देहरादून/हरिद्वार। उत्तराखंड के जंगलों से एक बेहद चिंताजनक और विचलित करने वाली खबर सामने आ रही है। राजाजी टाइगर रिजर्व और कॉर्बेट नेशनल पार्क के बफर जोन से सटे हरिद्वार वन प्रभाग (हरिद्वार डिवीजन) में दो युवा बाघों के संदिग्ध शिकार के मामले ने वन महकमे, राज्य सरकार और देश की वन्यजीव संरक्षण एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। दो बाघों के शव मिलने और एक बाघिन के रहस्यमय तरीके से लापता होने के बाद पूरे सूबे में हड़कंप मच गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के निर्देश पर अब न केवल हरिद्वार बल्कि राजधानी देहरादून और उससे सटी तमाम संवेदनशील वन रेंजों में ‘हाई अलर्ट’ जारी कर दिया गया है।
वन विभाग की दर्जनों एंटी-पोचिंग टीमें (Anti-Poaching Squads) सघन जंगलों के भीतर कॉम्बिंग और सर्च ऑपरेशन चला रही हैं। इस पूरे मामले के तार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय संगठित वन्यजीव तस्कर और शिकारी गिरोह (Organized Poaching Syndicate) से जुड़े होने की आशंका जताई जा रही है। इसी कड़ी में कार्रवाई करते हुए वन विभाग ने जंगलों में रहने वाले गुर्जरों के डेरों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की है, जिसमें से संलिप्तता के आरोप में एक संदिग्ध को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि उसका दूसरा मुख्य सहयोगी फिलहाल फरार चल रहा है।
हरिद्वार में दो बाघों की मौत और एक बाघिन लापता, दहल उठा महकमा
यह पूरा सनसनीखेज मामला तब प्रकाश में आया जब हरिद्वार वन प्रभाग के घने जंगलों से दो युवा बाघों के क्षत-विक्षत शव बरामद किए गए। वन्यजीव विशेषज्ञों और फॉरेंसिक डॉक्टरों की शुरुआती जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, वे सीधे तौर पर अवैध शिकार (Poaching) की ओर इशारा कर रहे हैं। बाघों के अंगों की अंतरराष्ट्रीय ब्लैक मार्केट में भारी मांग को देखते हुए आशंका है कि इन्हें सुनियोजित तरीके से जहर देकर या फंदा (Snare) लगाकर मारा गया है।
इस मामले ने तब और भयानक रूप ले लिया जब विभागीय गणना और मॉनिटरिंग के आधार पर यह पता चला कि क्षेत्र में सक्रिय एक अन्य वयस्क बाघिन भी अपने टेरिटरी से लापता है। इस लापता बाघिन की खोज के लिए ड्रोन कैमरों और ट्रैप कैमरों की मदद ली जा रही है, लेकिन अब तक उसका कोई सुराग नहीं मिल पाया है। वन अधिकारियों को डर है कि कहीं वह भी इस खूंखार शिकारी गिरोह का शिकार न बन गई हो।
देहरादून डिवीजन में सघन चेकिंग: ऋषिकेश से विकासनगर तक कॉम्बिंग
पकड़े गए आरोपी से हुई शुरुआती पूछताछ के बाद वन विभाग को पुख्ता इनपुट मिले हैं कि फरार शिकारी देहरादून वन प्रभाग के किसी दुर्गम इलाके में छिपा हो सकता है। यही वजह है कि देहरादून के जंगलों में बड़े पैमाने पर नाकेबंदी और सघन चेकिंग अभियान शुरू कर दिया गया है।
चुनौतीपूर्ण है देहरादून डिवीजन की भौगोलिक स्थिति भौगोलिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से देहरादून वन प्रभाग का क्षेत्र बेहद विस्तृत और संवेदनशील माना जाता है। यह पूरा इलाका ऋषिकेश से शुरू होकर सुदूर विकासनगर और कालसी तक फैला हुआ है, जिसकी भौगोलिक सीमाएं सीधे राजाजी टाइगर रिजर्व (Rajaji Tiger Reserve) के कोर एरिया से मेल खाती हैं। यही कारण है कि इस पूरे कॉरिडोर में साल भर बाघों, एशियाई हाथियों, गुलदारों (Leopards) और किंग कोबरा जैसे अति-संवेदनशील वन्यजीवों की निरंतर आवाजाही बनी रहती है।
