
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका-इजरायल के बीच जारी टकराव का असर अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है। इसी बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से ईंधन बचाने, गैर-जरूरी खर्च रोकने और सामूहिक जिम्मेदारी निभाने की अपील की है। प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद देश की राजनीति भी गरमा गई है। कांग्रेस ने सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर देश को ऐसी स्थिति का सामना क्यों करना पड़ रहा है और सरकार ने पहले से तैयारी क्यों नहीं की।
हैदराबाद में आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि दुनिया इस समय आर्थिक अस्थिरता, सप्लाई चेन में व्यवधान और अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के दौर से गुजर रही है। इसका सीधा असर महंगाई और जरूरी वस्तुओं की कीमतों पर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि भारत को इस चुनौतीपूर्ण समय में मजबूत बनाए रखने के लिए सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि आम नागरिकों की भागीदारी भी जरूरी है।
प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से एक साल तक गैर-जरूरी सोने की खरीदारी से बचने की अपील की। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयात करने वाले देशों में शामिल है और बड़े पैमाने पर सोना खरीदने से विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है। अगर लोग जरूरत न होने पर सोना खरीदने से बचें, तो इससे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत रखने में मदद मिलेगी। प्रधानमंत्री ने इसे “राष्ट्रहित में छोटा लेकिन महत्वपूर्ण योगदान” बताया।
इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने पेट्रोल और डीजल की बचत पर भी विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत अभी भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। ऐसे में वैश्विक संकट के दौरान तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। उन्होंने लोगों से सार्वजनिक परिवहन का अधिक इस्तेमाल करने, कार-पूलिंग अपनाने और जहां संभव हो वहां निजी वाहनों का कम उपयोग करने की अपील की।
प्रधानमंत्री ने कहा कि मेट्रो, बस और रेल परिवहन जैसे विकल्पों को प्राथमिकता देने से ईंधन की खपत कम होगी और विदेशी मुद्रा की बचत भी होगी। उन्होंने उद्योगों और व्यापारिक संस्थानों से भी माल ढुलाई के लिए सड़क परिवहन की जगह रेल नेटवर्क का अधिक उपयोग करने का आग्रह किया। इसके अलावा इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की बात भी कही गई।
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने कोविड-19 महामारी के दौरान अपनाई गई व्यवस्थाओं का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि महामारी के समय वर्क फ्रॉम होम, ऑनलाइन मीटिंग और वर्चुअल कॉन्फ्रेंस जैसी व्यवस्थाओं ने देश को कठिन हालात में भी कामकाज जारी रखने में मदद की थी। उन्होंने सुझाव दिया कि जरूरत पड़ने पर कंपनियां और संस्थान फिर से इन उपायों को अपनाने पर विचार कर सकते हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि इससे समय, संसाधन और ईंधन तीनों की बचत होगी।
हालांकि प्रधानमंत्री की इस अपील को लेकर विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। कांग्रेस ने सवाल उठाया कि यदि स्थिति इतनी गंभीर है तो सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा को लेकर पहले से ठोस रणनीति क्यों नहीं बनाई। कांग्रेस महासचिव K. C. Venugopal ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि ईरान-अमेरिका युद्ध को तीन महीने से अधिक समय हो चुका है, लेकिन सरकार अब भी ऊर्जा संकट से निपटने को लेकर स्पष्ट योजना पेश नहीं कर पाई है।
वेणुगोपाल ने आरोप लगाया कि सरकार आम लोगों पर बोझ डालने की कोशिश कर रही है, जबकि उसे पहले से पर्याप्त ईंधन भंडारण और वैकल्पिक आपूर्ति व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि नागरिकों से पेट्रोल बचाने और वर्क फ्रॉम होम अपनाने की अपील करना यह दिखाता है कि सरकार संकट से निपटने की तैयारी में पीछे रह गई है।
कांग्रेस ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार की प्राथमिकता केवल चुनावी राजनीति बनकर रह गई है, जबकि देश गंभीर आर्थिक चुनौतियों का सामना कर रहा है। विपक्ष का कहना है कि यदि सरकार ने समय रहते ऊर्जा आयात के वैकल्पिक स्रोत तैयार किए होते और रणनीतिक तेल भंडार को मजबूत किया होता, तो आज लोगों से इस तरह की अपील करने की जरूरत नहीं पड़ती।
दूसरी ओर सरकार समर्थकों का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी ने लोगों से जो अपील की है, वह किसी मजबूरी का संकेत नहीं बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी निभाने का संदेश है। उनका तर्क है कि वैश्विक संकट के समय दुनिया के कई देशों में सरकारें नागरिकों से ऊर्जा बचाने की अपील करती रही हैं। भारत में अभी तक पेट्रोल और डीजल की कीमतें नियंत्रित हैं, जबकि कई देशों में कीमतों में भारी उछाल देखा गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया में जारी तनाव अगर लंबे समय तक बना रहता है, तो इसका असर भारत समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी सीधे महंगाई को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में सरकार और जनता दोनों के स्तर पर ऊर्जा बचत और संसाधनों के समझदारी से उपयोग की जरूरत बढ़ जाती है।
फिलहाल प्रधानमंत्री मोदी की अपील और कांग्रेस के सवालों के बीच राजनीतिक बहस तेज हो गई है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार ऊर्जा सुरक्षा और महंगाई नियंत्रण के लिए कौन-कौन से कदम उठाती है और वैश्विक हालात का भारत की अर्थव्यवस्था पर कितना असर पड़ता है।



