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GST-RERA डेटा बना हथियार: लॉरेंस बिश्नोई गैंग का डिजिटल एक्सटॉर्शन नेटवर्क, देशभर के कारोबारियों पर मंडराया खतरा

नई दिल्ली/भोपाल: संगठित अपराध का चेहरा तेजी से बदल रहा है और अब यह सिर्फ हथियारों या गैंगवार तक सीमित नहीं रहा। ताजा जांच में सामने आया है कि कुख्यात लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने एक अत्याधुनिक डिजिटल एक्सटॉर्शन नेटवर्क खड़ा कर लिया है, जहां डर पैदा करने के लिए बंदूक से पहले डेटा का इस्तेमाल किया जा रहा है। सरकारी पोर्टलों पर उपलब्ध जानकारी—जैसे GST और RERA—को खंगालकर कारोबारियों को निशाना बनाया जा रहा है और फिर एन्क्रिप्टेड ऐप्स के जरिए उनसे करोड़ों रुपये की फिरौती मांगी जा रही है।

जांच एजेंसियों के अनुसार, यह कोई बेतरतीब अपराध नहीं बल्कि पूरी तरह सुनियोजित ऑपरेशन है। पहले संभावित टारगेट की पहचान की जाती है, फिर उसके कारोबार, टर्नओवर, परिवार और नेटवर्क की पूरी प्रोफाइल तैयार की जाती है। इसके बाद शुरू होता है धमकी और वसूली का खेल। इस नेटवर्क का दायरा इतना बड़ा है कि मध्य प्रदेश के अलावा इंदौर, भोपाल, अशोकनगर, महू और यहां तक कि मुंबई व गुजरात के कारोबारी भी इसके निशाने पर रहे हैं।

इस पूरे ऑपरेशन का एक अहम चेहरा उज्जैन का राजपाल सिंह चंद्रावत बताया जा रहा है, जो खरगोन के कपास व्यापारी दिलीप राठौर से 10 करोड़ रुपये की रंगदारी मांगने के मामले में सामने आया। जांच में यह भी खुलासा हुआ कि राजपाल का मकसद सिर्फ वसूली नहीं था, बल्कि वह इस पैसे से अपना खुद का बिजनेस साम्राज्य खड़ा करना चाहता था। सीमित संसाधनों और कम टर्नओवर के कारण जब उसे बड़े कॉरपोरेट कॉन्ट्रैक्ट नहीं मिल सके, तो उसने अपराध का रास्ता चुना।

जांच एजेंसियों का कहना है कि इस नेटवर्क का सबसे खतरनाक पहलू टारगेट चुनने का तरीका है। गैंग के सदस्य—जिनमें कई नाबालिग और स्कूल ड्रॉपआउट शामिल हैं—सरकारी पोर्टलों से खुलेआम उपलब्ध डेटा का विश्लेषण करते हैं। किसी कंपनी का टर्नओवर, मालिक का नाम, प्रोजेक्ट की जानकारी, यहां तक कि प्रमोटर्स की प्रोफाइल—सब कुछ उनकी पहुंच में होता है। यही जानकारी बाद में धमकी देने के दौरान इस्तेमाल की जाती है ताकि सामने वाला व्यक्ति डर जाए।

धमकियों का तरीका भी बेहद संगठित और आधुनिक है। पारंपरिक कॉल की जगह अब WhatsApp कॉल, वॉयस नोट्स और खास तौर पर Signal जैसे एन्क्रिप्टेड ऐप का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिन्हें ट्रेस करना बेहद मुश्किल होता है। जांच में सामने आया है कि गैंग के शीर्ष स्तर के सदस्य और अंतरराष्ट्रीय हैंडलर इसी तरह के सुरक्षित प्लेटफॉर्म के जरिए संवाद करते हैं।

