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उत्तराखंड: पत्नी की सरकारी नौकरी के बावजूद पति नहीं बच सकता जिम्मेदारी से, बच्चे के भरण-पोषण के लिए हर महीने 8,000 रुपये देने का हाईकोर्ट का आदेश

The Hill India News
Last updated: April 22, 2026 6:41 am
The Hill India News
Published: April 22, 2026
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नैनीताल: उत्तराखंड हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि अगर पत्नी सरकारी नौकरी में है और उसकी आय अच्छी है, तब भी पिता अपने नाबालिग बच्चे की जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकता। अदालत ने कहा कि बच्चे का भरण-पोषण करना दोनों माता-पिता की जिम्मेदारी है, लेकिन इससे पिता की प्राथमिक जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। कोर्ट ने यह भी कहा कि आर्थिक कारणों या अन्य पारिवारिक दायित्वों का हवाला देकर कोई भी पिता अपने बच्चे के अधिकारों से मुंह नहीं मोड़ सकता।

यह मामला रुड़की परिवार न्यायालय के एक आदेश से जुड़ा हुआ था, जिसमें एक व्यक्ति को अपने बच्चे के लिए हर महीने 8,000 रुपये अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए संबंधित व्यक्ति ने हाई कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।

न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 एक सामाजिक न्याय का प्रावधान है, जिसका मुख्य उद्देश्य आश्रितों—विशेषकर बच्चों—को आर्थिक तंगी और अभाव से बचाना है। अदालत ने कहा कि इस कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी बच्चा अपने माता-पिता की लापरवाही के कारण बुनियादी सुविधाओं से वंचित न रहे।

मामले में याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि वह स्वयं केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) में कार्यरत है और उसकी पत्नी केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) में नौकरी करती है। उसने यह भी कहा कि उसके माता-पिता भी सरकारी सेवा में हैं और उस पर परिवार के अन्य सदस्यों की जिम्मेदारी के साथ-साथ लोन चुकाने का दबाव भी है। ऐसे में बच्चे के भरण-पोषण का पूरा बोझ उस पर डालना उचित नहीं है।

हालांकि, अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि लोन चुकाना या परिवार के अन्य सदस्यों की आर्थिक मदद करना व्यक्ति की स्वैच्छिक जिम्मेदारियां हैं, लेकिन बच्चे का भरण-पोषण एक कानूनी और नैतिक कर्तव्य है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी दोहराया कि बच्चे का अधिकार सर्वोपरि है और किसी भी अन्य वित्तीय दायित्व को उससे ऊपर नहीं रखा जा सकता।

अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि भले ही मां की आय एक महत्वपूर्ण कारक हो सकती है, लेकिन इससे पिता की जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती। बच्चे को अपने माता-पिता के समान जीवन स्तर पाने का अधिकार है और यह सुनिश्चित करना दोनों की जिम्मेदारी है। ऐसे में केवल यह कह देना कि मां कमाती है, पर्याप्त नहीं है कि पिता अपनी भूमिका से पीछे हट जाए।

कोर्ट ने आगे कहा कि समाज में कई बार ऐसे मामले सामने आते हैं, जहां पिता अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए विभिन्न प्रकार के आर्थिक कारणों का हवाला देते हैं। लेकिन कानून इस तरह के रवैये को स्वीकार नहीं करता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 125 CrPC का उद्देश्य ही यह है कि कोई भी आश्रित—चाहे वह बच्चा हो, पत्नी हो या माता-पिता—आर्थिक रूप से असहाय न रहे।

फैसले में यह भी निर्देश दिया गया कि 8,000 रुपये प्रति माह की यह राशि मूल आवेदन दाखिल करने की तारीख से ही देय होगी। यानी संबंधित व्यक्ति को बकाया राशि भी चुकानी होगी। अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों में देरी या टालमटोल बच्चे के हितों को प्रभावित करती है, जिसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

यह फैसला न केवल एक कानूनी मिसाल के रूप में देखा जा रहा है, बल्कि समाज के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि माता-पिता की जिम्मेदारियां किसी भी परिस्थिति में कम नहीं होतीं। खासकर जब बात बच्चों के भविष्य और उनके अधिकारों की हो, तो कानून पूरी सख्ती के साथ उनके पक्ष में खड़ा होता है।

इस निर्णय से यह साफ हो गया है कि चाहे पत्नी आर्थिक रूप से सक्षम क्यों न हो, पिता को अपने बच्चे की परवरिश में आर्थिक योगदान देना ही होगा। अदालत का यह रुख बच्चों के अधिकारों की रक्षा और पारिवारिक जिम्मेदारियों को सुनिश्चित करने की दिशा में एक मजबूत कदम माना जा रहा है।

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