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उत्तराखंडफीचर्ड

उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण बना महंगा सौदा, रेस्क्यू सेंटरों में बाघ और गुलदार पर करोड़ों खर्च

The Hill India News
Last updated: May 5, 2026 10:34 am
The Hill India News
Published: May 5, 2026
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देहरादून: उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण की सफलता अब सरकार के लिए एक नई आर्थिक चुनौती बनती जा रही है। जंगलों में बाघों और गुलदारों की बढ़ती संख्या जहां पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से सकारात्मक संकेत मानी जा रही है, वहीं दूसरी ओर इन वन्यजीवों के रख-रखाव पर होने वाला भारी खर्च सरकार के बजट पर बड़ा दबाव बना रहा है। हालात ऐसे हैं कि अब रेस्क्यू सेंटरों में रखे गए बाघ और तेंदुए सरकारी खजाने पर करोड़ों रुपए का बोझ डाल रहे हैं। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, एक बाघ की देखभाल पर सालाना करीब 20 लाख रुपए तक खर्च किए जा रहे हैं। ऐसे में राज्य के रेस्क्यू सेंटर अब केवल संरक्षण केंद्र नहीं, बल्कि अत्यधिक खर्च वाले स्थायी वन्यजीव आश्रय बनते जा रहे हैं।

उत्तराखंड लंबे समय से बाघ संरक्षण के लिए देशभर में जाना जाता रहा है। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व और राजाजी टाइगर रिजर्व जैसे बड़े संरक्षित क्षेत्र राज्य की पहचान हैं। बीते कुछ वर्षों में यहां बाघों की संख्या में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। वन्यजीव विशेषज्ञ इसे संरक्षण नीति की सफलता मानते हैं, लेकिन इसी सफलता के साथ कई व्यावहारिक समस्याएं भी सामने आने लगी हैं। बाघों और गुलदारों की बढ़ती संख्या के कारण मानव-वन्यजीव संघर्ष के मामले तेजी से बढ़े हैं। जंगलों के आसपास बसे गांवों और कस्बों में अक्सर बाघ और गुलदार दिखाई देने लगे हैं, जिससे लोगों में डर का माहौल बना रहता है।

जब कोई बाघ या गुलदार बार-बार आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचता है, इंसानों पर हमला करता है या घायल अवस्था में मिलता है, तब वन विभाग उसे पकड़कर रेस्क्यू सेंटर में भेज देता है। यहां इन वन्यजीवों की देखभाल, इलाज और सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह सरकार पर होती है। यही कारण है कि वन्यजीव संरक्षण अब केवल पर्यावरणीय जिम्मेदारी नहीं रह गया, बल्कि यह आर्थिक रूप से भी बेहद महंगा काम बन चुका है।

राज्य में फिलहाल चार प्रमुख वन्यजीव रेस्क्यू सेंटर संचालित किए जा रहे हैं। इनमें हरिद्वार वन प्रभाग का चिड़ियापुर रेस्क्यू सेंटर, नैनीताल वन प्रभाग का रानीबाग रेस्क्यू सेंटर, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व का ढेला रेस्क्यू सेंटर और अल्मोड़ा सिविल सोयम वन प्रभाग का अल्मोड़ा मिनी जू शामिल हैं। इन सभी स्थानों पर विभिन्न परिस्थितियों में पकड़े गए या घायल वन्यजीवों को रखा जाता है।

यदि इन रेस्क्यू सेंटरों में मौजूद वन्यजीवों की संख्या पर नजर डालें तो स्थिति काफी गंभीर दिखाई देती है। चिड़ियापुर रेस्क्यू सेंटर में इस समय 24 गुलदार रखे गए हैं। रानीबाग रेस्क्यू सेंटर में 15 गुलदार और 3 बाघ मौजूद हैं। ढेला रेस्क्यू सेंटर में 14 बाघ और 16 गुलदार हैं, जबकि अल्मोड़ा मिनी जू में 10 गुलदार रखे गए हैं। कुल मिलाकर राज्य के इन रेस्क्यू सेंटरों में 82 से अधिक बाघ और गुलदार मौजूद हैं, जिनकी देखभाल पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च हो रहे हैं।

वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, एक बाघ को प्रतिदिन 5 से 10 किलो तक मांस की आवश्यकता होती है। इसके अलावा उनके लिए नियमित मेडिकल जांच, दवाइयां, विशेष आहार, एनक्लोजर की सफाई, सुरक्षा व्यवस्था और कर्मचारियों की तैनाती जैसी कई व्यवस्थाएं करनी पड़ती हैं। यही कारण है कि केवल भोजन पर ही भारी खर्च हो जाता है। यदि किसी वन्यजीव की तबीयत खराब हो जाए या उसे विशेष इलाज की जरूरत पड़े, तो खर्च और बढ़ जाता है।

उत्तराखंड के वन मंत्री सुबोध उनियाल के अनुसार, एक टाइगर की देखभाल पर सालाना लगभग 20 लाख रुपए तक खर्च आता है। यदि राज्य के सभी रेस्क्यू सेंटरों में मौजूद बाघों का कुल खर्च जोड़ा जाए, तो यह राशि करोड़ों में पहुंच जाती है। गुलदारों पर भले ही खर्च थोड़ा कम हो, लेकिन उनकी संख्या अधिक होने के कारण कुल लागत काफी बड़ी हो जाती है।

