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The Hill India > Blog > उत्तराखंड > नैनीताल हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: खटीमा में सालों पुराने रास्ते को बंद करने पर सरकार से मांगा जवाब, खुर्पाताल का डायनेस्टी रिसॉर्ट सील
उत्तराखंडफीचर्ड

नैनीताल हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: खटीमा में सालों पुराने रास्ते को बंद करने पर सरकार से मांगा जवाब, खुर्पाताल का डायनेस्टी रिसॉर्ट सील

The Hill India News
Last updated: May 13, 2026 1:29 am
The Hill India News
Published: May 13, 2026
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नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने जनहित और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े दो अलग-अलग मामलों में कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने जहाँ एक ओर उधम सिंह नगर के खटीमा में ग्रामीणों के पारंपरिक रास्ते को वन विभाग द्वारा रोके जाने पर राज्य सरकार को तलब किया है, वहीं दूसरी ओर प्रदूषण मानकों का उल्लंघन करने वाले खुर्पाताल स्थित ‘डायनेस्टी रिसॉर्ट’ को कोई भी राहत देने से इनकार कर दिया है।

Contents
खटीमा रास्ता विवाद: 1959 के रिकॉर्ड बनाम वन विभाग का दावाअदालत ने सरकार को घेराखुर्पाताल डायनेस्टी रिसॉर्ट: प्रदूषण बोर्ड की कार्रवाई और कोर्ट की फटकारमैदान में कार्रवाई: रिसॉर्ट सील, बिजली कटी

अदालत की इस सख्ती के बीच प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए डायनेस्टी रिसॉर्ट को सील कर उसका बिजली कनेक्शन भी काट दिया है।

खटीमा रास्ता विवाद: 1959 के रिकॉर्ड बनाम वन विभाग का दावा

पहला मामला उधम सिंह नगर जिले के खटीमा ब्लॉक के सालभोजी और अन्य समीपवर्ती गांवों का है। यहाँ वन विभाग ने एक ऐसे रास्ते को अपनी संपत्ति बताकर बंद कर दिया है, जिसका उपयोग स्थानीय ग्रामीण दशकों से कर रहे हैं। इस मामले में नरेश कुमार द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने राज्य सरकार को चार हफ्ते के भीतर विस्तृत जवाब पेश करने का आदेश दिया है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि सालभोजी गांव के लोग वर्ष 1959 से इस मार्ग का उपयोग आवाजाही के लिए कर रहे हैं और यह रास्ता ग्राम सभा के राजस्व अभिलेखों (Revenue Records) में बाकायदा दर्ज है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि वन विभाग अब इस भूमि पर अपना दावा ठोकते हुए ग्रामीणों का एकमात्र संपर्क मार्ग बंद कर रहा है, जिससे सैकड़ों लोगों के सामने आवागमन का संकट खड़ा हो गया है।

अदालत ने सरकार को घेरा

सुनवाई के दौरान जब राज्य सरकार के पैरोकारों ने तर्क दिया कि यह भूमि वन प्रभाग की है और विभाग केवल अपना कब्जा वापस ले रहा है, तो खंडपीठ ने इस पर तीखी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि जब जनहित याचिका में लगाए गए दस्तावेज स्वयं सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा हैं और उनमें यह रास्ता दर्ज है, तो सरकार इसे केवल वन प्रभाग की भूमि बताकर कैसे पल्ला झाड़ सकती है? कोर्ट ने सरकार को निर्देश दिया है कि वह चार सप्ताह में इन दस्तावेजों के अनुरूप ही अपनी स्थिति स्पष्ट करे।


खुर्पाताल डायनेस्टी रिसॉर्ट: प्रदूषण बोर्ड की कार्रवाई और कोर्ट की फटकार

नैनीताल के पास खुर्पाताल स्थित प्रसिद्ध ‘डायनेस्टी रिसॉर्ट’ के लिए भी कानूनी मुश्किलें बढ़ गई हैं। उत्तराखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UKPCB) के नियमों की अनदेखी करने के मामले में हाईकोर्ट ने रिसॉर्ट मालिक को किसी भी प्रकार की अंतरिम राहत देने से साफ मना कर दिया। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने होटल प्रबंधन से पूछा है कि बार-बार समन जारी होने के बावजूद उन्होंने बोर्ड के निर्देशों का अनुपालन क्यों नहीं किया।

प्रदूषण बोर्ड के गंभीर आरोप: सुनवाई के दौरान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अदालत को बताया कि होटल स्वामी लगातार नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं। बोर्ड के अनुसार:

  • होटल का सीवर ट्रीटमेंट प्लांट (STP) मानकों के अनुरूप काम नहीं कर रहा था।

  • सॉलिड वेस्ट (ठोस अपशिष्ट) को डस्टबिन में डालने के बजाय खुले मैदानों में फेंका जा रहा था, जिससे खुर्पाताल की संवेदनशील पारिस्थितिकी को खतरा पैदा हो गया।

  • होटल कर्मियों पर बोर्ड के अधिकारियों को डराने-धमकाने और सरकारी कार्य में बाधा डालने के भी आरोप लगे हैं।

मैदान में कार्रवाई: रिसॉर्ट सील, बिजली कटी

एक तरफ हाईकोर्ट में सुनवाई चल रही थी, तो दूसरी तरफ प्रशासनिक अमले ने खुर्पाताल में बड़ी कार्रवाई को अंजाम दिया। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और स्थानीय प्रशासन की टीम ने डायनेस्टी रिसॉर्ट को सील कर दिया है। नियमों की धज्जियां उड़ाने के कारण होटल का विद्युत कनेक्शन तत्काल प्रभाव से काट दिया गया है और इसके व्यावसायिक उपयोग पर पूर्णतः रोक लगा दी गई है। इस कार्रवाई के दौरान होटल प्रबंधन और अधिकारियों के बीच तीखी नोकझोंक भी हुई, लेकिन प्रशासन ने सख्त रुख अपनाते हुए प्रक्रिया को पूरा किया।

नैनीताल हाईकोर्ट के ये दोनों फैसले स्पष्ट संकेत देते हैं कि चाहे मामला ग्रामीणों के अधिकारों का हो या पर्यावरण की सुरक्षा का, नियमों की अनदेखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। खटीमा के मामले में जहाँ सरकार को अपनी स्पष्टता साबित करनी है, वहीं खुर्पाताल के मामले ने पर्यटन उद्योग से जुड़े लोगों को कड़ा संदेश दिया है कि व्यावसायिक लाभ के लिए पर्यावरण से समझौता भारी पड़ सकता है।

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