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उत्तराखंड में जंगलों में आग का भयंकर तांडव, तीन महीनों में 300 वनाग्नि की घटनाएं, 239 हेक्टेयर से अधिक वन क्षेत्र जलकर राख

उत्तराखंड एक बार फिर भीषण वनाग्नि की मार झेल रहा है। पहाड़ों की हरियाली, ठंडी हवाओं और प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध यह राज्य इन दिनों धुएं और आग की लपटों से घिरा हुआ है। अग्निकाल शुरू होने के बाद से जंगलों में आग लगने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि गढ़वाल से लेकर कुमाऊं तक कई जिलों के जंगल आग की चपेट में हैं। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार 15 फरवरी से अब तक प्रदेश में जंगलों में आग लगने की लगभग 300 घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं, जिनमें करीब 239.47 हेक्टेयर वन क्षेत्र जलकर राख हो चुका है। इसके साथ ही लगभग 3.5 हेक्टेयर पौधारोपण क्षेत्र भी प्रभावित हुआ है।

इस बार का अग्निकाल राज्य के लिए बेहद संवेदनशील माना जा रहा है। लगातार बढ़ते तापमान, बारिश की कमी और जंगलों में सूखी वनस्पति ने हालात को और भयावह बना दिया है। जंगलों में फैली सूखी घास, पत्तियां और चीड़ के पेड़ों से निकलने वाला पिरूल मामूली चिंगारी से भी तेजी से आग पकड़ रहा है। यही कारण है कि आग तेजी से फैल रही है और उस पर काबू पाना चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है।

सबसे अधिक प्रभावित गढ़वाल मंडल
वन विभाग के मुताबिक इस बार सबसे ज्यादा वनाग्नि की घटनाएं गढ़वाल मंडल में सामने आई हैं। पौड़ी, टिहरी, रुद्रप्रयाग, चमोली और उत्तरकाशी के जंगल लगातार आग की चपेट में आ रहे हैं। कई जगह रात के समय पहाड़ियों पर आग की लंबी लपटें दूर-दूर तक दिखाई दे रही हैं। जंगलों से उठता धुआं अब रिहायशी इलाकों तक पहुंचने लगा है, जिससे स्थानीय लोगों की चिंता और बढ़ गई है।

वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि कई क्षेत्रों में आग इतनी तेजी से फैली कि उसे नियंत्रित करने में घंटों लग गए। दुर्गम पहाड़ी रास्तों और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण अग्निशमन दलों को घटनास्थल तक पहुंचने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। कई बार कर्मचारियों को घंटों पैदल चलकर जंगलों तक पहुंचना पड़ता है। सबसे ज्यादा प्रभावित वन प्रभागों में गढ़वाल, पिथौरागढ़, बदरीनाथ, कालसी और रुद्रप्रयाग क्षेत्र शामिल हैं।

जलवायु परिवर्तन का भी असर
राज्य के वन मंत्री सुबोध उनियाल ने कहा कि प्रदेश में जलवायु परिवर्तन का असर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि लगातार बदलते मौसम और कम होती बारिश की वजह से जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ रही हैं। हालांकि उन्होंने दावा किया कि पिछले चार वर्षों में वन विभाग ने आग पर नियंत्रण के लिए कई प्रभावी कदम उठाए हैं।

वन मंत्री के अनुसार प्रत्येक जिले में जिलाधिकारी के नेतृत्व में विशेष समितियां बनाई गई हैं। ग्राम प्रधानों की अगुवाई में वनाग्नि प्रबंधन समितियां गठित की गई हैं और वरिष्ठ वन अधिकारियों को नोडल अधिकारी बनाकर जिम्मेदारी दी गई है। उन्होंने बताया कि अग्नि प्रहरी कर्मियों का 10 लाख रुपये का बीमा किया गया है और उन्हें अग्निरोधक वस्त्र, सुरक्षा जैकेट तथा अन्य उपकरण उपलब्ध कराए गए हैं।

मौसम बना सबसे बड़ा संकट
भारतीय मौसम विभाग के अनुसार इस बार मौसम की बेरुखी ने हालात और गंभीर बना दिए हैं। पिछले कई दिनों से राज्य के अधिकांश हिस्सों में बारिश नहीं हुई है। तेज धूप और गर्म हवाओं ने जंगलों की नमी लगभग खत्म कर दी है। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले दिनों में हल्की बारिश की संभावना जरूर है, लेकिन उससे बड़े स्तर पर राहत मिलने की उम्मीद कम है।

मौसम वैज्ञानिक डॉ. सीएस तोमर ने कहा कि तापमान सामान्य से 2 से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक रहने का अनुमान है। इसका सीधा असर जंगलों पर पड़ रहा है। सूखी घास, पत्तियां और चीड़ का पिरूल तुरंत आग पकड़ रहे हैं। मौसम वैज्ञानिक रोहित थपलियाल के अनुसार मैदानी जिलों में गर्मी और अधिक बढ़ सकती है, जिससे वनाग्नि की घटनाओं में और तेजी आ सकती है।

आखिर क्यों बार-बार जलते हैं उत्तराखंड के जंगल?
उत्तराखंड में गर्मियों के दौरान जंगलों में आग लगना कोई नई बात नहीं है, लेकिन हर साल इसका दायरा और विनाश बढ़ता जा रहा है। इसके पीछे प्राकृतिक और मानवीय दोनों कारण जिम्मेदार माने जाते हैं।