रेस्क्यू सेंटरों के लिए सरकार अलग-अलग बजट निर्धारित करती है। ढेला रेस्क्यू सेंटर के लिए लगभग 2 करोड़ रुपए का वार्षिक बजट तय किया गया है। अल्मोड़ा मिनी जू के लिए करीब 1.5 करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं। चिड़ियापुर रेस्क्यू सेंटर पर लगभग 1.20 करोड़ रुपए का बजट है, जबकि रानीबाग रेस्क्यू सेंटर के लिए करीब 47 लाख रुपए का प्रावधान किया गया है। इसके अतिरिक्त कॉर्बेट टाइगर रिजर्व का कुल वार्षिक बजट लगभग 25 करोड़ रुपए तक पहुंच जाता है। इसमें राज्य सरकार, केंद्र सरकार, कैंपा फंड और प्रोजेक्ट टाइगर से मिलने वाली राशि शामिल होती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि रेस्क्यू सेंटरों की बढ़ती संख्या और वहां लंबे समय तक रह रहे वन्यजीव भविष्य में और बड़ी चुनौती बन सकते हैं। कई मामलों में बाघ और गुलदार इतने अधिक मानव संपर्क में आ जाते हैं कि उन्हें दोबारा जंगल में छोड़ना सुरक्षित नहीं माना जाता। कुछ वन्यजीव गंभीर रूप से घायल होते हैं, जबकि कुछ उम्रदराज होने के कारण जंगल में शिकार करने में सक्षम नहीं रह जाते। ऐसे वन्यजीवों का स्थायी आवास रेस्क्यू सेंटर ही बन जाता है। इससे खर्च लगातार बढ़ता जाता है।

राजाजी टाइगर रिजर्व के ऑनरेरी वाइल्डलाइफ वार्डन राजीव तलवार का मानना है कि सरकार को अब नए आर्थिक मॉडल पर काम करना चाहिए। उनके अनुसार, वाइल्डलाइफ टूरिज्म और सफारी को बढ़ावा देकर रेस्क्यू सेंटरों के रख-रखाव के लिए अतिरिक्त आय पैदा की जा सकती है। यदि इन केंद्रों को नियंत्रित तरीके से पर्यटन से जोड़ा जाए, तो वहां आने वाले पर्यटकों से मिलने वाली आय वन्यजीव संरक्षण में उपयोग की जा सकती है।

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि ट्रांसलोकेशन यानी वन्यजीवों को दूसरे सुरक्षित जंगलों में स्थानांतरित करने की नीति पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। देश के कुछ राज्यों में अभी भी बाघों की संख्या कम है। ऐसे राज्यों में उत्तराखंड से बाघों को भेजा जा सकता है। इससे जहां रेस्क्यू सेंटरों पर दबाव कम होगा, वहीं अन्य राज्यों में वन्यजीव संरक्षण को भी मजबूती मिलेगी।

वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि जैव विविधता को सुरक्षित रखना उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी है। हालांकि बढ़ते खर्च को देखते हुए भविष्य में ऐसी नीतियां तैयार करनी होंगी, जिनसे संरक्षण और आर्थिक संतुलन दोनों बनाए रखे जा सकें। विभाग अब आधुनिक निगरानी प्रणाली, बेहतर रेस्क्यू तकनीक और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने वाले उपायों पर भी काम कर रहा है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, मानव-वन्यजीव संघर्ष की बड़ी वजह जंगलों का लगातार सिकुड़ना भी है। तेजी से बढ़ता शहरीकरण, सड़क निर्माण और जंगलों के आसपास बढ़ती आबादी वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास को प्रभावित कर रही है। भोजन और सुरक्षित क्षेत्र की तलाश में बाघ और गुलदार आबादी वाले इलाकों की ओर बढ़ रहे हैं। यही कारण है कि भविष्य में केवल रेस्क्यू सेंटरों की संख्या बढ़ाना समस्या का समाधान नहीं होगा। इसके लिए जंगलों और वन्यजीव गलियारों को सुरक्षित रखना भी बेहद जरूरी है।

उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण की यह स्थिति एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा कर रही है कि क्या केवल संरक्षण पर्याप्त है या उसके साथ आर्थिक योजना बनाना भी उतना ही जरूरी है। यदि बाघों और गुलदारों की संख्या इसी तरह बढ़ती रही, तो आने वाले वर्षों में सरकार का खर्च और अधिक बढ़ सकता है। ऐसे में वन विभाग के सामने चुनौती होगी कि वह संरक्षण, पर्यटन, स्थानीय लोगों की सुरक्षा और बजट के बीच संतुलन कैसे बनाए।

फिलहाल इतना तय है कि उत्तराखंड में बाघ और गुलदार अब केवल जंगल के राजा नहीं रह गए हैं, बल्कि वे सरकारी बजट के सबसे महंगे मेहमान भी बन चुके हैं। आने वाले समय में सरकार किस नई रणनीति के साथ इस चुनौती से निपटती है, इस पर पूरे देश की नजर रहेगी।

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