ईरान ने अमेरिका के सामने एक नया सात-दिवसीय प्रस्ताव रखा है, जिसके तहत कुछ शर्तें पूरी होने पर सातवें दिन होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और इसके बाद व्यापक बातचीत शुरू करने की बात कही गई है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के इस प्रस्ताव से लंबे समय से जारी अमेरिका-ईरान टकराव को कूटनीतिक रास्ते से खत्म करने की नई उम्मीद जरूर बनी है, लेकिन दोनों देशों के बीच कई बड़े मुद्दों पर अभी भी गहरी असहमति है।
ईरान ने अमेरिका के सामने रखा 7 दिन का प्लान
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अब तेहरान ने बातचीत का एक नया रास्ता पेश किया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान न्यूयॉर्क में पत्रकारों से बातचीत में बताया कि ईरान ने मध्यस्थों के जरिए अमेरिका के सामने एक प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव के मुताबिक, अगर अमेरिका और संबंधित पक्ष तय शर्तों को स्वीकार करते हैं, तो अगले दिन से सात दिनों की प्रक्रिया शुरू हो सकती है और सातवें दिन होर्मुज जलडमरूमध्य को खोल दिया जाएगा।
अराघची ने कहा कि यह प्रस्ताव जून में दोनों देशों के बीच हुए समझौता ज्ञापन यानी MoU की बुनियाद पर तैयार किया गया है। हालांकि जून में बनी व्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकी थी और जुलाई की शुरुआत में स्थिति फिर बिगड़ गई थी। अब ईरान उसी दिशा में एक तेज और चरणबद्ध व्यवस्था के जरिए आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है।
ईरानी विदेश मंत्री के मुताबिक, प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद समय-सारणी तुरंत शुरू की जा सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि तेहरान को बातचीत की समय-सीमा को लेकर जल्दबाजी नहीं है, हालांकि अगर समझौता अमेरिका के मध्यावधि चुनाव से पहले हो जाए तो इसे बेहतर माना जाएगा।
क्या हैं ईरान की प्रमुख शर्तें?
रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के नए प्रस्ताव में युद्ध और क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों को रोकने, अमेरिकी आर्थिक दबाव कम करने और इसके बाद होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने का चरणबद्ध फॉर्मूला शामिल है।
भारतीय एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, प्रस्ताव में सात दिनों के भीतर सभी शत्रुतापूर्ण गतिविधियों को रोकने की बात कही गई है। इसके अलावा ईरान चाहता है कि अमेरिका ईरानी तेल निर्यात पर प्रतिबंधों में राहत दे, ईरान की जमी हुई संपत्तियों तक पहुंच बहाल करे और ईरान पर लगाए गए नौसैनिक दबाव को हटाए। इसके बाद सातवें दिन होर्मुज को खोलने और व्यापक बातचीत शुरू करने का प्रस्ताव है।
यानी ईरान का फॉर्मूला केवल होर्मुज खोलने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे आर्थिक प्रतिबंध, सैन्य दबाव, तेल निर्यात और परमाणु कार्यक्रम जैसे कई बड़े मुद्दे जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि प्रस्ताव सामने आने के बावजूद अंतिम समझौते तक पहुंचना आसान नहीं माना जा रहा है।
होर्मुज इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में से एक है। यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और आगे अरब सागर से जोड़ता है। पश्चिम एशिया के प्रमुख तेल उत्पादक देशों से निकलने वाली ऊर्जा आपूर्ति के लिए यह समुद्री मार्ग बेहद महत्वपूर्ण है।
यही कारण है कि होर्मुज में किसी भी तरह का व्यवधान केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार, शिपिंग, ईंधन कीमतों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। युद्ध के दौरान इस मार्ग को लेकर अनिश्चितता ने पहले ही ऊर्जा बाजार में चिंता बढ़ाई है।
अमेरिका की तरफ से भी इस स्थिति को रणनीतिक बढ़त के रूप में देखा जा रहा है। फाइनेंशियल टाइम्स को दिए एक बयान में एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि वाशिंगटन होर्मुज को लेकर मजबूत स्थिति में है और इसलिए किसी समझौते के लिए जल्दबाजी नहीं कर रहा। अधिकारी के मुताबिक, एक रात में ही इस मार्ग से करीब 2.2 करोड़ बैरल तेल गुजरने की बात कही गई।
अमेरिका का रुख क्या है?