राज्य के बड़े हिस्से में चीड़ के जंगल फैले हुए हैं। चीड़ के पेड़ों से निकलने वाला लीसा और पिरूल अत्यधिक ज्वलनशील होता है। गर्मियों में जब जंगल पूरी तरह सूख जाते हैं, तो यही पिरूल आग को तेजी से फैलाने का काम करता है।

इसके अलावा मानवीय लापरवाही भी वनाग्नि की बड़ी वजह बन रही है। जंगलों से गुजरने वाले लोग कई बार बीड़ी, सिगरेट या जलती माचिस फेंक देते हैं, जिससे आग लग जाती है। कई बार ग्रामीण नई घास उगाने के लिए जंगलों में आग लगा देते हैं, लेकिन वही आग बाद में बेकाबू होकर बड़े इलाके को अपनी चपेट में ले लेती है।

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन भी अब वनाग्नि का बड़ा कारण बन चुका है। समय पर बारिश नहीं होने और लगातार बढ़ते तापमान ने जंगलों को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

चमोली और पौड़ी में बिगड़े हालात
चमोली जिले के नारायणबगड़ क्षेत्र में लगी आग ने वन विभाग की चिंता बढ़ा दी है। पश्चिमी पिंडर क्षेत्र और बदरीनाथ वन प्रभाग के जंगलों में लगातार दो दिनों तक आग धधकती रही। आग की चपेट में आकर हजारों छोटे पौधे जलकर नष्ट हो गए।

इसी तरह पौड़ी जिले के बुआखाल और पौड़ी-देवप्रयाग मार्ग के आसपास जंगलों में भीषण आग देखी गई। आग की लपटें सड़क किनारे जंगलों से लेकर ऊंचाई वाले क्षेत्रों तक फैल गईं। दूर-दूर तक धुएं का गुबार दिखाई देता रहा।

कौब, लेगुना, केशपुर, छैकुड़ा और नलगांव जैसे कई क्षेत्रों के जंगल भी आग की चपेट में आ गए। वन विभाग की टीमों ने घंटों मशक्कत के बाद आग पर नियंत्रण पाने की कोशिश की।

वन्यजीवों पर भी संकट
वनाग्नि का असर केवल जंगलों तक सीमित नहीं है। आग की वजह से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास भी नष्ट हो रहा है। कई जंगली जानवर पानी और सुरक्षित स्थान की तलाश में आबादी वाले इलाकों की ओर आने लगे हैं। इससे मानव और वन्यजीव संघर्ष का खतरा भी बढ़ गया है।

पर्यावरणविदों का कहना है कि जंगलों में लगने वाली आग से बड़ी मात्रा में धुआं वातावरण में फैलता है, जिससे प्रदूषण बढ़ता है और पहाड़ी क्षेत्रों का पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित होता है। इसका असर जल स्रोतों और लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।

रातभर आग से लड़ते रहे अग्निशमन कर्मी
रानीखेत से सामने आए एक दृश्य ने जंगलों में आग बुझाने की कठिन परिस्थितियों को उजागर कर दिया। इसमें अग्निशमन सेवा और वन विभाग की टीमें दुर्गम पहाड़ियों में रातभर आग बुझाती दिखाई दीं। कई स्थानों पर सड़क और वाहन पहुंचने का रास्ता नहीं था, इसलिए कर्मचारियों को पेड़ों की टहनियों और हाथों से आग बुझानी पड़ी।

घना जंगल, अंधेरा और ऊबड़-खाबड़ रास्ते राहत कार्य में बड़ी चुनौती बने हुए हैं। कई बार आग इतनी तेजी से फैलती है कि कर्मचारियों को अपनी जान जोखिम में डालकर काम करना पड़ता है।

वन विभाग सतर्कता पर
वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए वन विभाग ने पूरे प्रदेश में उच्च सतर्कता जारी कर दी है। विभाग ने 1438 वन अग्निशमन केंद्र सक्रिय किए हैं। इसके अलावा लगभग 5600 वन अग्निशमन स्वयंसेवक आग बुझाने के काम में लगाए गए हैं। राज्यभर में करीब 40 मुख्य अग्नि नियंत्रण कक्ष बनाए गए हैं, जहां से लगातार निगरानी की जा रही है।

मुख्य वन संरक्षक और आपदा प्रबंधन के नोडल अधिकारी सुशांत पटनायक ने कहा कि विभाग की पूरी टीम लगातार आग नियंत्रित करने में जुटी हुई है। विशेष ध्यान उन इलाकों पर दिया जा रहा है जहां आग आबादी के करीब पहुंच रही है।

गढ़वाल सांसद अनिल बलूनी का भी हाल ही में जंगल की आग से सामना हुआ था। जब वे पौड़ी से कोटद्वार लौट रहे थे, तब उन्होंने रास्ते में जंगलों में लगी भीषण आग देखी और तुरंत वन विभाग के अधिकारियों को दूरभाष पर संपर्क कर जल्द कार्रवाई करने के निर्देश दिए।

आने वाले दिन और चुनौतीपूर्ण
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अगले कुछ दिनों तक अच्छी बारिश नहीं हुई तो उत्तराखंड में वनाग्नि की स्थिति और भयावह हो सकती है। तापमान लगातार बढ़ रहा है और जंगलों में नमी लगभग समाप्त हो चुकी है। ऐसे में आग की घटनाएं आने वाले दिनों में और बढ़ सकती हैं।

फिलहाल पूरा उत्तराखंड एक कठिन अग्निकाल से गुजर रहा है। वन विभाग, अग्निशमन सेवा और स्थानीय लोग लगातार जंगलों में लगी आग बुझाने की कोशिशों में जुटे हैं, लेकिन मौसम का साथ न मिलने से चुनौती लगातार बढ़ती जा रही है।

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