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डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा रुपया: आखिर क्यों टूट रही भारतीय करेंसी और आम आदमी पर क्या होगा असर?

भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए साल 2026 की शुरुआत कई बड़े आर्थिक झटकों के साथ हुई है। शेयर बाजार में भारी उतार-चढ़ाव, वैश्विक तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने भारतीय रुपये (INR) को कमजोर कर दिया है। सोमवार को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर 96.20 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। यह गिरावट केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था, महंगाई, आम लोगों की जेब और छोटे कारोबारों पर पड़ रहा है।

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) लगातार डॉलर बेचकर रुपये को संभालने की कोशिश कर रहा है, लेकिन इसके बावजूद भारतीय करेंसी में कमजोरी जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट केवल अस्थायी नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई गंभीर वैश्विक और घरेलू कारण काम कर रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर रुपया इतना कमजोर क्यों हो रहा है और यह गिरावट कब थमेगी?

1. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें बनी सबसे बड़ी वजह

भारतीय रुपये की कमजोरी के पीछे सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल (Crude Oil) की बढ़ती कीमतें मानी जा रही हैं। ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 110 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुका है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और अपनी जरूरत का करीब 80 प्रतिशत तेल विदेशों से खरीदता है।

तेल आयात के लिए भारत को डॉलर में भुगतान करना पड़ता है। जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारतीय कंपनियों को ज्यादा डॉलर खरीदने पड़ते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव आता है। यही कारण है कि तेल महंगा होने के साथ-साथ रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है।

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मध्य पूर्व में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं। ऐसी स्थिति में भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ेगा और रुपये पर दबाव और ज्यादा गहरा जाएगा।

2. विदेशी निवेशकों की रिकॉर्ड बिकवाली

रुपये की गिरावट की दूसरी सबसे बड़ी वजह विदेशी संस्थागत निवेशकों (FPI) की भारी बिकवाली है। ईरान युद्ध और वैश्विक अनिश्चितता के बाद विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से बड़ी मात्रा में पैसा निकालना शुरू कर दिया है।

पिछले कुछ महीनों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार से करीब 20 अरब डॉलर से ज्यादा की रकम निकाली है। जब विदेशी निवेशक भारत से पैसा निकालते हैं, तो वे भारतीय संपत्तियों को बेचकर डॉलर खरीदते हैं और पैसा अपने देश ले जाते हैं। इससे बाजार में डॉलर की मांग और बढ़ जाती है तथा रुपया कमजोर होता जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका और यूरोप के बॉन्ड बाजार में बढ़ते रिटर्न की वजह से निवेशक अब जोखिम वाले बाजारों से दूरी बना रहे हैं। भारत जैसे उभरते बाजारों में निवेश घटने से रुपये की हालत और खराब हो रही है।

3. बढ़ता चालू खाता घाटा बढ़ा रहा चिंता

भारत का चालू खाता घाटा (Current Account Deficit – CAD) भी तेजी से बढ़ रहा है। महंगे तेल आयात और कमजोर डॉलर इनफ्लो के कारण इस वित्त वर्ष में चालू खाता घाटा जीडीपी के 2 प्रतिशत से ऊपर जाने का अनुमान है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यदि किसी देश का आयात लगातार निर्यात से ज्यादा रहता है, तो विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ने लगता है। भारत के साथ भी फिलहाल यही स्थिति बन रही है। निर्यात की गति धीमी है जबकि आयात बिल लगातार बढ़ रहा है।

बैंक ऑफ अमेरिका सिक्योरिटीज की रिपोर्ट के अनुसार यह घाटा साल 2012-13 के बाद सबसे अधिक हो सकता है। लगातार बढ़ता घाटा विदेशी निवेशकों का भरोसा भी कमजोर करता है और करेंसी पर दबाव बढ़ाता है।

4. ग्लोबल बॉन्ड यील्ड में उछाल

वैश्विक बाजारों में बढ़ती अनिश्चितता के कारण अमेरिकी और अन्य विकसित देशों के सरकारी बॉन्ड की यील्ड तेजी से बढ़ रही है। जब अमेरिकी बॉन्ड पर ज्यादा सुरक्षित और स्थिर रिटर्न मिलने लगता है, तो निवेशक भारत जैसे उभरते बाजारों से पैसा निकालने लगते हैं।

इसका सीधा असर भारतीय शेयर बाजार और रुपये पर पड़ता है। निवेशक डॉलर आधारित सुरक्षित निवेश की ओर भागते हैं, जिससे डॉलर मजबूत और रुपया कमजोर हो जाता है।

अंतरराष्ट्रीय वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक वैश्विक बाजारों में स्थिरता नहीं आती, तब तक उभरती अर्थव्यवस्थाओं की करेंसी पर दबाव बना रहेगा।

5. विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ता दबाव

भारतीय रिजर्व बैंक रुपये को संभालने के लिए लगातार डॉलर बेच रहा है। संकट शुरू होने से पहले भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 720 अरब डॉलर से ज्यादा था, लेकिन अब यह घटकर करीब 697 अरब डॉलर के आसपास पहुंच गया है।

