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‘60 दिन में नौकरी ढूंढो या अमेरिका छोड़ो!’ — अमेरिकी टेक छंटनी ने भारतीय प्रोफेशनल्स के सपनों पर खड़ा किया संकट

The Hill India News
Last updated: May 21, 2026 7:19 am
The Hill India News
Published: May 21, 2026
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अमेरिका में नौकरी करना लंबे समय से लाखों भारतीय युवाओं का सपना रहा है। बेहतर सैलरी, आधुनिक जीवनशैली, वैश्विक कंपनियों में काम करने का अवसर और स्थायी भविष्य की उम्मीद ने भारत के हजारों इंजीनियरों और आईटी प्रोफेशनल्स को अमेरिका की ओर आकर्षित किया। लेकिन अब वही “अमेरिकन ड्रीम” हजारों भारतीय परिवारों के लिए डर और असुरक्षा का कारण बनता जा रहा है। अमेरिकी टेक इंडस्ट्री में लगातार हो रही छंटनी ने भारतीय कर्मचारियों की जिंदगी को अनिश्चितता के ऐसे दौर में धकेल दिया है, जहां नौकरी जाने का मतलब केवल बेरोजगारी नहीं, बल्कि पूरा देश छोड़ने की नौबत बन गया है।

Contents
टेक सेक्टर में बढ़ती छंटनी से बढ़ी बेचैनीH-1B वीजा धारकों के सामने सबसे बड़ी चुनौतीसिर्फ नौकरी नहीं, पूरा जीवन संकट मेंB-1/B-2 वीजा बन रहा अस्थायी सहाराभारतीय प्रोफेशनल्स पर मानसिक दबावक्या टूटने लगा है “अमेरिकन ड्रीम”?AI और ऑटोमेशन बदल रहे हैं पूरी इंडस्ट्रीकिन लोगों पर असर कम होगा?सेवरेंस पैकेज राहत नहीं, सिर्फ अस्थायी सहाराभविष्य को लेकर बढ़ी अनिश्चितता

सिलिकॉन वैली की बड़ी टेक कंपनियों में एक बार फिर बड़े स्तर पर कर्मचारियों की छंटनी शुरू हो चुकी है। Meta, Amazon, LinkedIn, Google और अन्य कंपनियां लागत घटाने और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI पर फोकस बढ़ाने के लिए हजारों कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखा रही हैं। इस बदलाव का सबसे ज्यादा असर उन विदेशी कर्मचारियों पर पड़ रहा है जो H-1B वीजा पर अमेरिका में काम कर रहे हैं। इनमें भारतीयों की संख्या सबसे अधिक है।

टेक सेक्टर में बढ़ती छंटनी से बढ़ी बेचैनी

अमेरिकी टेक कंपनियों में छंटनी का यह दौर अचानक नहीं आया है। पिछले कुछ वर्षों में टेक इंडस्ट्री तेजी से AI और ऑटोमेशन की ओर बढ़ी है। कंपनियां अब कम कर्मचारियों के साथ ज्यादा काम करने की रणनीति अपना रही हैं। AI आधारित टूल्स के आने से कई पारंपरिक इंजीनियरिंग, सपोर्ट और मैनेजमेंट रोल्स की जरूरत कम होती जा रही है। इसी कारण बड़ी कंपनियां हजारों कर्मचारियों को निकालकर अपने खर्च कम कर रही हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, वर्ष 2026 में अब तक टेक सेक्टर में 1.10 लाख से ज्यादा कर्मचारी अपनी नौकरी गंवा चुके हैं। इनमें सबसे अधिक प्रभावित विदेशी कर्मचारी बताए जा रहे हैं। भारतीय इंजीनियरों और सॉफ्टवेयर डेवलपर्स की बड़ी संख्या अमेरिका की कंपनियों में कार्यरत है, इसलिए यह संकट सीधे भारतीय समुदाय पर असर डाल रहा है।

Meta ने अपने AI इंफ्रास्ट्रक्चर और ऑटोमेशन प्रोजेक्ट्स में भारी निवेश की घोषणा के साथ लगभग 8,000 नौकरियों में कटौती की है। Amazon और LinkedIn जैसी कंपनियों ने भी अपने वर्कफोर्स को कम किया है। इन कंपनियों का कहना है कि भविष्य AI आधारित तकनीकों का है और उसी हिसाब से कंपनियों की संरचना बदली जा रही है।

H-1B वीजा धारकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती

अमेरिका में काम करने वाले अधिकांश भारतीय प्रोफेशनल्स H-1B वीजा पर निर्भर हैं। यह वीजा पूरी तरह नौकरी और कंपनी से जुड़ा होता है। यानी यदि कर्मचारी की नौकरी चली जाती है, तो उसका वीजा स्टेटस भी खतरे में पड़ जाता है।

