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The Hill India > Blog > उत्तराखंड > पहाड़ की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था ने छीनी तीन जिंदगियां! प्रसव के लिए 3 जिलों में भटकती रही गर्भवती, अस्पतालों के चक्कर काटने के बाद मां और जुड़वा बच्चों की मौत
उत्तराखंडफीचर्डस्वास्थय

पहाड़ की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था ने छीनी तीन जिंदगियां! प्रसव के लिए 3 जिलों में भटकती रही गर्भवती, अस्पतालों के चक्कर काटने के बाद मां और जुड़वा बच्चों की मौत

The Hill India News
Last updated: September 14, 2026 10:48 am
The Hill India News
Published: September 14, 2026
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अल्मोड़ा से काशीपुर तक इलाज की तलाश में भटकता रहा परिवार, पहले मां ने तोड़ा दम और फिर कुछ ही घंटों में दोनों नवजात भी चल बसे; घटना ने उत्तराखंड की पर्वतीय स्वास्थ्य सेवाओं पर खड़े किए गंभीर सवाल

अल्मोड़ा। उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के सरकारी दावों के बीच अल्मोड़ा जिले से सामने आई एक दर्दनाक घटना ने पूरी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सल्ट ब्लॉक के इनोलू गांव की रहने वाली 24 वर्षीय गर्भवती महिला निशा और उसके गर्भ में पल रहे जुड़वा बच्चों की मौत ने एक परिवार की दुनिया उजाड़ दी। आरोप है कि समय पर उचित इलाज और प्रसव की सुविधा नहीं मिलने के कारण परिवार को अल्मोड़ा से लेकर रामनगर, हल्द्वानी और काशीपुर तक अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़े। इलाज की तलाश में बीता समय आखिरकार तीन जिंदगियों पर भारी पड़ गया।

Contents
अल्मोड़ा से काशीपुर तक इलाज की तलाश में भटकता रहा परिवार, पहले मां ने तोड़ा दम और फिर कुछ ही घंटों में दोनों नवजात भी चल बसे; घटना ने उत्तराखंड की पर्वतीय स्वास्थ्य सेवाओं पर खड़े किए गंभीर सवालअचानक बिगड़ी तबीयत, परिवार ने शुरू की इलाज की तलाशरामनगर से हल्द्वानी और फिर काशीपुर तक भटकता रहा परिवारअस्पताल में मां की मौत, फिर दोनों बच्चों ने भी तोड़ा दमससुर ने व्यवस्था पर लगाए गंभीर आरोपकरीब 12 दिन बाद मामला सामने आने पर उठे सवालस्वास्थ्य निदेशक ने कहा- गलती मिली तो होगी सख्त कार्रवाईतीन जिलों की स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवालस्वास्थ्य मंत्री बदलने के बाद भी व्यवस्था पर सवालअब सबसे बड़ा सवाल- निशा जैसी मौतें कब रुकेंगी?

यह घटना सिर्फ एक परिवार के दुख की कहानी नहीं है, बल्कि पहाड़ी क्षेत्रों में गर्भवती महिलाओं के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं, विशेषज्ञ डॉक्टरों, आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था और रेफरल सिस्टम की वास्तविक स्थिति पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी गर्भवती महिला को प्रसव के समय तत्काल चिकित्सा सहायता की जरूरत पड़े, तो क्या उसे समय पर उपचार मिल पा रहा है?

अचानक बिगड़ी तबीयत, परिवार ने शुरू की इलाज की तलाश

जानकारी के अनुसार सल्ट ब्लॉक के इनोलू गांव निवासी 24 वर्षीय निशा गर्भवती थीं और उनके गर्भ में जुड़वा बच्चे पल रहे थे। बताया गया कि अचानक उन्हें सांस लेने में परेशानी होने लगी। परिवार के सामने उस समय सबसे बड़ी चुनौती उन्हें सुरक्षित और तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने की थी।

परिजन निशा को लेकर 31 अगस्त को रामनगर अस्पताल पहुंचे। यहां समुचित चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें हायर सेंटर हल्द्वानी के लिए रेफर कर दिया गया। इसके बाद परिवार के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया।

एक तरफ गर्भवती महिला की हालत चिंता का विषय बनी हुई थी, वहीं दूसरी तरफ परिवार को यह भी उम्मीद थी कि किसी बड़े अस्पताल में पहुंचने के बाद निशा को बेहतर उपचार मिल जाएगा और उसके गर्भ में पल रहे दोनों बच्चों को सुरक्षित बचाया जा सकेगा।

