
देहरादून: उत्तराखंड में विभिन्न सरकारी विभागों, निगमों और परिषदों में आउटसोर्सिंग के माध्यम से सेवाएं दे रहे उपनल (उत्तराखंड पूर्व सैनिक कल्याण निगम) कर्मचारियों के नियमितीकरण और ‘समान काम के बदले समान वेतन’ का मुद्दा सुलझने के बजाय और अधिक उलझता जा रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली कैबिनेट द्वारा बाकायदा नीतिगत फैसला लेने और शासन स्तर से इस पर बकायदा आदेश जारी होने के बावजूद, संविदा कर्मियों की नाराजगी दूर नहीं हो सकी है। अब इस पूरे प्रकरण में एक नया और बेहद चौंकाने वाला मोड़ सामने आया है। शासन स्तर पर इस नीति को लेकर तीसरी बार उत्तराखंड उपनल कर्मचारी कट ऑफ डेट में संशोधन करने की एक बड़ी पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है, जो यह दर्शाती है कि ब्यूरोक्रेसी और कैबिनेट के बीच इस संवेदनशील विषय पर अब भी पूर्ण सहमति नहीं बन पाई है।
अधिकारिक गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, मंत्रिमंडल के पिछले फैसलों के बाद जहां एक बार शासनादेश में विधिवत संशोधन किया जा चुका है, वहीं अब दूसरी बार फिर से ‘कट ऑफ डेट’ (पात्रता की अंतिम तिथि) को बदलने की कवायद तेज हो गई है। सरकार के इस बार-बार बदलते रुख से न केवल प्रशासनिक मशीनरी के भीतर भ्रम की स्थिति है, बल्कि पिछले कई सालों से सड़कों से लेकर अदालतों तक हक की लड़ाई लड़ रहे हजारों उपनल कर्मचारियों के सब्र का बांध भी अब टूटने लगा है।
2018 से 2024: हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक की लंबी कानूनी जंग
यह कोई ऐसा विवाद नहीं है जो रातों-रात पैदा हुआ हो। उपनल कर्मचारी पिछले डेढ़ दशक से अधिक समय से सेवा विनियमितीकरण (नियमितीकरण) और स्थायी नीतियों की मांग को लेकर मुखर रहे हैं। जब कार्यपालिका स्तर पर उनकी सुनवाई नहीं हुई, तो उन्होंने न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया था। कानूनी मोर्चे पर इन कर्मचारियों को साल 2018 में एक ऐतिहासिक और बहुत बड़ी कामयाबी हासिल हुई थी।
“साल 2018 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के हक में एक युगांतरकारी फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को स्पष्ट आदेश दिया था कि वह चरणबद्ध तरीके से उपनल कर्मचारियों को सेवा में विनियमित करे। हालांकि, तत्कालीन सरकार ने इस आदेश को मानने के बजाय इसके खिलाफ देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर दी। इसके बाद करीब 6 साल तक यह संवेदनशील मामला सुप्रीम कोर्ट के ठंडे बस्ते में लटका रहा।”
इस लंबे इंतजार के बाद, साल 2024 में उपनल कर्मचारियों की खुशी की कोई सीमा नहीं रही, जब सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया। शीर्ष अदालत ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के 2018 के आदेश को शत-प्रतिशत सही ठहराते हुए उस पर अपनी मुहर लगा दी। सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद धामी सरकार के पास हाईकोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत कर्मचारियों को विनियमित करने की एक बड़ी संवैधानिक और कानूनी बाध्यता बन गई थी।
विनियमितीकरण के बदले ‘समान वेतन’ का दांव और कट-ऑफ का मकड़जाल
सुप्रीम कोर्ट से झटका खाने के बाद धामी सरकार ने बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की। मंत्रिमंडल की बैठक में इन कर्मचारियों को सीधे तौर पर विनियमित (पक्का) करने को लेकर तो कोई बड़ा साहसिक निर्णय नहीं लिया गया, लेकिन उनके असंतोष को शांत करने के लिए ‘समान काम के बदले समान वेतन’ देने का एक लोक-लुभावन फैसला जरूर ले लिया गया। इसी फैसले को अमलीजामा पहनाने के लिए शासन ने पहली बार एक जटिल टाइमलाइन और उत्तराखंड उपनल कर्मचारी कट ऑफ डेट तय करते हुए शासनादेश जारी किया।
शुरुआती शासनादेश का गणित: पहले आदेश के तहत यह व्यवस्था की गई थी कि 25 नवंबर 2025 तक जिन उपनल कर्मचारियों ने अपनी सेवा के 10 वर्ष पूरे कर लिए हैं, उन्हें पहले चरण में इस वित्तीय लाभ का पात्र माना जाएगा। वहीं, समान कार्य के लिए समान वेतन के सिद्धांत के क्रियान्वयन हेतु 12 नवंबर 2018 को अंतिम कट ऑफ डेट निर्धारित किया गया। इसका सीधा अर्थ यह था कि साल 2015 के बाद और 2018 तक नियुक्त हुए उपनल कर्मचारियों को दूसरे चरण में इस योजना का लाभ दिया जाना तय हुआ था।
