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Reading: केजरीवाल-सिसोदिया ने किया कोर्ट में पेशी से इनकार, न्यायपालिका और राजनीति के बीच छिड़ा नया ‘सत्याग्रह’
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केजरीवाल-सिसोदिया ने किया कोर्ट में पेशी से इनकार, न्यायपालिका और राजनीति के बीच छिड़ा नया ‘सत्याग्रह’

The Hill India News
Last updated: April 29, 2026 2:26 am
The Hill India News
Published: April 29, 2026
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नई दिल्ली: दिल्ली की राजनीति और न्यायिक गलियारों में आज उस वक्त हड़कंप मच गया जब दिल्ली शराब नीति घोटाला मामले के दो सबसे बड़े नाम, पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया ने दिल्ली हाई कोर्ट में पेश होने से स्पष्ट इनकार कर दिया। बुधवार को होने वाली इस महत्वपूर्ण सुनवाई से पहले दोनों नेताओं ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में अपनी उपस्थिति दर्ज न कराने का फैसला लेकर कानूनी विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया है।

Contents
‘न्याय की उम्मीद टूटी, अब सत्याग्रह का रास्ता’: केजरीवाल की चिट्ठीक्यों उठा ‘हितों के टकराव’ (Conflict of Interest) का मुद्दा?अभियुक्तों की अनुपस्थिति में क्या होगी कानूनी प्रक्रिया?दिल्ली शराब नीति मामला: अब तक की स्थिति

केजरीवाल ने जहाँ इसे महात्मा गांधी के ‘सत्याग्रह’ की राह बताया है, वहीं सिसोदिया ने भी अपने नेता के कदम का पुरजोर समर्थन करते हुए अदालत को अपनी अनुपस्थिति की लिखित सूचना दे दी है।

‘न्याय की उम्मीद टूटी, अब सत्याग्रह का रास्ता’: केजरीवाल की चिट्ठी

इस नाटकीय घटनाक्रम की शुरुआत 27 अप्रैल को हुई, जब अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को एक भावुक और कड़ा पत्र लिखा। पत्र में केजरीवाल ने स्पष्ट रूप से कहा कि मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए उनकी “न्याय मिलने की उम्मीद टूट गई है।” उन्होंने तर्क दिया कि जब व्यवस्था निष्पक्षता के बुनियादी सिद्धांतों से भटक जाए, तो उनके पास राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बताए ‘सत्याग्रह’ के मार्ग पर चलने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।

ठीक एक दिन बाद, मनीष सिसोदिया ने भी इसी सुर में सुर मिलाते हुए अदालत को सूचित किया कि वे भी सुनवाई के दौरान मौजूद नहीं रहेंगे। राजनीतिक विश्लेषक इसे आम आदमी पार्टी (AAP) की सोची-समझी रणनीति मान रहे हैं, जिसके तहत वे इस कानूनी लड़ाई को जनता की अदालत में ‘अन्याय के विरुद्ध संघर्ष’ के रूप में पेश करना चाहते हैं।

क्यों उठा ‘हितों के टकराव’ (Conflict of Interest) का मुद्दा?

केजरीवाल और सिसोदिया के इस कड़े फैसले के पीछे सबसे बड़ी वजह जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के परिवार और केंद्र सरकार के वकीलों के बीच कथित पेशेवर संबंध हैं। केजरीवाल द्वारा अदालत में दाखिल हलफनामे में जो दावे किए गए हैं, वे बेहद गंभीर हैं:

  • सॉलिसिटर जनरल से संबंध: केजरीवाल का आरोप है कि जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा के दोनों बच्चे सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के अधीन कार्य करते हैं।

  • पैनल काउंसिल का तर्क: हलफनामे के अनुसार, जज के बच्चे केंद्र सरकार के ‘पैनल काउंसिल’ का हिस्सा हैं और उन्हें मामलों का आवंटन सीधे तौर पर तुषार मेहता के माध्यम से होता है।

  • निष्पक्षता पर सवाल: चूंकि सीबीआई (CBI) की ओर से तुषार मेहता ही मुख्य वकील के तौर पर पक्ष रख रहे हैं, इसलिए केजरीवाल की दलील है कि ऐसी स्थिति में ‘हितों के टकराव’ की प्रबल आशंका पैदा होती है। उनका सवाल है कि क्या कोई न्यायाधीश उस पक्ष के खिलाफ आदेश दे पाएगा जिसका सीधा प्रभाव उनके परिवार के करियर से जुड़ा हो?

अभियुक्तों की अनुपस्थिति में क्या होगी कानूनी प्रक्रिया?

अब सबसे बड़ा संवैधानिक और कानूनी प्रश्न यह है कि अगर प्रतिवादी अदालत में नहीं आते हैं, तो क्या सुनवाई रुक जाएगी? कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय न्याय व्यवस्था में इसके स्पष्ट प्रावधान हैं:

  1. सुनवाई जारी रहना: अदालत चाहे तो प्रतिवादियों की गैरमौजूदगी में भी कार्यवाही को आगे बढ़ा सकती है। कोर्ट यह सुनिश्चित करने के लिए कि अभियुक्त का पक्ष अनसुना न रह जाए, एक स्वतंत्र वकील या ‘एमीकस क्यूरी’ (अदालत का मित्र) नियुक्त कर सकता है।

  2. सख्त रुख और वारंट: यदि अदालत को लगता है कि अनुपस्थिति का कारण जानबूझकर बाधा डालना है, तो वह अवमानना की कार्रवाई कर सकती है या गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी कर सकती है।

  3. रिक्यूजल (Recusal) की मांग: आमतौर पर ऐसे मामलों में आरोपी जज से मामले से हटने (Recuse) की प्रार्थना करता है, लेकिन यहाँ सीधे तौर पर पेशी से इनकार करना एक अलग कानूनी मिसाल पेश कर रहा है।

दिल्ली शराब नीति मामला: अब तक की स्थिति

दिल्ली शराब नीति मामला पिछले दो वर्षों से दिल्ली की राजनीति का केंद्र बना हुआ है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) और सीबीआई का दावा है कि नीति बनाने के दौरान कुछ खास व्यापारियों को लाभ पहुँचाने के बदले रिश्वत ली गई थी। केजरीवाल और सिसोदिया लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रह चुके हैं और फिलहाल वे जमानत पर बाहर हैं (या राहत की मांग कर रहे हैं)। इस नए गतिरोध ने मामले को कानूनी से ज्यादा नैतिक मोड़ दे दिया है।

आज की सुनवाई न केवल केजरीवाल और सिसोदिया के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि यह न्यायपालिका की निष्पक्षता और उस पर जनता/अभियुक्तों के विश्वास की भी परीक्षा है। जहाँ केंद्र सरकार और जांच एजेंसियां इसे जांच से भागने का तरीका बता रही हैं, वहीं आम आदमी पार्टी इसे संवैधानिक गरिमा की रक्षा की लड़ाई करार दे रही है। बुधवार की दोपहर दिल्ली हाई कोर्ट से निकलने वाला आदेश यह तय करेगा कि यह ‘सत्याग्रह’ कानूनी रूप से कितना टिक पाएगा।

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