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जल जीवन मिशन में गड़बड़ियों पर केंद्र सरकार सख्त, दूसरे कामों में पैसा खर्च किया तो रुकेगा फंड

देश की महत्वाकांक्षी जल आपूर्ति योजना “जल जीवन मिशन” में सामने आ रही वित्तीय अनियमितताओं और टेंडर गड़बड़ियों को लेकर केंद्र सरकार ने अब सख्त रुख अपना लिया है। केंद्र ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि यदि जल जीवन मिशन का पैसा निर्धारित कार्यों के अलावा किसी अन्य काम में खर्च किया गया, तो संबंधित राज्यों का फंड रोका जा सकता है। इसी दिशा में केंद्र सरकार ने अब “अस्वीकृत खर्चों” की सूची का दायरा बढ़ा दिया है और कई नए नियम लागू किए हैं।

सूत्रों के अनुसार, जल जीवन मिशन के तहत लागत बढ़ाने, ओवरसाइज डीपीआर तैयार करने और टेंडर प्रक्रिया में गड़बड़ियों की लगातार शिकायतें सामने आ रही थीं। इसके बाद केंद्र सरकार ने सख्ती दिखाते हुए उन खर्चों की सूची को बढ़ा दिया है जिनका भुगतान मिशन के तहत नहीं किया जाएगा। पहले इस सूची में सात प्रकार के खर्च शामिल थे, लेकिन अब इसे बढ़ाकर दस कर दिया गया है।

केंद्र सरकार का कहना है कि इस कदम का मुख्य उद्देश्य योजना की लागत को नियंत्रित करना और भ्रष्टाचार व अनियमितताओं पर रोक लगाना है। सरकार को कई राज्यों से शिकायतें मिली थीं कि जल जीवन मिशन के पैसे का उपयोग पेयजल योजनाओं की बजाय अन्य सरकारी निर्माण कार्यों और भवनों पर किया जा रहा है। कुछ जगहों पर गेस्ट हाउस और सरकारी इमारतों के निर्माण में भी इस फंड का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई।

नई गाइडलाइन के तहत अब टेंडर प्रीमियम, योजनाओं के संचालन और रखरखाव, 55 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन से अधिक पानी आपूर्ति से जुड़े अतिरिक्त प्रावधान और शहरी क्षेत्रों में जल आपूर्ति जैसे खर्चों का भुगतान जल जीवन मिशन के फंड से नहीं किया जाएगा।

केंद्र सरकार के सूत्रों के अनुसार, देशभर में लगभग 67 हजार करोड़ रुपये की ओवरसाइज डीपीआर पर फिलहाल रोक लगा दी गई है। सरकार का मानना है कि कई परियोजनाओं में वास्तविक जरूरत से कहीं अधिक लागत दिखाई गई, जिससे सरकारी धन का दुरुपयोग होने की आशंका बढ़ गई।

जल जीवन मिशन में “टेंडर प्रीमियम” सबसे बड़ा विवाद बनकर सामने आया है। टेंडर प्रीमियम का मतलब होता है कि सरकार द्वारा तय बेस प्राइस से अधिक रकम पर ठेकेदारों को काम दिया जाना। जांच एजेंसियों और ऑडिट रिपोर्टों में यह सामने आया कि कई राज्यों में चुनिंदा कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडर अत्यधिक ऊंची दरों पर मंजूर किए गए।

गौरतलब है कि वर्ष 2019 में बनाई गई मूल गाइडलाइन में टेंडर प्रीमियम को अस्वीकृत खर्चों की सूची में रखा गया था। हालांकि वर्ष 2022 में नियमों में ढील दी गई, ताकि बढ़ी हुई बोली का कुछ हिस्सा केंद्र सरकार वहन कर सके। लेकिन इस बदलाव के बाद हजारों योजनाओं में सरकार पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ बढ़ गया। बताया जा रहा है कि 14,586 योजनाओं में केंद्र सरकार पर लगभग 16,389 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार पड़ा।

