
देश में स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर एक बड़ी और गंभीर तस्वीर सामने आई है। हाल ही में नेशनल सैंपल सर्वे (NSS) की रिपोर्ट ने यह उजागर किया है कि हेल्थ इंश्योरेंस का दायरा बढ़ने के बावजूद आम लोगों पर इलाज का आर्थिक बोझ कम नहीं हुआ है। खासकर अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति में मरीजों और उनके परिवारों को भारी खर्च उठाना पड़ रहा है, और यह खर्च सरकारी अस्पतालों की तुलना में निजी अस्पतालों में कई गुना ज्यादा है।
रिपोर्ट के मुताबिक, जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच किए गए सर्वे में पाया गया कि देश में लगभग 13 प्रतिशत लोग पिछले 15 दिनों में किसी न किसी बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती हुए। इसमें शहरी इलाकों में यह आंकड़ा ज्यादा रहा, जहां करीब 15 प्रतिशत लोगों को अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 12 प्रतिशत रहा। यह दर्शाता है कि शहरों में बीमारियों का प्रकोप और इलाज की जरूरत अपेक्षाकृत अधिक है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि लोग सरकारी अस्पतालों के बजाय निजी अस्पतालों में इलाज करवाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं, जबकि वहां इलाज का खर्च बेहद अधिक है। NSS के आंकड़ों के अनुसार, सरकारी अस्पताल में भर्ती होने पर औसतन 7,042 रुपये का खर्च आता है, जिसमें से लगभग 6,631 रुपये मरीज को अपनी जेब से देने पड़ते हैं। वहीं, निजी अस्पतालों में यही खर्च औसतन 56,343 रुपये तक पहुंच जाता है, जिसमें से करीब 50,508 रुपये मरीज को खुद वहन करने होते हैं। इसका मतलब है कि निजी अस्पतालों में इलाज सरकारी अस्पतालों की तुलना में करीब 11 गुना ज्यादा महंगा पड़ रहा है।
हेल्थ इंश्योरेंस के बढ़ते दायरे के बावजूद यह स्थिति और भी चिंता बढ़ाने वाली है। 2017-18 में जहां ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 14 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 19 प्रतिशत लोगों के पास स्वास्थ्य बीमा था, वहीं 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर गांवों में 47 प्रतिशत और शहरों में 44 प्रतिशत हो गया है। इसके बावजूद अस्पताल में भर्ती होने पर 90 प्रतिशत से ज्यादा खर्च लोगों को अपनी जेब से ही देना पड़ रहा है। इसका सीधा मतलब है कि बीमा योजनाएं अभी भी पूरी तरह प्रभावी नहीं हो पाई हैं या फिर उनकी कवरेज सीमित है।
डॉक्टरों और सर्जनों की फीस को लेकर भी रिपोर्ट में बड़ा अंतर सामने आया है। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी अस्पतालों में भर्ती होने पर औसतन 7,330 रुपये का खर्च आता है, जिसमें से सिर्फ 363 रुपये डॉक्टर की फीस होती है। लेकिन निजी अस्पतालों में यही फीस 7,580 रुपये तक पहुंच जाती है, जबकि कुल खर्च 49,734 रुपये होता है। यानी गांवों में निजी अस्पतालों की डॉक्टर फीस सरकारी अस्पतालों की तुलना में लगभग 20 गुना अधिक है।
शहरी क्षेत्रों में यह अंतर और भी ज्यादा चौंकाने वाला है। शहरों में सरकारी अस्पतालों में भर्ती होने पर औसतन 6,413 रुपये खर्च होते हैं, जिसमें डॉक्टर की फीस मात्र 246 रुपये होती है। वहीं निजी अस्पतालों में कुल खर्च 66,955 रुपये तक पहुंच जाता है, जिसमें से 9,130 रुपये सिर्फ डॉक्टर या सर्जन की फीस होती है। इसका मतलब है कि शहरों में निजी अस्पतालों की डॉक्टर फीस सरकारी अस्पतालों के मुकाबले करीब 37 गुना ज्यादा है।
इन आंकड़ों से साफ है कि स्वास्थ्य सेवाओं में असमानता लगातार बढ़ रही है। एक ओर जहां सरकारी अस्पताल सस्ते हैं, वहीं सुविधाओं, भीड़ और संसाधनों की कमी के कारण लोग निजी अस्पतालों की ओर रुख कर रहे हैं। दूसरी ओर, निजी अस्पतालों की ऊंची फीस और इलाज का खर्च आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान केवल बीमा कवरेज बढ़ाने से नहीं होगा, बल्कि बीमा योजनाओं को अधिक प्रभावी और व्यापक बनाना होगा ताकि मरीजों को वास्तविक राहत मिल सके। साथ ही, सरकारी अस्पतालों की गुणवत्ता और सुविधाओं में सुधार करना भी जरूरी है, ताकि लोग मजबूरी में निजी अस्पतालों का रुख न करें।
कुल मिलाकर, NSS की यह रिपोर्ट देश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल खड़ा करती है। यह दिखाती है कि इलाज अब केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिति का भी मुद्दा बन चुका है। यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है, जिससे लाखों परिवार आर्थिक संकट में फंस सकते हैं।