रामनगर से हल्द्वानी और फिर काशीपुर तक भटकता रहा परिवार

रामनगर से रेफर किए जाने के बाद परिजन निशा को हल्द्वानी लेकर पहुंचे। बताया गया कि वहां भी उन्हें इलाज को लेकर परेशानियों का सामना करना पड़ा। इसके बाद परिवार काशीपुर के अस्पतालों तक पहुंचा।

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल समय का है। गर्भवती महिला की गंभीर स्थिति में हर मिनट महत्वपूर्ण माना जाता है। ऐसे में यदि मरीज को एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक ले जाना पड़े और उचित उपचार मिलने में देरी हो, तो स्थिति और गंभीर हो सकती है।

परिवार का आरोप है कि उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक भटकना पड़ा और निशा को समय रहते वह उपचार नहीं मिल सका, जिसकी उसे जरूरत थी। आखिरकार 2 सितंबर को परिवार निशा को काशीपुर के एक निजी अस्पताल लेकर पहुंचा।

लेकिन तब तक स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी थी।

अस्पताल में मां की मौत, फिर दोनों बच्चों ने भी तोड़ा दम

काशीपुर के निजी अस्पताल में निशा का इलाज शुरू किया गया, लेकिन उसकी हालत लगातार बिगड़ती गई। इलाज के दौरान निशा ने दम तोड़ दिया।

परिवार के लिए यह किसी भयावह सदमे से कम नहीं था। एक ओर गर्भवती महिला की मौत हो चुकी थी और दूसरी ओर उसके गर्भ में पल रहे दो बच्चों की जिंदगी भी खतरे में थी।

डॉक्टरों ने ऑपरेशन के जरिए निशा के गर्भ से दोनों बच्चों को बाहर निकाला। लेकिन दुखद रूप से एक बच्चा पहले ही दम तोड़ चुका था। दूसरे नवजात की जिंदगी भी ज्यादा देर तक नहीं बच सकी और कुछ ही घंटों के भीतर उसने भी दम तोड़ दिया।

इस तरह एक ही परिवार ने कुछ समय के अंतराल में मां और उसके दोनों नवजात बच्चों को खो दिया। जिस घर में बच्चों के आने की खुशियां मनाने की तैयारी होनी चाहिए थी, वहां मातम पसर गया।

ससुर ने व्यवस्था पर लगाए गंभीर आरोप

निशा के ससुर राजू टम्टा ने इस घटना के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि उनकी बहू को समय रहते उचित अस्पताल और समुचित उपचार मिल जाता, तो शायद आज वह और उसके दोनों बच्चे जिंदा होते।

परिवार ने स्वास्थ्य व्यवस्था में लापरवाही और अव्यवस्था के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि पहाड़ की गरीब जनता को बेहतर इलाज के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ता है और कई बार अस्पताल तक पहुंचने में ही इतना समय निकल जाता है कि मरीज की जान बचाना मुश्किल हो जाता है।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र जांच होना जरूरी है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि निशा के इलाज में कहीं चिकित्सकीय लापरवाही हुई या नहीं, रेफरल के दौरान क्या प्रक्रिया अपनाई गई और अलग-अलग अस्पतालों में उसे किस तरह की चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई गई।

करीब 12 दिन बाद मामला सामने आने पर उठे सवाल

इस घटना का एक और चौंकाने वाला पहलू यह है कि मामला कथित तौर पर घटना के करीब 12 दिन बाद सार्वजनिक रूप से सामने आया। उधम सिंह नगर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी एसके गोस्वामी के अनुसार, मामला स्वास्थ्य विभाग के संज्ञान में कुछ दिन पहले ही आया।

उन्होंने कहा कि अभी तक किसी व्यक्ति की ओर से तहरीर नहीं दी गई है और यदि तहरीर प्राप्त होती है तो जांच के बाद उचित कार्रवाई की जाएगी।

स्वास्थ्य विभाग की ओर से यह बयान अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। यदि किसी गर्भवती महिला और उसके दो नवजात बच्चों की मौत कई जिलों में इलाज के लिए भटकने के बाद होती है, तो क्या ऐसे मामले की स्वतः विभागीय जांच नहीं होनी चाहिए? क्या रेफरल प्रक्रिया और अस्पतालों में उपलब्ध सुविधाओं की समीक्षा नहीं की जानी चाहिए?

