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करने वाला कदम था या फिर यह केवल एक राजनीतिक हथियार बन गया। लेकिन इतना तय है कि बंगाल चुनाव 2026 में SIR सबसे बड़ा और सबसे चर्चित फैक्टर बनकर उभरा है।

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