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चमोली में छलके जाम ने तोड़े राजस्व के रिकॉर्ड: ₹92.84 करोड़ की रिकॉर्ड तोड़ बिक्री, पहाड़ के सामाजिक ताने-बाने पर मंडराता खतरा

The Hill India News
Last updated: April 3, 2026 1:42 pm
The Hill India News
Published: April 3, 2026
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चमोली। देवभूमि उत्तराखंड के सीमांत जनपद चमोली से एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया है। शांत वादियों और धार्मिक पर्यटन के लिए विख्यात इस पहाड़ी जिले में इस वर्ष शराब की खपत ने पिछले तमाम रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। आबकारी विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2025-26 में जिले के भीतर शराब की बिक्री का ग्राफ अपनी उच्चतम सीमा को पार कर गया है, जिससे सरकारी खजाने में भारी राजस्व जमा हुआ है। हालांकि, आर्थिक दृष्टिकोण से विभाग के लिए यह बड़ी उपलब्धि हो सकती है, लेकिन जनमानस में इसे लेकर बहस छिड़ गई है।

Contents
राजस्व का नया कीर्तिमान: आंकड़ों की जुबानीविभागीय स्पष्टता और नियमबद्धताआर्थिक लाभ बनाम सामाजिक क्षति: एक गंभीर विमर्शसरकारी रणनीति और जन सरोकार

राजस्व का नया कीर्तिमान: आंकड़ों की जुबानी

आबकारी विभाग से प्राप्त आधिकारिक जानकारी के अनुसार, चमोली में शराब की बिक्री ने इस बार ₹92.84 करोड़ का जादुई आंकड़ा छू लिया है। यह अब तक के इतिहास में जिले से प्राप्त होने वाला सबसे अधिक राजस्व है। विभाग की इस “सफलता” ने नीति नियंताओं को भविष्य के लिए और भी बड़े लक्ष्य निर्धारित करने के लिए प्रोत्साहित किया है।

विभागीय रणनीतियों और वर्तमान उपभोग की प्रवृत्ति को देखते हुए, आगामी वर्षों के लिए लक्ष्य को और भी ऊंचा रखा गया है:

  • वित्तीय वर्ष 2026-27: ₹99 करोड़ का राजस्व लक्ष्य।

  • वित्तीय वर्ष 2027-28: ₹103 करोड़ का महत्वाकांक्षी लक्ष्य।

ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि सरकार और आबकारी विभाग शराब को राजस्व प्राप्ति के सबसे प्रमुख और सुगम स्रोत के रूप में देख रहे हैं।

विभागीय स्पष्टता और नियमबद्धता

रिकॉर्ड बिक्री और भविष्य के लक्ष्यों पर प्रतिक्रिया देते हुए जिला आबकारी अधिकारी लक्ष्मण बिष्ट ने कहा कि जिले में राजस्व प्राप्ति की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और नियमानुसार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जिले की सभी मदिरा दुकानें निर्धारित मानकों के तहत संचालित की जा रही हैं। अधिकारी के अनुसार, विभाग की ओर से किसी भी प्रकार की वित्तीय देयता शेष नहीं है, जो एक सुदृढ़ प्रबंधन को दर्शाता है।

लेकिन यहाँ एक विरोधाभास भी देखने को मिलता है। एक तरफ प्रशासन रिकॉर्ड बिक्री पर अपनी पीठ थपथपा रहा है, वहीं दूसरी ओर चमोली के ही कई गांवों में मातृशक्ति और स्थानीय पंचायतों के कड़े संघर्ष के बाद शराबबंदी लागू की गई है। राजस्व की यह “ऊंची छलांग” उन क्षेत्रों के संघर्ष पर भी सवाल खड़े करती है जहाँ लोग नशामुक्त समाज की मांग कर रहे हैं।

आर्थिक लाभ बनाम सामाजिक क्षति: एक गंभीर विमर्श

चमोली जैसे दुर्गम और संवेदनशील पहाड़ी जिले में चमोली में शराब की बिक्री के ये आंकड़े केवल सरकारी फाइलों की चमक नहीं बढ़ा रहे, बल्कि सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों के माथे पर चिंता की लकीरें भी खींच रहे हैं।

पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियाँ कठिन हैं और यहाँ की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कृषि, पर्यटन और सेना में रोजगार पर टिकी है। ऐसे में करोड़ों रुपए का शराब में बह जाना एक बड़े आर्थिक संकट की ओर इशारा करता है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि शराब की बढ़ती उपलब्धता और खपत सीधे तौर पर निम्न प्रभावों को जन्म दे रही है:

  1. पारिवारिक संरचना का बिखरना: अत्यधिक शराब के सेवन से घरेलू हिंसा के मामलों में वृद्धि और परिवारों की आर्थिक स्थिति बदहाल होने की खबरें अक्सर ग्रामीण अंचलों से आती रहती हैं।

  2. युवाओं का भविष्य अधर में: सुलभ उपलब्धता के कारण युवा पीढ़ी नशे के जाल में फंस रही है, जिससे उनकी कार्यक्षमता और स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।

  3. सांस्कृतिक क्षरण: देवभूमि की अपनी एक विशिष्ट मर्यादा है। शराब की इस बढ़ती संस्कृति को स्थानीय लोक संस्कृति और परंपराओं के लिए खतरा माना जा रहा है।

सरकारी रणनीति और जन सरोकार

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार की राजस्व बढ़ाने की होड़ और सामाजिक दुष्परिणामों के बीच एक गहरी खाई बन गई है। जब लक्ष्य ₹100 करोड़ के पार जाने की तैयारी में हो, तो यह स्वाभाविक है कि शराब की पहुंच और बिक्री को बढ़ावा देने वाली नीतियों पर जोर दिया जाएगा। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या राजस्व का यह लाभ, समाज को होने वाली मानसिक और शारीरिक क्षति की भरपाई कर पाएगा?

पहाड़ी क्षेत्रों में सड़कों, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी आज भी एक मुद्दा है। ऐसे में शराब की रिकॉर्ड बिक्री से मिलने वाले करोड़ों रुपए का उपयोग क्या इन्हीं क्षेत्रों के पुनर्वास या नशा मुक्ति केंद्रों के संचालन में होगा? यह एक ऐसा सवाल है जिसका उत्तर आम जनता शासन से चाहती है।

चमोली में शराब की रिकॉर्ड तोड़ बिक्री ने एक तरफ आबकारी विभाग को खुश होने का अवसर दिया है, तो दूसरी तरफ समाज के एक बड़े वर्ग को आत्ममंथन के लिए मजबूर कर दिया है। ₹92.84 करोड़ का यह आंकड़ा महज एक संख्या नहीं है, बल्कि यह पहाड़ की बदलती जीवनशैली और भविष्य की चुनौतियों का प्रतिबिंब है।

आगामी वित्तीय वर्षों के लिए निर्धारित किए गए भारी-भरकम लक्ष्य यह संकेत देते हैं कि आने वाले समय में शराब की यह “गंगा” और भी वेग से बहेगी। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार राजस्व की इस भूख और समाज के स्वास्थ्य के बीच संतुलन कैसे बनाती है।

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