कोच्चि: केरल के एर्नाकुलम जिले से एक बार फिर सामाजिक और राजनीतिक रूप से संवेदनशील भूमि विवाद गरमा गया है। किझक्कंबलम स्थित परीयाथुकावु इलाके में पिछले लंबे समय से रह रहे दलित परिवारों को उनके आशियाने से बेदखल करने के मामले ने एक बार फिर गंभीर तूल पकड़ लिया है। पेरुंबवूर की मुंसिफ कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए पुलिस और प्रशासनिक अमले को एक नया और अंतिम अल्टीमेटम जारी किया है। अदालत ने गुरुवार को पुलिस को स्पष्ट आदेश दिया है कि उक्त विवादित भूभाग पर रह रहे 7 से 8 दलित परिवारों को हर हाल में 23 मई तक वहां से हटाया जाए।
न्यायालय का यह तीखा आदेश उस विस्तृत और गोपनीय रिपोर्ट के आधार पर आया है, जिसे एडवोकेट कमिश्नर ने अदालत के समक्ष पेश किया था। इस रिपोर्ट में साफ तौर पर उल्लेख किया गया था कि बीते बुधवार को प्रशासनिक अमले द्वारा परिवारों को हटाने की कानूनी कोशिश की गई थी, लेकिन स्थानीय निवासियों और प्रदर्शनकारियों के उग्र व भारी विरोध के चलते यह अभियान पूरी तरह से विफल साबित हुआ। अब कोर्ट के इस नए आदेश के बाद पूरे एर्नाकुलम जिले में कानून-व्यवस्था को लेकर तनाव की स्थिति बनी हुई है।
ढाई एकड़ जमीन का मालिकाना हक: अदालती आदेश बनाम स्थानीय दावा
यह पूरा गतिरोध बुधवार को उस समय हिंसक झड़प में बदल गया था, जब पुलिस की एक बहुत बड़ी टीम दंगा नियंत्रण और सुरक्षा उपकरणों से लैस होकर परीयाथुकावु इलाके में दाखिल हुई थी। पुलिस बल यहां एडवोकेट कमिशन की प्रत्यक्ष उपस्थिति में करीब ढाई एकड़ के विशाल भूभाग को खाली कराने के उद्देश्य से पहुंचा था।
अदालती दस्तावेजों के अनुसार, इस जमीन का कानूनी और वास्तविक मालिकाना हक देश की शीर्ष अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के एक पूर्व आदेश के तहत एक अन्य व्यक्ति के पक्ष में घोषित किया जा चुका है। हालांकि, जैसे ही पुलिस और राजस्व अधिकारियों की संयुक्त टीम ने भूमि पर कब्जा लेने के लिए इलाके में प्रवेश करने की कोशिश की, वहां पहले से ही लामबंद स्थानीय लोगों और प्रभावित परिवारों ने मानव श्रृंखला बनाकर तीखा विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया।
देखते ही देखते दोनों पक्षों के बीच स्थिति बेहद तनावपूर्ण और नियंत्रण से बाहर हो गई। प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने और प्रशासनिक अधिकारियों का रास्ता साफ करने के लिए पुलिस को अंततः पानी की बौछारें (वाटर कैनन) छोड़नी पड़ीं। इस हिंसक रस्साकशी के दौरान पुलिस ने कानून व्यवस्था को बाधित करने के आरोप में कई प्रदर्शनकारियों को मौके से हिरासत में भी लिया था।
50 लोगों के खिलाफ गंभीर धाराओं में केस दर्ज, सीपीएम का तीखा पलटवार
इस घटना के बाद पुलिस प्रशासन ने सरकारी कार्य में बाधा डालने वालों के खिलाफ कानूनी शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। थडियिट्टापरम्बु पुलिस स्टेशन के एक वरिष्ठ अधिकारी से मिली जानकारी के अनुसार, पुलिस ने हिंसक विरोध प्रदर्शन में शामिल 50 उपद्रवियों की पहचान स्थापित कर ली है और उन सभी के खिलाफ नामजद व अज्ञात में मुकदमा दर्ज किया है। इन सभी पर ऑन-ड्यूटी सरकारी कर्मचारियों को उनके कानूनी दायित्वों का निर्वहन करने से जबरन रोकने और शांति भंग करने का आरोप है। पुलिस ने इनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित और प्रभावी धाराओं के तहत आपराधिक केस दर्ज किया है।
“इस पूरे घटनाक्रम के बाद केरल की राजनीति में भी उबाल आ गया है। इस केरल दलित परिवार बेदखली विवाद में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) यानी कि सीपीएम (CPM) पूरी तरह से सक्रिय हो गई है। पार्टी ने अदालती आदेश के समानांतर गुरुवार को प्रभावित इलाके में एक विशेष ‘सुरक्षा समिति’ का गठन कर दिया है। सीपीएम का कहना है कि यह समिति इन बेसहारा परिवारों को आगे होने वाली किसी भी संभावित दमनकारी पुलिस कार्रवाई से सुरक्षित रखने के लिए ढाल का काम करेगी।”
‘जनता का आंदोलन ही अब एकमात्र सुरक्षा कवच’: पी. राजीव