फरवरी का संशोधित आदेश और अनुबंध का विवाद: हैरानी की बात यह रही कि इस आदेश के जारी होने के कुछ ही समय बाद, इसी साल फरवरी में शासन ने अपने कदम पीछे खींचते हुए एक और संशोधित आदेश जारी कर दिया। इस नए संशोधन में 12 नवंबर 2018 को ही अंतिम कट ऑफ डेट तो रखा गया, लेकिन आंतरिक श्रेणियों को बदल दिया गया। इसके अनुसार:
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प्रथम चरण: 1 जनवरी 2016 से पहले नियुक्त हुए उपनल कर्मचारियों को तुरंत लाभ देने की बात कही गई।
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द्वितीय चरण: 1 जनवरी 2016 के बाद और 12 नवंबर 2018 तक नियुक्त हुए उपनल कर्मियों को दूसरे चरण में शामिल करने का निर्णय लिया गया।
इस संशोधित आदेश के साथ ही सरकार की तरफ से एक नया ‘अनुबंध पत्र’ (बॉन्ड) जारी किया गया, जिसे देखते ही उपनल कर्मचारियों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। कर्मचारियों का आरोप था कि इस अनुबंध पत्र की शर्तें उनके मूल अधिकारों का हनन करती हैं और नियमितीकरण के रास्ते को हमेशा के लिए बंद करने की एक दबी हुई साजिश हैं।
हाईकोर्ट की अवमानना का डर: अब 15 अक्टूबर 2024 को नया आधार बनाने की तैयारी
सरकार के इस रवैये से नाराज होकर उपनल कर्मचारी संगठनों ने सरकार के खिलाफ सीधे तौर पर हाईकोर्ट में ‘अवमानना याचिका’ (Contempt Petition) दाखिल कर दी। कर्मचारियों का साफ कहना था कि जब सर्वोच्च अदालत ने नियमितीकरण के आदेश दिए हैं, तो सरकार केवल वेतन बढ़ाकर मामले को रफा-दफा नहीं कर सकती।
अब जब हाईकोर्ट में इस अवमानना याचिका पर कड़ा रुख अपनाए जाने की संभावना बढ़ी, तो उत्तराखंड शासन ने एक बार फिर से ‘यू-टर्न’ ले लिया है। हाल ही में राज्य के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और उच्च स्तरीय बैठक संपन्न हुई। इस बैठक के दौरान कानूनी पचड़ों से बचने के लिए एक बार फिर से उत्तराखंड उपनल कर्मचारी कट ऑफ डेट में आमूलचूल संशोधन करने पर सैद्धांतिक सहमति जताई गई है।
“इस नई रणनीति के तहत, अब सैनिक कल्याण विभाग द्वारा बहुत जल्द धामी कैबिनेट की आगामी बैठक में एक नया प्रस्ताव लाए जाने की तैयारी की जा रही है। इस नए प्रस्ताव के अनुसार, अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए ऐतिहासिक फैसले की तारीख, यानी 15 अक्टूबर 2024 को ही ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ का लाभ दिए जाने की अंतिम और संचयी कट ऑफ डेट रखने पर विचार किया जा रहा है। ऐसा होने से पात्रता का दायरा थोड़ा और बढ़ सकता है, जिससे कोर्ट में यह दिखाया जा सके कि सरकार सकारात्मक रूप से काम कर रही है।”
कर्मचारियों का रुख साफ: ‘वेतनमान नहीं, हमें नियमितीकरण चाहिए’
शासन स्तर पर चल रही इस भारी कसरत और तारीखों के इस अंतहीन खेल को लेकर उपनल कर्मचारियों के तेवर बेहद आक्रामक हैं। वे सरकार की इस नीति को महज समय काटने और मुख्य मुद्दे से ध्यान भटकाने वाला हथकंडा मान रहे हैं। कर्मचारियों का स्पष्ट कहना है कि माननीय उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय का जो मूल आदेश है, वह पूरी तरह से ‘नियमितीकरण’ (Regularization) को लेकर है। ऐसे में सरकार को वित्तीय लाभ देने के साथ-साथ उनके स्थायी भविष्य को लेकर विनियमितीकरण पर ठोस नीतिगत फैसला लेना ही होगा।
उपनल के बैनर तले लड़ रहे ऊर्जा संविदा कर्मचारी संगठन के प्रांतीय अध्यक्ष विनोद कवि ने सरकार की इस नीयत पर कड़े सवाल उठाए हैं। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए बेहद बेबाकी से कहा:
“उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कर्मचारियों के व्यापक हित में जो ऐतिहासिक फैसला लिया था और जिसे देश की सर्वोच्च अदालत ने भी सही माना है, राज्य सरकार को बिना किसी हीला-हवाली के उसका अक्षरशः पालन करना चाहिए। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों और बार-बार शासनादेशों को बदले जाने के ढर्रे को देखकर ऐसा साफ प्रतीत हो रहा है कि सरकार और उसके आला अधिकारी इस पूरे मामले को दूसरी अनपेक्षित दिशा में ले जाने का काम कर रहे हैं। संविदा कर्मचारियों का शोषण बंद होना चाहिए और जब तक पूर्ण विनियमितीकरण नहीं होता, हमारा आंदोलन और कानूनी लड़ाई जारी रहेगी।”
अब देखना यह होगा कि सैनिक कल्याण विभाग द्वारा कैबिनेट के पटल पर रखे जाने वाले इस नए ’15 अक्टूबर 2024′ के कट ऑफ प्रस्ताव को मंत्रिमंडल से हरी झंडी मिलती है या नहीं, और क्या यह नया दांव धामी सरकार को कोर्ट की अवमानना की कार्रवाई से बचा पाता है।



