
वाशिंगटन डीसी/तेहरान: दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका और पश्चिम एशिया के ताकतवर मुल्क ईरान के बीच जारी सैन्य गतिरोध अब एक खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। पिछले कई महीनों से जारी खूनी संघर्ष और आर्थिक खींचतान के बीच उम्मीद थी कि शांति की कोई राह निकलेगी, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक कड़े फैसले ने इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। ट्रंप ने ईरान द्वारा भेजे गए युद्ध विराम और शांति के प्रस्ताव को “पूरी तरह अस्वीकार्य” (Totally Unacceptable) बताते हुए सिरे से खारिज कर दिया है। इस फैसले के बाद अब खाड़ी देशों सहित पूरी दुनिया में तीसरे विश्व युद्ध जैसी सुगबुगाहट तेज हो गई है, जिसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और तेल आपूर्ति पर पड़ रहा है।
“अब और नहीं हंस पाएंगे”: ट्रंप का सीधा और सख्त संदेश
रविवार को व्हाइट हाउस को ईरान की ओर से एक सीलबंद प्रस्ताव प्राप्त हुआ था। राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि अमेरिका ईरान युद्ध 2026 को समाप्त करने के लिए तेहरान कुछ रियायतें देने को तैयार है। हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने पसंदीदा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म “ट्रुथ सोशल” पर एक पोस्ट के जरिए ईरान के मंसूबों को स्पष्ट कर दिया।
ट्रंप ने लिखा, “मैंने अभी ईरान के तथाकथित ‘प्रतिनिधियों’ का जवाब पढ़ा है। मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं आया- यह पूरी तरह अस्वीकार्य है! वे लगभग 50 वर्षों से अमेरिका के साथ लुका-छिपी का खेल खेल रहे हैं, लेकिन अब वे और नहीं हंस पाएंगे।“
मीडिया आउटलेट ‘एक्सियोस’ के साथ एक संक्षिप्त बातचीत में ट्रंप ने प्रस्ताव की बारीकियों का खुलासा करने से तो इनकार कर दिया, लेकिन यह जरूर कहा कि ईरान का व्यवहार “अनुचित” है। ट्रंप की इस प्रतिक्रिया से साफ है कि अमेरिका अब केवल बातचीत नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर समझौता चाहता है।
रणनीतिक हलचल: नेतन्याहू से मंत्रणा और सैन्य विकल्प
ट्रंप के इस कड़े रुख के पीछे इजरायल की भी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है। राष्ट्रपति ने खुद स्वीकार किया कि उन्होंने इस मुद्दे पर इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से लंबी और गंभीर चर्चा की है। इस बातचीत के बाद यह कयास लगाए जा रहे हैं कि अमेरिका और इजरायल मिलकर ईरान के परमाणु ठिकानों या उसके सैन्य बुनियादी ढांचे पर कोई बड़ा प्रहार कर सकते हैं।
इस बीच, रिपब्लिकन सीनेटर और ट्रंप के करीबी सहयोगी लिंडसे ग्राहम ने आग में घी डालने का काम किया है। ग्राहम ने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि अब कूटनीति का समय खत्म हो चुका है और अमेरिका को सैन्य विकल्प (Military Option) पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। उन्होंने ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम प्लस’ (Strait of Hormuz में नौसैनिक ऑपरेशन) को फिर से शुरू करने का संकेत दिया है, जिसका उद्देश्य ईरान के प्रभाव को समुद्र में पूरी तरह समाप्त करना है।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज: वैश्विक अर्थव्यवस्था की ‘गला दबाने’ वाली नस
28 फरवरी से शुरू हुए इस युद्ध ने दुनिया को 1970 के दशक के तेल संकट की याद दिला दी है। ईरान ने अपनी भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाते हुए ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ को लगभग अवरुद्ध कर दिया है। यह वही समुद्री मार्ग है जहाँ से दुनिया का 20% से अधिक कच्चा तेल गुजरता है।
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ईंधन की कमी: यूरोप और एशिया के कई देशों में पेट्रोल-डीजल की भारी किल्लत हो गई है।
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आर्थिक मंदी का खतरा: परिवहन लागत बढ़ने से वैश्विक व्यापार बुरी तरह प्रभावित हुआ है।
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युद्धविराम का भ्रम: हालांकि 8 अप्रैल से एक अस्थायी युद्धविराम लागू है, लेकिन ट्रंप के ताजा बयान के बाद इसके टूटने का खतरा मंडराने लगा है।
ईरान का अड़ियल रुख और 50 साल की कड़वाहट
ईरान की ओर से अभी तक ट्रंप के इस बयान पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन तेहरान के तेवर हमेशा से अमेरिका विरोधी रहे हैं। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ही दोनों देशों के बीच संबंधों में खटास है। ट्रंप का मानना है कि ईरान शांति प्रस्तावों का उपयोग केवल समय बिताने और अपनी सैन्य शक्ति को पुनर्गठित करने के लिए कर रहा है।
प्रोजेक्ट फ्रीडम प्लस: क्या समुद्र में छिड़ेगी बड़ी जंग?
अगर अमेरिका ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम प्लस’ के तहत सैन्य कार्रवाई शुरू करता है, तो इसका मतलब होगा कि अमेरिकी नौसेना सीधे तौर पर ईरानी नौसैनिक जहाजों को निशाना बनाएगी। लिंडसे ग्राहम का तर्क है कि जब तक ईरान को अपनी हरकतों की सैन्य कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी, वह अंतरराष्ट्रीय शिपिंग और अमेरिकी सहयोगियों पर हमले करना बंद नहीं करेगा।
दुनिया पर मंडराता खतरा
अमेरिका ईरान युद्ध 2026 केवल दो देशों की जंग नहीं रह गई है, बल्कि यह एक वैश्विक ऊर्जा युद्ध में तब्दील हो चुकी है। ट्रंप का शांति प्रस्ताव को ठुकराना यह संकेत देता है कि आने वाले दिन और भी अधिक हिंसक और अनिश्चित हो सकते हैं। यदि बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद हो गया, तो दुनिया को एक ऐसे संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा जिसकी कीमत हर आम नागरिक को अपनी जेब और अपनी सुरक्षा से चुकानी पड़ेगी।
अगले कुछ दिन वाशिंगटन और तेहरान के बीच ‘शक्ति प्रदर्शन’ के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होने वाले हैं। क्या कूटनीति की कोई खिड़की अभी भी खुली है, या फिर खाड़ी की लहरें अब बारूद की गंध से भर जाएंगी? पूरी दुनिया की नजरें अब व्हाइट हाउस के अगले आदेश पर टिकी हैं।