ईरान के प्रस्ताव के सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका इसे स्वीकार करेगा? अभी तक वाशिंगटन की ओर से इस सात-दिवसीय प्रस्ताव को स्वीकार करने की घोषणा नहीं हुई है।
हालांकि, अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक मध्यस्थों के जरिए अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत सकारात्मक और रचनात्मक तरीके से चल रही है। लेकिन वाशिंगटन यह संकेत भी दे रहा है कि वह अपनी शर्तों पर समझौता करना चाहता है और दबाव की स्थिति को अचानक खत्म करने के पक्ष में नहीं है।
यही स्थिति बातचीत को जटिल बनाती है। एक तरफ ईरान होर्मुज खोलने के बदले अमेरिकी सैन्य और आर्थिक दबाव में कमी चाहता है, वहीं अमेरिका इस रणनीतिक मार्ग पर अपने प्रभाव को बातचीत में एक महत्वपूर्ण दबाव बिंदु के तौर पर देख रहा है।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम बना सबसे बड़ी चुनौती
अमेरिका और ईरान के बीच किसी भी स्थायी समझौते के रास्ते में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक ईरान का परमाणु कार्यक्रम है।
वाशिंगटन चाहता है कि ईरान ऐसी सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था स्वीकार करे जिससे परमाणु हथियार विकसित करने की संभावना को रोका जा सके। दूसरी ओर, तेहरान का कहना है कि उसे शांतिपूर्ण और नागरिक उद्देश्यों के लिए परमाणु कार्यक्रम जारी रखने का अधिकार होना चाहिए।
अब्बास अराघची ने यह स्पष्ट नहीं किया कि सात दिन वाले नए प्रस्ताव में परमाणु मुद्दे को किस तरह शामिल किया गया है। यही कारण है कि होर्मुज खोलने का रास्ता सामने आने के बावजूद व्यापक और स्थायी समझौते की सबसे बड़ी बाधाओं में परमाणु मुद्दा अभी भी मौजूद है।
ईरानी राष्ट्रपति ने भी अमेरिका को दिया सीधा संदेश
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने भी स्पष्ट किया है कि उनका देश युद्ध को लंबा खींचना नहीं चाहता। एक इंटरव्यू में जब उनसे पूछा गया कि क्या टकराव साल के अंत तक समाप्त हो सकता है, तो उन्होंने जवाब दिया कि यह अमेरिका पर निर्भर करता है कि वह युद्ध खत्म करना चाहता है या नहीं।
पेजेश्कियान ने यह भी संकेत दिया कि ईरान बातचीत के रास्ते को बंद नहीं कर रहा है। इससे यह संदेश जाता है कि तेहरान एक ओर सैन्य दबाव का सामना कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर कूटनीतिक समाधान की संभावना को भी खुला रखना चाहता है।
ट्रंप के बयानों से भी बढ़ी अनिश्चितता
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान को लेकर लगातार कड़े बयान दिए गए हैं। संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी ट्रंप ने ईरान पर समझौते को लेकर दबाव बनाया और चेतावनी दी कि अगर कोई समझौता नहीं होता है तो अमेरिका और कड़ा रुख अपना सकता है। वहीं, ट्रंप ने बातचीत और संभावित समझौते की संभावना के संकेत भी दिए हैं।
इस तरह अमेरिकी नेतृत्व के बयानों में एक तरफ दबाव और दूसरी तरफ बातचीत की संभावना दोनों दिखाई दे रही हैं। यही वजह है कि आने वाले दिनों में अमेरिका की प्रतिक्रिया बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
जून का समझौता क्यों हुआ था फेल?
ईरान का नया प्रस्ताव जून में हुए समझौता ज्ञापन को आधार बनाता है। उस समय उम्मीद थी कि दोनों पक्ष एक अंतरिम व्यवस्था के जरिए युद्धविराम को आगे बढ़ाएंगे और इसी दौरान अंतिम समझौते की दिशा में बातचीत होगी।
लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य के संचालन और समुद्री यातायात को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने रहे। इसके अलावा सैन्य गतिविधियों और आपसी आरोप-प्रत्यारोप ने समझौते को कमजोर किया और जुलाई की शुरुआत तक यह व्यवस्था टूट गई।
अब ईरान उसी अनुभव से आगे बढ़ते हुए ज्यादा स्पष्ट और समयबद्ध प्रस्ताव लेकर आया है। हालांकि, पिछली कोशिश के असफल होने के कारण इस बार दोनों पक्ष किसी भी समझौते में ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसे लंबे समय तक लागू रखा जा सके।
क्या सात दिन में खुलेगा होर्मुज?
फिलहाल इसका जवाब अमेरिका की प्रतिक्रिया पर निर्भर है। ईरान ने अपनी तरफ से प्रस्ताव और समय-सारणी सामने रख दी है। अराघची के अनुसार, अमेरिका के स्वीकार करने के अगले दिन से सात दिन की प्रक्रिया शुरू हो सकती है और सातवें दिन जलडमरूमध्य खोला जा सकता है।
लेकिन असली चुनौती यह है कि दोनों देश अपनी-अपनी महत्वपूर्ण मांगों में कितनी गुंजाइश दिखाते हैं। ईरान आर्थिक और सैन्य दबाव में राहत चाहता है, जबकि अमेरिका परमाणु कार्यक्रम और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर ठोस आश्वासन चाहता है।
ऐसे में आने वाले कुछ दिन बेहद अहम हो सकते हैं। अगर मध्यस्थों के जरिए चल रही बातचीत किसी साझा फार्मूले तक पहुंचती है, तो होर्मुज को लेकर बनी अनिश्चितता कम हो सकती है और युद्ध को समाप्त करने की दिशा में व्यापक बातचीत शुरू हो सकती है। लेकिन अगर दोनों पक्ष अपनी मौजूदा शर्तों से पीछे नहीं हटते हैं, तो सात दिन का यह प्रस्ताव भी जून की पिछली कोशिश की तरह अधूरा रह सकता है।
फिलहाल तस्वीर साफ है—ईरान ने बातचीत की मेज पर सात दिन का फॉर्मूला रख दिया है, लेकिन उस फॉर्मूले को लागू करने की पहली बड़ी परीक्षा अमेरिका की प्रतिक्रिया होगी। होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना सिर्फ एक समुद्री मार्ग के खुलने का मामला नहीं है; यह ऊर्जा आपूर्ति, वैश्विक बाजार और पश्चिम एशिया में युद्ध के भविष्य से जुड़ा बड़ा सवाल बन चुका है।
