नई दिल्ली: मिडिल-ईस्ट (मध्य-पूर्व) इस वक्त बारूद के ढेर पर बैठा है, जहां अमेरिका और ईरान के बीच जंग अब एक बेहद खतरनाक और विनाशकारी मोड़ पर पहुंच चुकी है। शनिवार को ईरान ने जॉर्डन स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने पर एक बड़ा और रणनीतिक हमला बोलकर वाशिंगटन को सीधे युद्ध की चुनौती दे दी है। इस भीषण बैलिस्टिक मिसाइल हमले में दो अमेरिकी सैनिकों की दर्दनाक मौत हो गई है, जबकि कई अन्य सैनिक गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं। वहीं, हमले के बाद से एक सैनिक लापता है, जिसकी तलाश के लिए रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जा रहा है। ईरान के इस दुस्साहस के बाद पूरे खाड़ी क्षेत्र में तनाव चरम पर पहुंच गया है और अमेरिका ने भी जवाबी कार्रवाई करते हुए ईरान पर अपने हमले तेज कर दिए हैं।
संवेदनशील हिस्से पर सटीक निशाना: मुवफ्फक साल्टी एयरबेस तबाह
सैन्य सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, ईरान ने जॉर्डन में स्थित मुवफ्फक साल्टी एयरबेस को अपना मुख्य निशाना बनाया। ईरान की ओर से एक के बाद एक कई शक्तिशाली बैलिस्टिक मिसाइलें दागी गईं। बताया जा रहा है कि यह हमला बेहद योजनाबद्ध तरीके से एयरबेस के सबसे संवेदनशील हिस्से पर किया गया, जहां अमेरिकी सैनिकों के सोने और आराम करने की जगह थी।
जब मिसाइलें एयरबेस की तरफ बढ़ रही थीं, तो वहां तैनात अमेरिकी एयर डिफेंस सिस्टम तुरंत सक्रिय हो गया। अमेरिकी डिफेंस सिस्टम ने इन मिसाइलों को हवा में ही इंटरसेप्ट करने और रोकने की पूरी कोशिश की, लेकिन ईरान की एक अत्यधिक तीव्र बैलिस्टिक मिसाइल सुरक्षा घेरे को भेदते हुए आगे निकल गई। यह मिसाइल सीधे सैनिकों के कंटेनर से बने अस्थायी घरों (बैरेक्स) पर जा गिरी। इस जोरदार धमाके में एयरबेस को भारी नुकसान पहुंचा है। चार गंभीर रूप से घायल सैनिकों को आपातकालीन चिकित्सा के लिए तुरंत वहां से एयरलिफ्ट किया गया है।
पेंटागन का बड़ा आदेश: अमेरिका ने तेज किया पलटवार
जॉर्डन का मुवफ्फक साल्टी एयरबेस अमेरिकी वायुसेना के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि यहां भारी संख्या में अमेरिकी सेना के जवान और आधुनिक फाइटर जेट्स तैनात रहते हैं। अपने सैनिकों की मौत और सैन्य ठिकाने पर हुए इस बड़े नुकसान से भड़के अमेरिका ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है।
पेंटागन को राष्ट्रपति और शीर्ष नेतृत्व की ओर से स्पष्ट और सख्त आदेश जारी कर दिए गए हैं कि ईरान को इस हिमाकत का उसी की भाषा में करारा जवाब दिया जाए। आदेश के तुरंत बाद अमेरिकी सेना ने मिडिल-ईस्ट में ईरानी ठिकानों और उनके समर्थित गुटों पर हमले तेज कर दिए हैं। सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच जंग अब केवल छिटपुट झड़पों तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह एक पूर्ण विकसित क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकती है, जिसमें कई अन्य देश भी अनचाहे रूप से खिंचे चले आएंगे।
कुवैत भी दहल उठा: एकेडमी और वॉटर प्लांट को बनाया निशाना
ईरान की यह आक्रामकता सिर्फ जॉर्डन तक ही सीमित नहीं रही। शनिवार को ईरान ने कुवैत की धरती को भी हिलाकर रख दिया। ईरान की मिसाइलों ने कुवैत की प्रतिष्ठित ‘साद अल-अब्दुल्ला एकेडमी फॉर सिक्योरिटी साइंसेज’ पर जोरदार हमला किया। इस हमले में एकेडमी परिसर को भारी नुकसान पहुंचने की खबर है।
गौरतलब है कि कुवैत में पिछले दो दिनों के भीतर यह दूसरा बड़ा हमला है। इससे पहले ईरान ने कुवैत के एक प्रमुख डिसैलिनेशन प्लांट (समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने वाले संयंत्र) को निशाना बनाया था। जानकारों का कहना है कि खाड़ी देशों में पानी की आपूर्ति के लिए ये डिसैलिनेशन प्लांट जीवन रेखा की तरह काम करते हैं। अगर इन प्लांट्स पर हमले जारी रहे, तो पूरे खाड़ी क्षेत्र के लिए पानी और मानवीय संकट का एक नया और बेहद खतरनाक दौर शुरू हो सकता है।
हवाई क्षेत्र बंद, उड़ानों के बदले रूट; सहमे खाड़ी देश
शनिवार सुबह ईरान की ओर से बढ़ते मिसाइल खतरों को देखते हुए कुवैत प्रशासन ने एहतियातन अपने हवाई क्षेत्र (Airspace) को कुछ समय के लिए पूरी तरह से बंद कर दिया था। इसके कारण अंतरराष्ट्रीय और घरेलू उड़ानों को जहां-तहां रोकना पड़ा और कई महत्वपूर्ण फ्लाइट्स के समय में बदलाव किया गया। हालांकि बाद में स्थिति की समीक्षा कर हवाई क्षेत्र को खोला गया, लेकिन पूरे क्षेत्र में अभी भी हाई अलर्ट घोषित है।
जॉर्डन और कुवैत पर एक साथ हुए इन हमलों ने साबित कर दिया है कि ईरान अब अमेरिकी ठिकानों के साथ-साथ उसके सहयोगी देशों के बुनियादी ढांचे को भी पंगु बनाने की रणनीति पर काम कर रहा है। दूसरी तरफ, अमेरिका के आक्रामक पलटवार ने खाड़ी देशों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। वैश्विक बिरादरी इस बढ़ते तनाव पर नजर रखे हुए है, क्योंकि इस युद्ध का सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ना तय है।
