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उत्तराखंड: प्रतिनियुक्ति पर सख्ती के बावजूद नियमों की अनदेखी, वर्षों से मूल विभाग से बाहर जमे अफसरों पर उठे सवाल

The Hill India News
Last updated: April 9, 2026 12:23 pm
The Hill India News
Published: April 9, 2026
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देहरादून: उत्तराखंड में प्रतिनियुक्ति और अटैचमेंट की व्यवस्था एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गई है। हाल ही में शिक्षा विभाग द्वारा प्रतिनियुक्ति पर तैनात कर्मचारियों को हटाने और उन्हें मूल विभाग में वापस भेजने के निर्देश दिए जाने के बाद यह मुद्दा और भी गरमा गया है। सरकार जहां इस व्यवस्था को सीमित करने की बात करती रही है, वहीं जमीनी हकीकत यह है कि कई अधिकारी और कर्मचारी वर्षों से अपने मूल विभागों से बाहर ही डटे हुए हैं।

शिक्षा विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि अब अटैचमेंट और प्रतिनियुक्ति को स्थायी व्यवस्था के रूप में नहीं चलने दिया जाएगा। विभाग ने तीन साल से अधिक समय से प्रतिनियुक्ति पर कार्य कर रहे कर्मचारियों की समीक्षा करने और आवश्यक होने पर उन्हें मूल विभाग में भेजने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इसके लिए विस्तृत डेटा भी तैयार किया जा रहा है, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।

हालांकि, शिक्षा विभाग की इस पहल ने अन्य विभागों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। कई ऐसे विभाग हैं, जहां अधिकारी प्रतिनियुक्ति की अधिकतम समय सीमा पार करने के बावजूद भी वापस नहीं लौटे हैं। नियमों के अनुसार किसी भी कर्मचारी या अधिकारी की प्रतिनियुक्ति सामान्यतः सीमित अवधि के लिए होती है, जो अधिकतम पांच वर्ष तक हो सकती है। इसके बावजूद कई मामलों में यह अवधि वर्षों तक बढ़ती चली जाती है।

सरकार की ओर से पहले भी इस संबंध में कई बार निर्देश जारी किए जा चुके हैं। वर्ष 2025 में तत्कालीन अपर मुख्य सचिव वित्त और वर्तमान मुख्य सचिव आनंद वर्धन ने भी स्पष्ट आदेश जारी करते हुए कहा था कि प्रतिनियुक्ति को अनावश्यक रूप से लंबा न खींचा जाए और अधिकारियों को समय पर उनके मूल विभाग में वापस भेजा जाए। लेकिन इन आदेशों का पालन पूरी तरह से नहीं हो पाया है, जिससे शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।

जलागम विभाग इसका एक प्रमुख उदाहरण बनकर सामने आया है। यहां कृषि विभाग के कई अधिकारी लंबे समय से प्रतिनियुक्ति पर कार्यरत हैं। स्थिति यह है कि पांच साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद भी उनकी वापसी नहीं हो सकी है। दूसरी ओर, कृषि विभाग खुद अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है, लेकिन इसके बावजूद अपने अधिकारियों को वापस बुलाने में सफल नहीं हो पा रहा है।

जानकारी के अनुसार, कृषि विभाग ने कई बार पत्र भेजकर अधिकारियों को वापस बुलाने का प्रयास किया है, लेकिन इन पत्रों का अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखा। जलागम विभाग ने अपनी परियोजनाओं का हवाला देते हुए अधिकारियों को वापस भेजने में असमर्थता जताई है। इससे यह स्पष्ट होता है कि विभागों के बीच समन्वय की कमी भी इस समस्या का एक बड़ा कारण है।

इस मुद्दे पर कृषि मंत्री गणेश जोशी ने भी स्वीकार किया कि विभाग ने अधिकारियों को वापस बुलाने के लिए प्रयास किए हैं, लेकिन परियोजनाओं की वजह से उन्हें तुरंत वापस भेजना संभव नहीं हो पाया है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक ढांचे की कमजोरी को उजागर करती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि नियमों का पालन सुनिश्चित करने में सरकार को अभी और सख्ती दिखाने की आवश्यकता है।

विपक्ष ने भी इस मुद्दे को लेकर सरकार को घेरा है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल का कहना है कि प्रतिनियुक्ति से वापस बुलाने की जिम्मेदारी मूल विभाग की होती है और यदि अधिकारी आदेशों का पालन नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ कर्मचारी आचरण नियमावली के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए। उनका यह भी कहना है कि नियम स्पष्ट हैं, लेकिन इच्छाशक्ति की कमी के कारण उनका पालन नहीं हो पा रहा है।

पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकार और विभाग बार-बार सख्ती की बात करते हैं, तो फिर नियमों का पालन क्यों नहीं हो रहा है। क्या विभागीय हितों और परियोजनाओं के नाम पर नियमों को नजरअंदाज किया जा रहा है, या फिर प्रशासनिक स्तर पर जवाबदेही की कमी है?

फिलहाल, शिक्षा विभाग की पहल को एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या अन्य विभाग भी इसी तरह की सख्ती अपनाते हैं या फिर प्रतिनियुक्ति की यह व्यवस्था पहले की तरह ही जारी रहती है। यदि सरकार वास्तव में इस व्यवस्था को सुधारना चाहती है, तो उसे न केवल स्पष्ट निर्देश देने होंगे, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन को भी सुनिश्चित करना होगा। तभी प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता और संतुलन स्थापित किया जा सकेगा।

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