अमेरिकी नागरिकता और आप्रवासन सेवा यानी USCIS के नियमों के मुताबिक, H-1B वीजा धारक को नौकरी छूटने के बाद केवल 60 दिनों का ग्रेस पीरियड मिलता है। इस दौरान उसे नई नौकरी खोजनी होती है और नया वीजा स्पॉन्सर भी मिलना जरूरी होता है। अगर 60 दिनों के भीतर नया एम्प्लॉयर नहीं मिलता, तो कर्मचारी को अमेरिका छोड़ना पड़ सकता है।

यही नियम आज हजारों भारतीयों के लिए सबसे बड़ा डर बन गया है। अमेरिका में वर्षों से रह रहे लोग अचानक खुद को ऐसी स्थिति में पा रहे हैं, जहां उन्हें कुछ ही हफ्तों में नई नौकरी ढूंढनी है, वरना पूरा जीवन अस्त-व्यस्त हो सकता है।

सिर्फ नौकरी नहीं, पूरा जीवन संकट में

अमेरिका में बसे भारतीय परिवारों के लिए यह संकट केवल करियर का नहीं है। कई लोग वर्षों से वहां रह रहे हैं। उन्होंने घर खरीदे हुए हैं, बच्चों का स्कूल-कॉलेज तय है, होम लोन चल रहे हैं और पूरा परिवार अमेरिकी जीवनशैली में ढल चुका है।

नौकरी जाते ही सबसे पहले आय रुकती है। इसके बाद हेल्थ इंश्योरेंस, बच्चों की पढ़ाई, किराया या होम लोन जैसी समस्याएं सामने आने लगती हैं। यदि समय पर नई नौकरी नहीं मिलती, तो परिवार को अमेरिका छोड़कर भारत लौटने पर मजबूर होना पड़ सकता है।

सबसे ज्यादा परेशानी उन भारतीयों को हो रही है जो ग्रीन कार्ड बैकलॉग में फंसे हुए हैं। अमेरिका में ग्रीन कार्ड प्रक्रिया वर्षों लंबी हो चुकी है और भारतीयों को अक्सर कई साल इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में लोग लंबे समय से अमेरिका में स्थायी रूप से बसने की योजना बनाकर बैठे थे, लेकिन छंटनी ने उनके सपनों को झटका दे दिया है।

B-1/B-2 वीजा बन रहा अस्थायी सहारा

नौकरी छूटने के बाद कई भारतीय प्रोफेशनल्स अमेरिका में कानूनी रूप से कुछ समय और रुकने के लिए B-1 या B-2 विजिटर वीजा में कन्वर्ट होने की कोशिश कर रहे हैं। इसका उद्देश्य यह होता है कि वे कुछ अतिरिक्त समय तक अमेरिका में रहकर नई नौकरी खोज सकें।

हालांकि इमिग्रेशन विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिकी अधिकारी अब ऐसे मामलों की काफी सख्ती से जांच कर रहे हैं। स्टेटस बदलने वाले आवेदकों से अतिरिक्त दस्तावेज मांगे जा रहे हैं और इंटरव्यू के दौरान कड़े सवाल पूछे जा रहे हैं। इसलिए यह रास्ता भी अब पहले जितना आसान नहीं रह गया है।

भारतीय प्रोफेशनल्स पर मानसिक दबाव

लगातार छंटनी और वीजा संबंधी अनिश्चितता ने भारतीय कर्मचारियों पर मानसिक दबाव भी बढ़ा दिया है। कई लोग तनाव, चिंता और असुरक्षा की भावना से गुजर रहे हैं। नौकरी जाने के बाद केवल नई नौकरी ढूंढने का दबाव नहीं होता, बल्कि पूरे परिवार का भविष्य दांव पर लग जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि H-1B कर्मचारियों के लिए नौकरी का मतलब केवल रोजगार नहीं, बल्कि उनका कानूनी अस्तित्व भी होता है। इसलिए छंटनी का असर मानसिक स्वास्थ्य पर भी गहरा पड़ रहा है।

कई भारतीय प्रोफेशनल्स सोशल मीडिया और प्रोफेशनल नेटवर्क्स पर अपनी परेशानियां साझा कर रहे हैं। कुछ लोग बताते हैं कि वे रोज सैकड़ों कंपनियों में आवेदन कर रहे हैं, लेकिन AI और ऑटोमेशन के कारण पहले जैसी भर्ती नहीं हो रही है।

क्या टूटने लगा है “अमेरिकन ड्रीम”?