इस नेटवर्क के शीर्ष पर कथित तौर पर हैरी बॉक्सर उर्फ हरि चंद जाट का नाम सामने आया है, जो विदेश—संभवतः उत्तर अमेरिका—से पूरे ऑपरेशन को नियंत्रित कर रहा है। उसके नीचे रितिक बॉक्सर जैसे हैंडलर हैं, जो जेल में बंद होने के बावजूद नेटवर्क को निर्देश देते हैं। इसके बाद मिड-लेवल ऑपरेटिव जैसे राजपाल चंद्रावत और हाल ही में गिरफ्तार प्रदीप शुक्ला आते हैं, जो विदेशी हैंडलर्स और स्थानीय गुर्गों के बीच कड़ी का काम करते हैं।

SIT प्रमुख DIG राहुल लोढ़ा के अनुसार, प्रदीप शुक्ला इस नेटवर्क का अहम हिस्सा था और उसे मुरैना से गिरफ्तार किया गया है। जांच में उसके लॉरेंस बिश्नोई गैंग से सीधे संबंध के पुख्ता सबूत मिले हैं। बताया जा रहा है कि वही शूटर्स की व्यवस्था करता था और मध्य प्रदेश में गैंग के ऑपरेशन को संभाल रहा था। फिलहाल उससे पूछताछ जारी है और कई अहम खुलासों की उम्मीद है।

इस पिरामिड के सबसे निचले स्तर पर फील्ड ऑपरेटिव होते हैं, जिनमें ज्यादातर नाबालिग या युवा शामिल हैं। इन्हें सोशल मीडिया—खासकर इंस्टाग्राम—के जरिए गैंग में शामिल किया जाता है। महंगी गाड़ियों, हथियारों और आलीशान जिंदगी के वीडियो दिखाकर उन्हें आकर्षित किया जाता है। इसके बाद उन्हें छोटे-छोटे काम सौंपे जाते हैं और धीरे-धीरे बड़े अपराधों में शामिल किया जाता है। जांच में यह भी सामने आया है कि कुछ युवाओं को वीडियो कॉल के जरिए ट्रेनिंग दी गई, यहां तक कि पेट्रोल बम बनाने तक की जानकारी दी गई।

खरगोन का मामला इस नेटवर्क की गंभीरता को दर्शाता है। दिलीप राठौर के घर पर तीन बार फायरिंग की कोशिश की गई और 16 मार्च को गोलियां भी चलाई गईं। इसके अगले ही दिन फायरिंग का वीडियो भेजकर 10 करोड़ रुपये की मांग की गई। यह स्पष्ट संकेत है कि गैंग सिर्फ धमकी तक सीमित नहीं, बल्कि हिंसा का इस्तेमाल करने से भी पीछे नहीं हटता।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, गैंग जानबूझकर नाबालिगों का इस्तेमाल करता है क्योंकि उनकी जमानत जल्दी हो जाती है और कानून की पकड़ से बचना आसान होता है। अब तक मध्य प्रदेश और राजस्थान से 24 से अधिक गिरफ्तारियां हो चुकी हैं, लेकिन कई आरोपी अभी भी फरार हैं। जांच एजेंसियों को शक है कि कई पीड़ित डर के कारण सामने नहीं आए और चुपचाप पैसे देकर मामला खत्म कर दिया।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला सिर्फ कानून-व्यवस्था का नहीं, बल्कि डिजिटल सुरक्षा और डेटा प्राइवेसी का भी है। जिस तरह से सार्वजनिक डेटा का दुरुपयोग किया जा रहा है, वह एक बड़े खतरे की ओर इशारा करता है। GST और RERA जैसे पोर्टल पारदर्शिता के लिए बनाए गए थे, लेकिन अब वही डेटा अपराधियों के लिए हथियार बनता जा रहा है।

जैसे-जैसे SIT और STF की जांच आगे बढ़ रही है, एक बात साफ होती जा रही है कि यह नेटवर्क बेहद गहरा और व्यापक है। संभव है कि अलग-अलग इलाकों में कई “राजपाल” सक्रिय हों, जो इस ग्लोबल एक्सटॉर्शन मशीन को चला रहे हैं। उज्जैन से लेकर उत्तर अमेरिका तक फैले इस नेटवर्क ने यह दिखा दिया है कि डिजिटल युग में अपराध भी हाई-टेक हो चुका है—और उससे निपटने के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों को भी उतनी ही तेजी से खुद को अपग्रेड करना होगा।

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