सीपीएम के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री पी. राजीव ने तनावग्रस्त इलाके का दौरा कर पीड़ित परिवारों से मुलाकात की। उन्होंने वर्तमान परिदृश्य को लेकर राज्य सरकार पर तीखे हमले किए और इस बेदखली को पूरी तरह अमानवीय करार दिया।
पी. राजीव ने मीडिया से बात करते हुए कहा:
“पिछली एलडीएफ (LDF) सरकार ने इस समूचे क्षेत्र में व्यापक सर्वे की प्रक्रिया पूरी होने के बाद यहां दशकों से रह रहे भूमिहीन परिवारों को नियमों के दायरे में लाकर जमीन का वैध अधिकार (पट्टा) सौंपने की एक ठोस और कल्याणकारी योजना बनाई थी। लेकिन दुर्भाग्यवश, सरकार बदलने से पहले इस तकनीकी सर्वे की प्रक्रिया को मुकम्मल नहीं किया जा सका। अब जिस तरह महिलाओं और बच्चों के खिलाफ पुलिसिया बल का अंधाधुंध प्रयोग किया गया है, वह लोकतांत्रिक समाज में पूरी तरह से निंदनीय है। इसीलिए हमने यहां सुरक्षा समिति का गठन किया है। पहले बिना किसी औपचारिक समिति के भी जनता की सामूहिक इच्छाशक्ति से लोगों की रक्षा हो जाती थी, लेकिन अब सत्ता का मिजाज बदल चुका है। अब केवल जनता का मजबूत और एकजुट आंदोलन ही इन गरीबों को सुरक्षा प्रदान कर सकता है।”
उन्होंने राज्य सरकार से पुरजोर मांग की है कि इस जमीन पर किसी भी प्रकार का बल प्रयोग करने से पहले ठंडे बस्ते में पड़ी सर्वे की प्रक्रिया को अविलंब पूरा किया जाए और तब तक किसी भी तरह की दंडात्मक बेदखली की कार्रवाई पर पूरी तरह रोक लगाई जाए।
गृह मंत्री रमेश चेन्निथला एक्शन में: पुलिस महानिदेशक को दिए जांच के आदेश
मामले की संवेदनशीलता और बढ़ते राजनीतिक दबाव को देखते हुए राज्य के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला ने भी इस प्रकरण में सीधा हस्तक्षेप किया है। उन्होंने किझक्कंबलम में महिलाओं और स्थानीय लोगों पर हुए पुलिसिया एक्शन को बेहद गंभीरता से लिया है।
गृह मंत्री ने राज्य के पुलिस प्रमुख (DGP) रवाडा चंद्रशेखर को एक आधिकारिक पत्र जारी कर इस पूरी घटना की उच्च स्तरीय जांच करने के सख्त निर्देश दिए हैं। उन्होंने डीजीपी को आदेश दिया है कि किझक्कंबलम में हुई पुलिस कार्रवाई, वाटर कैनन के इस्तेमाल और बल प्रयोग की गहन समीक्षा की जाए और इसकी एक विस्तृत रिपोर्ट आगामी 3 दिनों के भीतर गृह मंत्रालय को सौंपी जाए। गृह मंत्री ने स्पष्ट किया कि जांच में विशेष रूप से यह देखा जाना चाहिए कि क्या पुलिस की ओर से कोई प्रक्रियात्मक चूक, मानवाधिकारों का उल्लंघन या अत्यधिक बल प्रयोग जैसी कमी हुई है। साथ ही, उन्होंने भविष्य में ऐसी कानून-व्यवस्था की संवेदनशील परिस्थितियों से अधिक मानवीय ढंग से निपटने के लिए व्यावहारिक सुझाव भी मांगे हैं, ताकि ऐसी अप्रिय घटनाओं की पुनरावृत्ति को रोका जा सके।
सुप्रीम कोर्ट में हारी कानूनी जंग: क्या है इस महाविवाद का इतिहास?
इस केरल दलित परिवार बेदखली विवाद की जड़ें कई दशक पुरानी और कानूनी पेचीदगियों से भरी हुई हैं। जिस ढाई एकड़ जमीन पर ये दलित परिवार लंबे समय से अपने कच्चे-पक्के मकान बनाकर रह रहे हैं, उस पूरी भूमि पर एक निजी व्यक्ति ने अपने मालिकाना हक का दावा ठोकते हुए निचली अदालत से लेकर देश की सर्वोच्च अदालत तक का दरवाजा खटखटाया था। वर्षों तक चली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद, अंततः सुप्रीम कोर्ट ने भी सभी साक्ष्यों के आधार पर उसी निजी व्यक्ति के भूमि अधिकारों को वैध और सर्वोपरि माना।
इसके पश्चात, केरल हाईकोर्ट ने भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश को आधार बनाते हुए स्थानीय प्रशासन और पुलिस को निर्देश दिए थे कि उस व्यक्ति को उसकी जमीन का वास्तविक भौतिक कब्जा दिलाया जाए। इसी न्यायिक आदेश के अनुपालन में प्रशासन यह भारी-भरकम बेदखली अभियान चला रहा है। इसके विपरीत, प्रभावित परिवारों का अब भी यही तर्क है कि वे जिस भूमि पर काबिज हैं, वह कोई निजी संपत्ति नहीं बल्कि सरकारी बंजर भूमि है। हालांकि, अपनी इस दलील के समर्थन में प्रभावित पक्षों द्वारा विभिन्न उच्च अदालतों में दायर की गईं सभी पुनर्विचार याचिकाएं और अपीलें अदालत द्वारा तकनीकी आधारों पर खारिज की जा चुकी हैं, जिसने प्रशासन के लिए बल प्रयोग का रास्ता साफ कर दिया है। अब देखना यह होगा कि 23 मई की अंतिम समय-सीमा से पहले प्रशासन इस गतिरोध का क्या शांतिपूर्ण समाधान निकाल पाता है।