हालांकि भारत के पास अभी भी पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है, लेकिन लगातार डॉलर बेचने की भी एक सीमा होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बाजार में हस्तक्षेप करके लंबे समय तक रुपये को स्थिर नहीं रखा जा सकता।

आरबीआई ने सट्टेबाजी रोकने, तेल आयातकों के लिए विशेष डॉलर सुविधा देने और बाजार में तरलता बनाए रखने जैसे कई कदम उठाए हैं। इसके बावजूद रुपये में कमजोरी जारी है।

2026 में एशिया की सबसे कमजोर करेंसी बना रुपया

इस साल भारतीय रुपया एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली प्रमुख करेंसी बन गया है। फरवरी में ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से रुपया करीब 5.5 प्रतिशत टूट चुका है।

सोमवार की गिरावट लगातार पांचवां कारोबारी सत्र था जब रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा। इससे निवेशकों में घबराहट और बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यदि वैश्विक हालात नहीं सुधरे, तो आने वाले समय में रुपया और कमजोर हो सकता है।

सरकार और RBI के सामने क्या विकल्प?

रुपये की गिरावट को रोकने के लिए सरकार और रिजर्व बैंक के पास कई विकल्प मौजूद हैं, लेकिन इनमें से कई फैसले आम लोगों के लिए मुश्किलें बढ़ा सकते हैं।

पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी

सरकार तेल कंपनियों के घाटे को कम करने के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ा सकती है। इससे तेल आयात पर पड़ने वाला बोझ कम होगा, लेकिन आम आदमी की जेब पर असर पड़ेगा।

ब्याज दरों में बढ़ोतरी

महंगाई और रुपये की कमजोरी को नियंत्रित करने के लिए RBI ब्याज दरें बढ़ा सकता है। इससे लोन महंगे हो जाएंगे और EMI का बोझ बढ़ सकता है।

डॉलर जमा योजना

सरकार एनआरआई निवेश बढ़ाने के लिए विशेष डॉलर डिपॉजिट स्कीम ला सकती है ताकि देश में विदेशी मुद्रा का प्रवाह बढ़े।

विदेश भेजे जाने वाले पैसे पर नियंत्रण

विदेशों में भेजे जाने वाले पैसों पर निगरानी और नियंत्रण भी बढ़ाया जा सकता है ताकि डॉलर की मांग कम हो सके।

आम आदमी की जेब पर क्या होगा असर?

रुपये की कमजोरी का सबसे बड़ा असर आम लोगों पर पड़ रहा है। भारत बड़ी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, पेट्रोलियम उत्पाद और कई जरूरी चीजें आयात करता है। जब रुपया कमजोर होता है, तो आयात महंगा हो जाता है और कंपनियां बढ़ी हुई लागत का बोझ ग्राहकों पर डाल देती हैं।

इसका मतलब है कि आने वाले समय में पेट्रोल-डीजल, गैस सिलेंडर, मोबाइल फोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रॉनिक्स और कई अन्य वस्तुएं महंगी हो सकती हैं।

विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए भी मुश्किलें बढ़ गई हैं। अमेरिका और यूरोप में पढ़ाई की लागत रुपये की कमजोरी के कारण लाखों रुपये बढ़ चुकी है।

छोटे कारोबारों पर सबसे ज्यादा संकट

रुपये की गिरावट का सबसे बड़ा असर छोटे और मझोले कारोबारों पर पड़ रहा है। काजू उद्योग, फूड प्रोसेसिंग, टेक्सटाइल और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर जैसी कई इंडस्ट्री कच्चे माल के आयात पर निर्भर हैं।

केरल के काजू कारोबारियों का कहना है कि अफ्रीका से आयात होने वाला कच्चा माल अब काफी महंगा हो गया है। लागत बढ़ने से कई प्रोसेसिंग यूनिट्स बंद होने की कगार पर पहुंच गई हैं।

छोटे व्यापारियों के पास करेंसी जोखिम से बचने के लिए बड़े कॉरपोरेट्स जैसी सुविधाएं नहीं होतीं। ऐसे में रुपये की कमजोरी उनके लिए बड़ा संकट बनती जा रही है।

आखिर कब रुकेगी रुपये की गिरावट?

विशेषज्ञों का मानना है कि रुपये की स्थिति काफी हद तक वैश्विक हालात पर निर्भर करेगी। यदि ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया संकट जल्द खत्म होता है और कच्चे तेल की कीमतें नीचे आती हैं, तो रुपये को राहत मिल सकती है।

लेकिन यदि वैश्विक तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, विदेशी निवेशकों की बिकवाली बढ़ती है और तेल महंगा बना रहता है, तो रुपये पर दबाव और बढ़ सकता है।

फिलहाल RBI और सरकार दोनों मिलकर स्थिति संभालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन आने वाले कुछ महीने भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपये के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण माने जा रहे हैं।

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