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दिल्ली हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी: “पूरी तरह गलत है यह जनहित याचिका”, केजरीवाल-सिसोदिया को चुनाव लड़ने से रोकने की मांग खारिज

The Hill India News
Last updated: May 20, 2026 10:35 am
The Hill India News
Published: May 20, 2026
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राजधानी दिल्ली में आम आदमी पार्टी और उसके शीर्ष नेताओं को लेकर दायर की गई एक जनहित याचिका पर दिल्ली हाई कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताते हुए उसे खारिज कर दिया। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि यह याचिका पूरी तरह गलतफहमी पर आधारित है और इसमें कोई कानूनी आधार नजर नहीं आता। याचिका में आम आदमी पार्टी का पंजीकरण रद्द करने और पार्टी के प्रमुख नेताओं अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया तथा दुर्गेश पाठक को चुनाव लड़ने से रोकने की मांग की गई थी।

मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कई महत्वपूर्ण सवाल पूछे। अदालत ने सबसे पहले यह जानना चाहा कि क्या चुनाव आयोग के पास किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने का कोई स्पष्ट कानूनी अधिकार मौजूद है। इस पर याचिकाकर्ता की ओर से स्वीकार किया गया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं दिया गया है, जिसके आधार पर किसी राजनीतिक दल को केवल आरोपों के आधार पर डीरजिस्टर किया जा सके।

इसके बाद अदालत ने और भी सख्त रुख अपनाते हुए पूछा कि यदि किसी राजनीतिक दल के कुछ नेताओं के आचरण पर आपत्ति है, तो उससे पूरे दल का पंजीकरण रद्द करने का आधार कैसे बन सकता है। कोर्ट ने कहा कि किसी पार्टी के नेताओं पर लगाए गए आरोपों और पार्टी के संगठनात्मक अस्तित्व के बीच स्पष्ट कानूनी संबंध होना चाहिए, जो इस याचिका में दिखाई नहीं देता।

याचिकाकर्ता का मुख्य आरोप यह था कि आबकारी नीति मामले की सुनवाई के दौरान अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार किया और बाद में प्रेस वार्ता कर न्यायिक प्रक्रिया का अपमान किया। इसी को आधार बनाकर याचिका में कहा गया कि नेताओं का यह आचरण संविधान और न्यायपालिका के खिलाफ है, इसलिए उन्हें चुनाव लड़ने से रोका जाना चाहिए।

हालांकि हाई कोर्ट ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यदि किसी व्यक्ति द्वारा अदालत की अवमानना की जाती है, तो उसके लिए अलग कानून मौजूद है और कार्रवाई भी उसी कानून के तहत होती है। कोर्ट ने कहा कि अवमानना का मामला स्वतः किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से अयोग्य नहीं बनाता। इसके लिए अलग कानूनी प्रावधान और उचित प्रक्रिया आवश्यक होती है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी पूछा कि आखिर किस कानून के तहत नेताओं को चुनाव लड़ने से अयोग्य घोषित करने की मांग की जा रही है। कोर्ट ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में ऐसा कोई कानूनी आधार नहीं बनता, जिसके जरिए अदालत इस प्रकार का आदेश जारी करे। पीठ ने दो टूक कहा कि केवल आरोपों या राजनीतिक असहमति के आधार पर किसी निर्वाचित नेता को चुनावी प्रक्रिया से बाहर नहीं किया जा सकता।

यह पूरा मामला उस विवाद से जुड़ा है, जिसमें आबकारी नीति मामले की सुनवाई जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत में चल रही थी। आरोप लगाया गया था कि संबंधित नेताओं ने अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार किया था। इसी घटना को आधार बनाकर यह जनहित याचिका दायर की गई थी।

दिल्ली हाई कोर्ट के इस फैसले को कानूनी विशेषज्ञ लोकतांत्रिक व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण मान रहे हैं। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि किसी भी राजनीतिक दल या नेता के खिलाफ कार्रवाई केवल ठोस कानूनी आधार और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही हो सकती है। बिना पर्याप्त कानूनी प्रावधानों के केवल आरोपों के आधार पर चुनाव लड़ने के अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता।

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