उत्तर प्रदेशफीचर्ड

गंगा इफ्तार विवाद पर इलाहाबाद हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी: “गंगा में चिकन बिरयानी का कचरा फेंकना हिंदुओं की आस्था को पहुंचा सकता है ठेस”

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वाराणसी के चर्चित गंगा इफ्तार विवाद मामले की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि पवित्र गंगा नदी में मांसाहारी भोजन करना और उसके अवशेष या कचरा नदी में फेंकना हिंदू समुदाय की धार्मिक भावनाओं को गंभीर रूप से आहत कर सकता है। अदालत ने कहा कि गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, श्रद्धा और सांस्कृतिक पहचान का केंद्र है।

यह टिप्पणी जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की एकल पीठ ने वाराणसी में गंगा नदी के बीच नाव पर आयोजित इफ्तार पार्टी से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान अपने विस्तृत आदेश में की। अदालत ने धार्मिक स्थलों और सार्वजनिक स्थानों पर सामाजिक संवेदनशीलता बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि किसी भी समुदाय को ऐसा कार्य नहीं करना चाहिए जिससे दूसरे समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत हों या सामाजिक सौहार्द प्रभावित हो।

दरअसल यह मामला मार्च महीने में सामने आए एक वायरल वीडियो से जुड़ा है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में कुछ युवक वाराणसी में गंगा नदी के बीच मोटरबोट पर बैठकर रोजा इफ्तार करते दिखाई दिए थे। वीडियो में कथित तौर पर चिकन बिरयानी और अन्य मांसाहारी भोजन भी दिखाया गया था। आरोप था कि भोजन के अवशेष और कचरा गंगा नदी में फेंका गया। वीडियो वायरल होने के बाद मामला तेजी से चर्चा में आ गया और कई संगठनों ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई।

भारतीय जनता युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष रजत जायसवाल की शिकायत के आधार पर पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए कुल 14 लोगों को गिरफ्तार किया था। आरोपियों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया। स्थानीय अदालत से जमानत याचिका खारिज होने के बाद आरोपियों ने हाई कोर्ट का रुख किया था।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने अदालत में कहा कि आरोपियों ने यह सब जानबूझकर किया और इसका वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड कर सांप्रदायिक तनाव फैलाने की कोशिश की गई। सरकार ने यह भी आशंका जताई कि इसके पीछे किसी बड़ी साजिश या फंडिंग का नेटवर्क हो सकता है।

हालांकि अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया के जरिए तनाव फैलने की आशंका को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन पुलिस इस कथित साजिश और फंडिंग की जांच आरोपियों को जेल में रखे बिना भी जारी रख सकती है। अदालत ने माना कि जांच एजेंसियों को स्वतंत्र रूप से अपनी जांच करने का अधिकार है, लेकिन लंबे समय तक जेल में रखना हर मामले में जरूरी नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि गंगा नदी करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक आस्था से जुड़ी हुई है। ऐसे में वहां मांसाहारी भोजन करना और उसका कचरा नदी में फेंकना निश्चित रूप से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा सकता है। अदालत ने कहा कि भारत जैसे विविधता वाले देश में सभी समुदायों को एक-दूसरे की भावनाओं और परंपराओं का सम्मान करना चाहिए।

हालांकि अदालत ने यह भी पाया कि आरोपियों ने अपने हलफनामे में बिना किसी बहानेबाजी के अपनी गलती स्वीकार की है। अदालत के अनुसार आरोपियों ने समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए खेद व्यक्त किया और अपने कृत्य पर वास्तविक पछतावा जाहिर किया। कोर्ट ने इसे एक महत्वपूर्ण तथ्य मानते हुए कहा कि आरोपियों का यह रवैया उनके पक्ष में जाता है।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले में जेल में बंद कुल 14 आरोपियों में से 8 मुस्लिम युवकों को जमानत दे दी। जस्टिस राजीव लोचन शुक्ला की पीठ ने पांच आरोपियों को राहत दी, जबकि जस्टिस जितेंद्र कुमार सिन्हा की पीठ ने तीन अन्य आरोपियों की जमानत मंजूर की।

अदालत ने पुलिस द्वारा बाद में जोड़ी गई भारतीय न्याय संहिता की धारा 308(5) यानी जबरन वसूली के आरोपों पर भी सवाल उठाए। पुलिस का दावा था कि आरोपियों ने नाविकों को डराकर नाव हासिल की थी। लेकिन अदालत ने कहा कि जांच के काफी बाद इन धाराओं को जोड़ना पहली नजर में संदिग्ध और विरोधाभासी प्रतीत होता है।

कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि आरोपी पेशे से गरीब बुनकर हैं और उनका कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। इसके अलावा वे पिछले दो महीने से जेल में बंद थे। अदालत ने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में उन्हें अनिश्चितकाल तक जेल में रखना उचित नहीं होगा।

इस मामले ने सोशल मीडिया पर भी व्यापक बहस छेड़ दी है। एक पक्ष का कहना है कि धार्मिक स्थलों और आस्था से जुड़े स्थानों पर विशेष संवेदनशीलता बरती जानी चाहिए, जबकि दूसरे पक्ष का कहना है कि किसी भी मामले को सांप्रदायिक रंग देने से बचना चाहिए।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाई कोर्ट ने अपने फैसले में दो महत्वपूर्ण पहलुओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। एक ओर अदालत ने धार्मिक आस्था और सामाजिक सौहार्द की अहमियत को स्वीकार किया, वहीं दूसरी ओर आरोपियों के संवैधानिक अधिकारों और न्यायिक प्रक्रिया का भी ध्यान रखा।

फिलहाल पुलिस इस मामले में कथित साजिश, फंडिंग और सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल करने के एंगल से जांच जारी रखे हुए है। वहीं हाई कोर्ट की टिप्पणी के बाद यह मामला अब देशभर में चर्चा का विषय बन गया है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button