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उत्तराखंड हाईकोर्ट की कड़ी कार्रवाई; THDC Share विवाद पर जनहित याचिका खारिज, याचिकाकर्ताओं को कोर्ट की फटकारा

नैनीताल: उत्तराखंड के जल संसाधनों और करोड़ों रुपये के राजस्व से जुड़े ‘टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन’ (THDC) के बहुचर्चित शेयर विवाद मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक बड़ा और सख्त फैसला सुनाया है। नैनीताल स्थित उच्च न्यायालय ने इस मामले में दायर एक जनहित याचिका (PIL) को न केवल सुनवाई के अयोग्य मानते हुए निस्तारित कर दिया, बल्कि अदालत का समय बर्बाद करने के लिए याचिकाकर्ताओं पर भारी जुर्माना भी ठोंक दिया है।

हाईकोर्ट का सख्त रुख और जुर्माना

मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने मामले की गंभीरता और कानूनी पहलुओं पर गौर करते हुए याचिकाकर्ता भूपेंद्र सिंह एवं अन्य की दलीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने सख्त रुख अख्तियार करते हुए याचिकाकर्ताओं पर 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। माननीय न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जुर्माने की यह राशि राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (State Legal Services Authority) के खाते में जमा करानी होगी।

हाईकोर्ट के इस फैसले ने स्पष्ट संकेत दिया है कि जनहित याचिकाओं का उपयोग उन मामलों में नहीं किया जाना चाहिए जो पहले से ही देश की सर्वोच्च अदालत में विचाराधीन हैं या जो तकनीकी रूप से पोषणीय (Maintainable) नहीं हैं।

क्या था याचिकाकर्ताओं का तर्क?

याचिकाकर्ता भूपेंद्र सिंह और अन्य ने अपनी याचिका में भारत सरकार के उस निर्णय को चुनौती दी थी, जिसके तहत THDC Share Dispute के बीच शेयरों की संरचना में बदलाव की प्रक्रिया अपनाई गई थी। याचिका में मुख्य रूप से दो बिंदुओं पर सवाल उठाए गए थे:

  1. कंपनी अधिनियम का उल्लंघन: याचिकाकर्ताओं का दावा था कि केंद्र सरकार ने कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 14 के प्रावधानों का उल्लंघन किया है। उनके अनुसार, शेयरों के हस्तांतरण या बदलाव की प्रक्रिया में निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया और यह कार्रवाई ‘एकतरफा’ थी।

  2. सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन मामला: याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि चूंकि उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के बीच टीएचडीसी में 25 प्रतिशत हिस्सेदारी को लेकर कानूनी लड़ाई पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में चल रही है, इसलिए केंद्र सरकार को इस बीच कोई भी नया निर्णय लेने का अधिकार नहीं है।

विवाद की जड़: 25% हिस्सेदारी और ₹2000 करोड़ का राजस्व

टीएचडीसी (THDC) का विवाद मात्र कागजी नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के बीच एक बड़े आर्थिक हितों का टकराव है। इस विवाद के मुख्य केंद्र में निम्नलिखित बिंदु हैं:

  • भौगोलिक अधिकार: उत्तराखंड सरकार का तर्क है कि चूंकि टिहरी बांध और पूरी परियोजना उत्तराखंड की भौगोलिक सीमा और प्राकृतिक संसाधनों (भागीरथी नदी) पर आधारित है, इसलिए इस परियोजना में उत्तर प्रदेश की 25 प्रतिशत हिस्सेदारी का कोई औचित्य नहीं है। उत्तराखंड इस हिस्से पर अपना पूर्ण स्वामित्व चाहता है।

  • राजस्व का सवाल: टीएचडीसी की वार्षिक राजस्व क्षमता लगभग 2,000 करोड़ रुपये है। इस राजस्व का एक बड़ा हिस्सा शेयर होल्डिंग के आधार पर राज्यों को जाता है। 25 प्रतिशत की यह हिस्सेदारी उत्तराखंड के खजाने के लिए एक बड़ी राशि साबित हो सकती है, जो वर्तमान में विवादित है।

  • यूपी की रिव्यू याचिका: दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश सरकार इस हिस्सेदारी को छोड़ने के पक्ष में नहीं है। यूपी सरकार ने अपनी हिस्सेदारी बरकरार रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू याचिका दाखिल कर रखी है, जिससे यह मामला एक जटिल कानूनी जाल में फंसा हुआ है।

हाईकोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, हाईकोर्ट ने इस याचिका को ‘पोषणीय नहीं’ (Not Maintainable) पाया क्योंकि जब कोई मामला पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र में होता है, तो निचली अदालतों या उच्च न्यायालयों का उस पर समानांतर सुनवाई करना उचित नहीं माना जाता। इसके अलावा, कंपनी अधिनियम के तकनीकी पहलुओं को जनहित याचिका के जरिए चुनौती देने के आधार को भी खंडपीठ ने पर्याप्त नहीं माना।

अदालत ने माना कि इस प्रकार की याचिकाओं से न केवल न्यायिक प्रक्रिया धीमी होती है, बल्कि महत्वपूर्ण मामलों में अनावश्यक देरी भी होती है। यही कारण है कि अदालत ने जुर्माने के जरिए भविष्य के याचिकाकर्ताओं को एक कड़ा संदेश देने की कोशिश की है।

भविष्य की राह और सुप्रीम कोर्ट पर नजर

THDC Share Dispute में हाईकोर्ट के इस ताजा फैसले के बाद अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं। चूंकि शेयर संरचना और हिस्सेदारी का मूल विवाद देश की सबसे बड़ी अदालत में है, इसलिए अंतिम समाधान वहीं से संभव है। उत्तराखंड सरकार के लिए यह मामला केवल राजस्व का नहीं, बल्कि राज्य के आत्मसम्मान और अपने संसाधनों पर अधिकार का भी है।

वहीं, केंद्र सरकार की भूमिका भी इस विवाद में महत्वपूर्ण है। विनिवेश (Divestment) की नीतियों और टीएचडीसी के कॉर्पोरेट ढांचे में बदलाव की कोशिशें लगातार की जा रही हैं, लेकिन राज्यों के बीच का यह आपसी विवाद इन प्रक्रियाओं में एक बड़ी बाधा बना हुआ है।

उत्तराखंड हाईकोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक सबक है जो बिना पुख्ता कानूनी आधार के जनहित याचिकाओं के जरिए जटिल प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप करने की कोशिश करते हैं। टीएचडीसी शेयर विवाद का समाधान अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर ही होगा, जहाँ उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की सरकारें अपनी-अपनी दलीलों के साथ आमने-सामने हैं।

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