जांच एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान सहित कई राज्यों में टेंडर प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी, प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी और राज्य भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की जांच में गंभीर गड़बड़ियों की पुष्टि हुई है।

राजस्थान में सामने आया लगभग 960 करोड़ रुपये का घोटाला इस मामले का सबसे बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। जांच में पता चला कि कुछ पसंदीदा कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए टेंडरों को 30 से 40 प्रतिशत तक अधिक प्रीमियम पर मंजूर किया गया। अधिकारियों और ठेकेदारों के बीच कथित मिलीभगत के जरिए एक सिंडिकेट तैयार किया गया, जिसने प्रतिस्पर्धा को खत्म कर दिया।

जांच एजेंसियों के अनुसार, बोली लगाने की प्रक्रिया में “साइट विजिट सर्टिफिकेट” को अनिवार्य बनाया गया, जिससे टेंडर प्रक्रिया की गोपनीयता खत्म हो गई। इसका फायदा उठाकर चुनिंदा ठेकेदारों ने आपस में मिलीभगत कर ऊंची बोलियां लगाईं और सरकार को भारी वित्तीय नुकसान पहुंचाया।

लोकसभा में पेश आंकड़ों के अनुसार, जल जीवन मिशन में वित्तीय अनियमितताओं और टेंडर गड़बड़ियों के मामलों में अब तक 621 सरकारी अधिकारियों, 969 ठेकेदारों और 153 थर्ड पार्टी निरीक्षण एजेंसियों के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है। इनमें निलंबन, ब्लैकलिस्टिंग और एफआईआर जैसी कार्रवाई शामिल हैं। कुल मिलाकर 4,000 से अधिक लोगों पर विभिन्न स्तरों पर कार्रवाई की गई है।

राजस्थान के पूर्व पीएचईडी मंत्री महेश जोशी की गिरफ्तारी भी इस मामले में बड़ी कार्रवाई मानी जा रही है। पहले ईडी और बाद में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने उन्हें कथित घोटाले में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया। ईडी की जांच में यह दावा किया गया कि ठेकेदारों से ऊंचे दामों पर टेंडर देने के बदले कुल टेंडर राशि का लगभग 4 प्रतिशत हिस्सा रिश्वत के रूप में लिया जाता था।

केंद्र सरकार अब इस पूरे मामले को लेकर काफी सतर्क दिखाई दे रही है। सरकार ने साफ कर दिया है कि जल जीवन मिशन का पैसा केवल ग्रामीण पेयजल योजनाओं के लिए ही इस्तेमाल किया जाएगा। यदि किसी राज्य ने इस धन का उपयोग शहरी जल आपूर्ति, सरकारी भवन निर्माण या अन्य गैर-स्वीकृत कार्यों में किया, तो उसका भुगतान रोक दिया जाएगा।

सूत्रों के अनुसार, एक राज्य सरकार ने जल जीवन मिशन के तहत राजधानी शहर में पेयजल आपूर्ति परियोजना शुरू कर दी थी, जबकि नियमों के मुताबिक शहरी क्षेत्रों में इस फंड का उपयोग नहीं किया जा सकता। इसके बाद केंद्र सरकार ने संबंधित भुगतान रोक दिया।

विशेषज्ञों का मानना है कि जल जीवन मिशन जैसी बड़ी योजनाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही बेहद जरूरी है, क्योंकि यह योजना करोड़ों ग्रामीण परिवारों तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने से जुड़ी हुई है। यदि फंड का दुरुपयोग होता है, तो इसका सीधा असर आम लोगों तक पहुंचने वाली सुविधाओं पर पड़ता है।

केंद्र सरकार का कहना है कि आने वाले समय में निगरानी और सख्त की जाएगी ताकि योजना का पैसा सही जगह खर्च हो और ग्रामीण क्षेत्रों में हर घर तक सुरक्षित पेयजल पहुंचाने का लक्ष्य समय पर पूरा किया जा सके।

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