इसके अतिरिक्त, देहरादून और हरिद्वार डिवीजन के जंगलों के भीतर बड़ी संख्या में गुर्जर परिवार अपने पारंपरिक डेरों में निवास करते हैं। घने जंगलों के बीच इन डेरों की मौजूदगी के कारण बाहरी और संदिग्ध तत्वों की पहचान करना वन विभाग के लिए हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। फिलहाल वन विभाग की विशेष टीमें इन डेरों के आसपास मैनुअल इंटेलिजेंस और मुखबिर तंत्र को मजबूत करने में जुटी हैं।
ऋषिकेश रेंज पर विशेष नजर: गश्त और रात्रि निगरानी हुई दोगुनी
वन्यजीव गणना के आंकड़ों के अनुसार, देहरादून डिवीजन के ऋषिकेश वन क्षेत्र में वर्तमान में कम से कम एक बाघ और एक बाघिन की नियमित रूप से सक्रिय मौजूदगी दर्ज की गई है। इसके साथ ही यह इलाका हाथियों के माइग्रेशन कॉरिडोर का भी एक मुख्य हिस्सा है। ऐसे नाजुक समय में वन विभाग किसी भी प्रकार का जोखिम उठाने या ढिलाई बरतने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
उच्चाधिकारियों ने सभी संबंधित रेंज अधिकारियों (RO), वन दरोगाओं और वन रक्षकों को अपने-अपने क्षेत्रों में चौबीस घंटे गश्त बढ़ाने के सख्त निर्देश दिए हैं। विशेष रूप से सूर्यास्त के बाद, यानी रात के समय की पेट्रोलिंग को दोगुना कर दिया गया है, क्योंकि अमूमन शिकारी अंधेरे का फायदा उठाकर ही अपनी अवैध गतिविधियों को अंजाम देते हैं। जंगलों के भीतर जाने वाले सभी कच्चे-पक्के रास्तों, नदी-नालों और बार्डर चेकपोस्ट्स पर वन कर्मियों की तैनाती बढ़ा दी गई है।
किसी भी स्तर पर अवैध गतिविधि बर्दाश्त नहीं: डीएफओ नीरज शर्मा
इस पूरे मामले और वन विभाग की मुस्तैदी पर बात करते हुए देहरादून के प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) नीरज शर्मा ने मीडिया को बताया कि विभाग वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
डीएफओ नीरज शर्मा का आधिकारिक बयान: “वन विभाग की ओर से सामान्य दिनों में भी लगातार पेट्रोलिंग और सुरक्षात्मक गश्त की जाती है। लेकिन पड़ोसी हरिद्वार प्रभाग में सामने आए बाघों के शिकार के इस गंभीर मामले के बाद हमने अतिरिक्त सतर्कता बरतनी शुरू कर दी है। देहरादून प्रभाग के सभी संबंधित फील्ड अधिकारियों और फील्ड स्टाफ को 24/7 हाई अलर्ट पर रखा गया है। जंगलों के संवेदनशील पॉकेट्स में कॉम्बिंग ऑपरेशन जारी है। हमने यह साफ कर दिया है कि वनों या वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाने वाली किसी भी तरह की संदिग्ध या अवैध गतिविधि पाए जाने पर दोषियों के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (Wildlife Protection Act) की संगीन धाराओं के तहत तत्काल और कठोरतम कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।”
पर्यावरणीय संतुलन के लिए बड़ा खतरा है ‘टार्गेटेड पोचिंग’
उत्तराखंड का संपूर्ण वन क्षेत्र देश के सबसे महत्वपूर्ण और जीवनदायी ‘टाइगर कॉरिडोर’ का हिस्सा माना जाता है। यह कॉरिडोर कॉर्बेट से लेकर राजाजी और पड़ोसी राज्यों के जंगलों को आपस में जोड़ता है, जिससे बाघों की आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) बनी रहती है। ऐसे में यदि राज्य के भीतर संगठित शिकार की घटनाएं दोबारा सिर उठाने लगेंगी, तो यह न केवल पिछले दो दशकों में किए गए बाघ संरक्षण के प्रयासों को मिट्टी में मिला देगा, बल्कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र (Eco-system) और पर्यावरणीय संतुलन के लिए भी एक अत्यंत गंभीर चुनौती बन जाएगा।
फिलहाल, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) और वाइल्डलाइफ क्राइम कंट्रोल ब्यूरो (WCCB) की टीमें भी इस मामले पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का मानना है कि आने वाले दिनों में जैसे ही फरार मुख्य आरोपी की गिरफ्तारी होगी, इस पूरे इंटरनेशनल पोचिंग नेटवर्क और वन्यजीवों के अंगों की तस्करी करने वाले बड़े चेहरों का सनसनीखेज पर्दाफाश हो सकता है।