दशकों तक अमेरिका भारतीय युवाओं के लिए सफलता और समृद्धि का प्रतीक रहा। आईटी सेक्टर में भारतीयों ने अपनी प्रतिभा के दम पर बड़ी पहचान बनाई। लेकिन अब बदलते हालात ने कई लोगों को दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया है।

हालिया सर्वे और ऑनलाइन पोल्स में बड़ी संख्या में भारतीय प्रोफेशनल्स ने माना है कि यदि नौकरी गई, तो वे अमेरिका छोड़कर भारत लौटने पर विचार करेंगे। कुछ लोग कनाडा, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को बेहतर विकल्प मान रहे हैं, जहां इमिग्रेशन नीतियां अपेक्षाकृत आसान हैं।

भारत में भी अब टेक इंडस्ट्री तेजी से विकसित हो रही है। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे और गुरुग्राम जैसे शहरों में ग्लोबल कंपनियों की मौजूदगी बढ़ी है। इसलिए कुछ भारतीय प्रोफेशनल्स अब भारत लौटकर करियर बनाने को भी बेहतर विकल्प मान रहे हैं।

AI और ऑटोमेशन बदल रहे हैं पूरी इंडस्ट्री

इस संकट की सबसे बड़ी वजहों में से एक AI का तेजी से बढ़ता प्रभाव है। कंपनियां अब AI टूल्स और ऑटोमेशन के जरिए कई ऐसे काम कर रही हैं जिनके लिए पहले बड़ी टीमों की जरूरत पड़ती थी।

Meta जैसी कंपनियां AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर अरबों डॉलर खर्च कर रही हैं। कंपनियां अब डेटा साइंस, मशीन लर्निंग और AI डेवलपमेंट जैसे क्षेत्रों में ज्यादा निवेश कर रही हैं, जबकि पारंपरिक सॉफ्टवेयर रोल्स में भर्ती कम हो रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में टेक सेक्टर की नौकरियों का स्वरूप पूरी तरह बदल सकता है। जिन कर्मचारियों के पास AI, क्लाउड कंप्यूटिंग और साइबर सिक्योरिटी जैसी नई स्किल्स होंगी, उनके लिए अवसर बने रहेंगे। लेकिन सामान्य कोडिंग और सपोर्ट रोल्स में प्रतिस्पर्धा और कठिन हो सकती है।

किन लोगों पर असर कम होगा?

ग्रीन कार्ड धारकों और अमेरिकी नागरिकता प्राप्त लोगों पर इस संकट का असर अपेक्षाकृत कम है, क्योंकि नौकरी जाने के बाद भी उन्हें देश छोड़ने का खतरा नहीं होता। इसी तरह कुछ लोग स्टूडेंट वीजा, डिपेंडेंट वीजा या अन्य इमिग्रेशन कैटेगरी के जरिए अतिरिक्त समय हासिल कर सकते हैं।

लेकिन H-1B वीजा धारकों के लिए स्थिति सबसे कठिन बनी हुई है। उनके पास समय बहुत कम होता है और हर दिन नई नौकरी की तलाश में बीतता है।

सेवरेंस पैकेज राहत नहीं, सिर्फ अस्थायी सहारा

Meta और अन्य कंपनियां छंटनी के दौरान कर्मचारियों को अच्छा सेवरेंस पैकेज दे रही हैं। कई कर्मचारियों को कई महीनों की सैलरी, हेल्थकेयर कवरेज और अतिरिक्त लाभ मिल रहे हैं। लेकिन विदेशी कर्मचारियों के लिए असली समस्या पैसे की नहीं, बल्कि कानूनी स्टेटस की है।

यदि नया स्पॉन्सर नहीं मिलता, तो चाहे बैंक खाते में पैसा हो, फिर भी अमेरिका में रुकना मुश्किल हो जाता है। यही कारण है कि H-1B कर्मचारियों के लिए हर दिन महत्वपूर्ण बन चुका है।

भविष्य को लेकर बढ़ी अनिश्चितता

अमेरिकी टेक सेक्टर में जारी यह बदलाव केवल अस्थायी संकट नहीं माना जा रहा। AI आधारित भविष्य में कंपनियां कम कर्मचारियों के साथ ज्यादा काम करना चाहती हैं। इससे पारंपरिक नौकरियों पर खतरा बढ़ सकता है।

भारतीय प्रोफेशनल्स अब नई स्किल्स सीखने, वैकल्पिक देशों की तलाश करने और भारत में अवसरों पर विचार करने लगे हैं। कई विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में ग्लोबल टेक जॉब मार्केट पूरी तरह बदल सकता है।

फिलहाल हजारों भारतीय परिवार एक अनिश्चित भविष्य के बीच फंसे हुए हैं। उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या 60 दिनों के भीतर नई नौकरी मिल पाएगी, या फिर सालों से बसाया गया जीवन छोड़कर वापस वतन लौटना पड़ेगा।

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