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The Hill India > Blog > उत्तराखंड > DNA टेस्ट ने पलटा पॉक्सो का केस: हल्द्वानी कोर्ट ने रेप के आरोपी को किया बाइज्जत बरी, जानें क्या है पूरा मामला
उत्तराखंडफीचर्ड

DNA टेस्ट ने पलटा पॉक्सो का केस: हल्द्वानी कोर्ट ने रेप के आरोपी को किया बाइज्जत बरी, जानें क्या है पूरा मामला

The Hill India News
Last updated: January 25, 2026 12:36 pm
The Hill India News
Published: January 25, 2026
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Image Source: File
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नैनीताल/हल्द्वानी: उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित विशेष पॉक्सो अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए बलात्कार के आरोपी युवक को दोषमुक्त करार दिया है। करीब तीन साल तक जेल की सलाखों के पीछे रहने के बाद, डीएनए रिपोर्ट (DNA Report) ने युवक की बेगुनाही साबित करने में अहम भूमिका निभाई। न्यायालय ने पाया कि जिस नवजात शिशु को आधार बनाकर आरोपी पर संगीन आरोप लगाए गए थे, वह उसका जैविक पिता नहीं है।

Contents
क्या था पूरा मामला?अदालत में गवाही और विरोधाभासDNA रिपोर्ट ने साबित की बेगुनाहीकोर्ट का अंतिम फैसलाकानूनी विशेषज्ञों की राय

क्या था पूरा मामला?

मामले की शुरुआत 19 मई 2023 को हुई थी, जब नैनीताल जिले के भीमताल थाना क्षेत्र में रहने वाले एक व्यक्ति ने अपनी 15 वर्षीय नाबालिग बहन के गर्भवती होने और बाद में एक शिशु को जन्म देने की शिकायत दर्ज कराई थी। भाई की तहरीर पर पुलिस ने क्षेत्र के ही एक युवक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376(3) और पॉक्सो अधिनियम (POCSO Act) की धारा 5/6 के तहत मुकदमा दर्ज किया था।

पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए आरोपी युवक को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। तब से यह मामला हल्द्वानी स्थित विशेष न्यायाधीश पॉक्सो की अदालत में विचाराधीन था।

अदालत में गवाही और विरोधाभास

मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से कुल 8 गवाह पेश किए गए। दिलचस्प बात यह रही कि पीड़िता के परिवार के सदस्यों ने अभियोजन के कथानक (Story) का पूरी तरह समर्थन नहीं किया। हालांकि, पीड़िता अपने बयानों पर अडिग थी। उसने कोर्ट के सामने गवाही दी कि आरोपी युवक ने ही उसके साथ दुष्कर्म किया था और उसका नवजात शिशु भी उसी युवक का है।

DNA रिपोर्ट ने साबित की बेगुनाही

आरोपी युवक की ओर से अधिवक्ता लोकेश राज चौधरी ने मजबूती से पैरवी की। उन्होंने मामले की सच्चाई जानने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्यों की मांग की। अदालत के निर्देश पर पीड़िता, नवजात शिशु और आरोपी युवक का डीएनए सैंपल लिया गया और जांच के लिए भेजा गया।

विशेष न्यायाधीश मनमोहन सिंह की अदालत में जब डीएनए रिपोर्ट पेश की गई, तो मामला पूरी तरह पलट गया। रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि:

  1. पीड़िता नवजात शिशु की जैविक माता (Biological Mother) है।

  2. लेकिन, आरोपी युवक नवजात शिशु का जैविक पिता (Biological Father) नहीं है।

कोर्ट का अंतिम फैसला

वैज्ञानिक साक्ष्यों और डीएनए रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट ने माना कि आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप निराधार हैं। डीएनए रिपोर्ट ने पीड़िता के बयानों को विज्ञान की कसौटी पर झुठला दिया। परिणामस्वरूप, न्यायालय ने आरोपी को जेल से रिहा करने और उसे सभी आरोपों से बाइज्जत दोषमुक्त करने का आदेश दिया।


कानूनी विशेषज्ञों की राय

इस फैसले के बाद कानूनी हलकों में चर्चा है कि पॉक्सो जैसे गंभीर मामलों में वैज्ञानिक जांच (Forensic Evidence) कितनी अनिवार्य है। अधिवक्ता लोकेश राज चौधरी ने बताया कि ऐसे मामलों में कई बार निर्दोष लोग केवल बयानों के आधार पर जेल की सजा काटते हैं, लेकिन डीएनए टेस्ट सच्चाई सामने लाने का सबसे सशक्त माध्यम है।

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