स्वास्थ्य निदेशक ने कहा- गलती मिली तो होगी सख्त कार्रवाई

उत्तराखंड की स्वास्थ्य निदेशक शिखा जंगपांगी ने भी इस घटना को बेहद दुखद और गंभीर बताया है। उन्होंने कहा कि मामला उनके संज्ञान में आया है और विभाग इसकी जांच कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जांच में यदि किसी की गलती सामने आती है तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।

अब सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि जांच कितनी निष्पक्ष और कितनी जल्दी पूरी होती है। क्योंकि परिवार के लिए यह केवल कार्रवाई का सवाल नहीं है, बल्कि उस सच्चाई को सामने लाने का सवाल है कि आखिर निशा और उसके दोनों बच्चों को बचाया क्यों नहीं जा सका।

तीन जिलों की स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवाल

इस घटना में अल्मोड़ा, नैनीताल और उधम सिंह नगर—तीन जिले सीधे तौर पर चर्चा में हैं। निशा अल्मोड़ा जिले के सल्ट क्षेत्र की रहने वाली थीं। इलाज की तलाश में परिवार रामनगर और हल्द्वानी होते हुए काशीपुर पहुंचा।

इस पूरे घटनाक्रम ने पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों के बीच स्वास्थ्य सुविधाओं के अंतर को भी चर्चा में ला दिया है। पहाड़ों में गंभीर मरीजों को अक्सर हायर सेंटर तक पहुंचाने की चुनौती रहती है। गर्भवती महिलाओं के मामले में यह चुनौती और भी गंभीर हो जाती है, क्योंकि प्रसव के दौरान अचानक पैदा हुई जटिलता के लिए तत्काल विशेषज्ञ चिकित्सा, ऑपरेशन थिएटर, ब्लड बैंक, नवजात शिशु देखभाल और प्रशिक्षित स्टाफ की आवश्यकता हो सकती है।

ऐसे में यदि नजदीकी अस्पताल में पर्याप्त सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो मरीज को जल्द से जल्द ऐसे केंद्र तक पहुंचाना बेहद जरूरी हो जाता है जहां आवश्यक उपचार उपलब्ध हो।

स्वास्थ्य मंत्री बदलने के बाद भी व्यवस्था पर सवाल

उत्तराखंड सरकार ने मार्च 2026 में स्वास्थ्य विभाग में बदलाव करते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय की जिम्मेदारी धन सिंह रावत से लेकर सुबोध उनियाल को सौंपी थी। सरकार की ओर से विभागीय स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने की दिशा में लगातार प्रयास किए जाने की बात कही जाती रही है।

लेकिन निशा की मौत जैसी घटनाएं यह सवाल जरूर खड़ा करती हैं कि क्या इन प्रयासों का वास्तविक लाभ दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों की जनता तक पहुंच रहा है?

मंत्री या अधिकारी बदलने से व्यवस्था तभी बदलेगी, जब गांव स्तर से लेकर जिला अस्पताल और हायर सेंटर तक स्वास्थ्य सेवाओं की पूरी श्रृंखला मजबूत हो। सिर्फ अस्पतालों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। डॉक्टर, विशेषज्ञ, नर्सिंग स्टाफ, दवाइयां, जांच सुविधाएं, एंबुलेंस, ब्लड बैंक, आपातकालीन सेवाएं और समय पर रेफरल—इन सभी व्यवस्थाओं का एक साथ मजबूत होना जरूरी है।

अब सबसे बड़ा सवाल- निशा जैसी मौतें कब रुकेंगी?

निशा और उसके जुड़वा बच्चों की मौत ने उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या गर्भवती महिलाओं के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में पर्याप्त इमरजेंसी सुविधा उपलब्ध है?
क्या रेफरल सिस्टम इतना मजबूत है कि गंभीर मरीज को बिना समय गंवाए सही अस्पताल पहुंचाया जा सके?
क्या सरकारी अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टर और जरूरी संसाधन पर्याप्त हैं?
क्या दूरस्थ गांवों में रहने वाली महिलाओं को समय पर प्रसव पूर्व और आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधा मिल रही है?
और सबसे अहम—अगर किसी अस्पताल में इलाज की सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो मरीज को अगले अस्पताल तक पहुंचाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

इन सवालों का जवाब केवल कागजों में नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर व्यवस्था सुधारकर देना होगा।

निशा और उसके दोनों बच्चों की मौत का अंतिम सच जांच के बाद ही सामने आएगा। यदि कहीं लापरवाही हुई है तो जिम्मेदारी तय होना जरूरी है, लेकिन इससे भी बड़ा लक्ष्य यह होना चाहिए कि उत्तराखंड के किसी भी दूरस्थ गांव की गर्भवती महिला को इलाज के लिए कई जिलों में भटकना न पड़े।

क्योंकि जिस प्रदेश की पहचान देवभूमि के रूप में होती है, वहां किसी मां और उसके अजन्मे या नवजात बच्चों की जिंदगी केवल समय पर इलाज और सही अस्पताल तक पहुंचने की सुविधा के अभाव में खत्म हो जाए, तो यह पूरे स्वास्थ्य तंत्र के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय है।

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