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नैनीताल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 5 साल से निलंबित पुलिसकर्मी को राहत, वन विभाग द्वारा बंद ग्रामीणों का ऐतिहासिक रास्ता भी खोलने के आदेश

नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने दो अलग-अलग महत्वपूर्ण मामलों में कानून और न्याय की सर्वोच्चता को रेखांकित करते हुए बड़े फैसले सुनाए हैं। पहले मामले में, अदालत ने प्रशासनिक शिथिलता पर कड़ा रुख अपनाते हुए पिछले पांच वर्षों से निलंबित चल रहे एक पुलिसकर्मी का निलंबन आदेश तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है। वहीं, एक अन्य जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने वन विभाग को करारा झटका दिया और खटीमा के ग्रामीणों के सदियों पुराने पारंपरिक रास्ते को बंद करने के प्रयास को अवैध ठहराते हुए उसे खोलने के निर्देश जारी किए हैं।

मामला 1: “अनिश्चितकाल के लिए नहीं खींचा जा सकता निलंबन” – आरक्षी नरेंद्र को मिली बहाली

उत्तराखंड हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने उधम सिंह नगर में तैनात पुलिसकर्मी नरेंद्र की याचिका पर विस्तृत सुनवाई की। याचिका में उधम सिंह नगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) द्वारा 17 जुलाई 2021 को जारी किए गए निलंबन आदेश को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता पर आरोप था कि वह 13 जून 2021 से बिना किसी पूर्व अनुमति या सूचना के अपनी ड्यूटी से अनुपस्थित चल रहा था।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने जोरदार पैरवी करते हुए दलील दी कि पुलिस विभाग ने बिना किसी ठोस प्राथमिक जांच के और अनौपचारिक रूप से यह निलंबन आदेश पारित किया था। सबसे गंभीर बात यह रही कि इस निलंबन को लगभग पांच साल बीत चुके हैं, लेकिन विभाग अब तक किसी तार्किक निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सका है।

जाति प्रमाण पत्र की जांच में देरी बनी आधार न्यायालय के निर्देश पर उपस्थित हुए उप महाधिवक्ता ने पीठ को अवगत कराया कि उधम सिंह नगर एसएसपी ने हाल ही में 27 अप्रैल 2026 को गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) के जिला मजिस्ट्रेट को पत्र लिखकर याचिकाकर्ता के अनुसूचित जनजाति (ST) प्रमाण पत्र के संबंध में जाति जांच समिति से रिपोर्ट मांगी है।

इस पर अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि जब निलंबन को आधा दशक बीत चुका है और जाति प्रमाण पत्र की प्रामाणिकता की जांच अभी भी शुरुआती स्तर पर लंबित है, तो ऐसे में अनुशासनात्मक कार्यवाही के जल्द समाप्त होने की कोई संभावना दिखाई नहीं देती। न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को पूरी तरह सही माना कि किसी भी कर्मचारी का निलंबन अनिश्चितकाल तक जारी नहीं रखा जा सकता। अदालत ने अंततः एसएसपी के पुराने आदेश को निरस्त करते हुए पुलिसकर्मी को बड़ी राहत प्रदान की।

मामला 2: वन विभाग को फटकार, सालभोजी के ग्रामीणों के लिए खुलेगा ‘सदियों पुराना आम रास्ता’

उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने खटीमा क्षेत्र के सालभोजी एवं अन्य सीमावर्ती गांवों के हितों की रक्षा करते हुए एक ऐतिहासिक जनहित याचिका (PIL) का निस्तारण कर दिया। यह याचिका स्थानीय निवासी नरेश कुमार द्वारा दायर की गई थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि वन विभाग ग्रामीणों द्वारा सदियों से उपयोग किए जा रहे एक पारंपरिक मार्ग को अचानक अपनी भूमि घोषित कर बंद कर रहा है।

राजस्व रिकॉर्ड बनाम वन विभाग के दावे पूर्व की सुनवाइयों में राज्य सरकार और वन विभाग ने यह दावा किया था कि उक्त विवादित भूमि वन प्रभाग के अधिकार क्षेत्र में आती है और विभाग इस पर अपना कब्जा वापस ले रहा है। हालांकि, आज की अंतिम सुनवाई के दौरान जब याचिकाकर्ता के अधिवक्ता गौरव भट्ट ने अदालत के समक्ष राजस्व विभाग (रेवेन्यू) के आधिकारिक दस्तावेज और ऐतिहासिक नक्शे पेश किए, तो पूरा मामला पलट गया। दिलचस्प बात यह रही कि ये वही सरकारी रिकॉर्ड थे जो स्वयं राजस्व विभाग द्वारा तैयार किए गए थे।

खंडपीठ की तल्ख टिप्पणी मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने राजस्व रिकॉर्ड का गहनता से अवलोकन करने के बाद पाया कि सालभोजी और आसपास के ग्रामीण वर्ष 1959 से भी बहुत पहले से, यानी पीढ़ियों से इस आम रास्ते का उपयोग करते आ रहे हैं और यह विधिवत रूप से सरकारी कागजात में दर्ज है।

पीठ ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा:

“जब राजस्व विभाग के आधिकारिक रिकॉर्ड स्पष्ट रूप से यह दर्शाते हैं कि यह मार्ग सदियों पुराना आम रास्ता है, तो वन विभाग इसे अपनी भूमि बताकर कैसे बंद कर सकता है? वन विभाग को ग्राम वासियों का एकमात्र आवागमन मार्ग अवरुद्ध करने का कोई विधिक अधिकार नहीं है।”

अदालत ने ग्रामीणों के मौलिक अधिकारों और दैनिक जीवन की सुगमता को प्राथमिकता देते हुए निर्देश दिया कि यह रास्ता तत्काल प्रभाव से आम जनता के लिए खुला रहेगा। इस फैसले से खटीमा के सालभोजी समेत कई गांवों के हजारों निवासियों को बड़ी राहत मिली है, जिनके सामने कनेक्टिविटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया था।

प्रशासनिक जवाबदेही और जनहित का संदेश

नैनीताल हाईकोर्ट के इन दोनों फैसलों ने कार्यपालिका और प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट नजीर पेश की है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि पुलिसकर्मी के मामले में आया निर्णय यह सुनिश्चित करेगा कि विभाग किसी भी कर्मचारी के खिलाफ निलंबन जैसी दंडात्मक कार्रवाई को अंतहीन समय तक लटकाकर उसका मानसिक और पेशेवर उत्पीड़न न करे। वहीं, खटीमा भूमि विवाद मामले में आया फैसला यह साबित करता है कि जनहित और ऐतिहासिक अधिकार किसी भी विभागीय हठधर्मिता से ऊपर हैं।

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