मैदानी शहरों में प्रदूषण का सबसे ज्यादा असर, पहाड़ी शहर भी नहीं रहे अछूते; रुड़की में 152, ऋषिकेश में 150 और काशीपुर में 140 पहुंचा AQI, टिहरी और नैनीताल की हवा भी प्रभावित
देहरादून: देवभूमि उत्तराखंड की पहचान अपनी स्वच्छ आबोहवा, हरे-भरे जंगलों, पहाड़ों और प्राकृतिक सुंदरता के लिए होती है। यहां की खुली वादियां और शुद्ध हवा हमेशा से लोगों को आकर्षित करती रही हैं, लेकिन त्योहारों के दौरान बढ़ती आतिशबाजी और पटाखों का शोर अब इसी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है। दीपावली के त्योहार की शुरुआत के साथ ही उत्तराखंड के कई शहरों की हवा प्रदूषित होने लगी है। छोटी दिवाली पर हुई जमकर आतिशबाजी का असर वायु गुणवत्ता पर साफ दिखाई दिया। राजधानी देहरादून में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 290 तक पहुंच गया, जो खराब श्रेणी में आता है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि त्योहार के दौरान पटाखों का इस्तेमाल किस तरह पर्यावरण और लोगों की सेहत को प्रभावित कर रहा है।
सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि अभी छोटी दिवाली के आंकड़े ही सामने आए हैं। बड़ी दिवाली पर भी आतिशबाजी का सिलसिला जारी रहने की आशंका है। ऐसे में आने वाले समय में हवा की गुणवत्ता और खराब हो सकती है। पटाखों से निकलने वाला धुआं, जहरीली गैसें और बारीक धूल के कण वातावरण में मिलकर प्रदूषण का स्तर बढ़ाते हैं। इसका असर केवल शहरों की आबोहवा पर ही नहीं, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य पर भी पड़ता है।
देहरादून की हवा सबसे ज्यादा प्रभावित, AQI 290 तक पहुंचा
दीपावली से पहले ही राजधानी देहरादून में वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ने लगा है। छोटी दिवाली की रात देर तक हुई आतिशबाजी के बाद यहां AQI 290 दर्ज किया गया। वायु गुणवत्ता सूचकांक का यह स्तर खराब श्रेणी में आता है। इसका मतलब है कि वातावरण में प्रदूषण की मात्रा काफी बढ़ चुकी है और इसका असर विशेष रूप से सांस संबंधी परेशानी से जूझ रहे लोगों, बुजुर्गों और बच्चों पर पड़ सकता है।
देहरादून में लगातार बढ़ता प्रदूषण यह संकेत दे रहा है कि त्योहारों के दौरान पर्यावरण संरक्षण को लेकर किए जाने वाले प्रयासों के साथ आम लोगों की भागीदारी भी बेहद जरूरी है। शहर में वाहनों की बढ़ती संख्या, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल और अन्य प्रदूषणकारी गतिविधियों के बीच आतिशबाजी ने स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
मैदानी शहरों में ज्यादा प्रदूषण, पहाड़ों की हवा भी बिगड़ने लगी
उत्तराखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार छोटी दिवाली पर प्रदेश के कई शहरों में वायु गुणवत्ता प्रभावित हुई। देहरादून के अलावा रुड़की, ऋषिकेश, काशीपुर और हल्द्वानी जैसे शहरों में भी प्रदूषण का स्तर बढ़ा हुआ दर्ज किया गया। आंकड़ों के मुताबिक इन शहरों की स्थिति इस प्रकार रही।
| शहर | AQI स्तर |
|---|---|
| देहरादून | 290 |
| रुड़की | 152 |
| ऋषिकेश | 150 |
| काशीपुर | 140 |
| हल्द्वानी | 115 |
| नैनीताल | 74 |
| टिहरी | 51 |
इन आंकड़ों से साफ है कि मैदानी इलाकों में प्रदूषण का प्रभाव अधिक दिखाई दे रहा है। हालांकि पहाड़ी शहरों की स्थिति भी पूरी तरह चिंतामुक्त नहीं है। नैनीताल में AQI 74 और टिहरी में 51 दर्ज किया गया। भले ही इन दोनों शहरों में प्रदूषण का स्तर मैदानी शहरों की तुलना में कम रहा, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में भी वायु गुणवत्ता पर नजर रखना जरूरी है।
पहाड़ों की स्वच्छ हवा को उत्तराखंड की सबसे बड़ी प्राकृतिक संपत्तियों में गिना जाता है। ऐसे में अगर त्योहारों के दौरान यहां भी प्रदूषण बढ़ने लगेगा, तो इसका असर पर्यावरण और पर्यटन दोनों पर पड़ सकता है।
आखिर सर्दियों में क्यों बढ़ जाता है वायु प्रदूषण?
सर्दियों की शुरुआत होते ही वातावरण में प्रदूषण बढ़ने की आशंका अधिक हो जाती है। इसके पीछे कई प्राकृतिक और मानवीय कारण जिम्मेदार होते हैं। तापमान में गिरावट आने से हवा की गति कम हो सकती है। ऐसे मौसम में वाहनों, निर्माण कार्यों और आतिशबाजी से निकलने वाले धुएं तथा धूल के सूक्ष्म कण वातावरण में लंबे समय तक बने रहते हैं।
दीपावली के दौरान पटाखों से निकलने वाला धुआं इस समस्या को और गंभीर बना देता है। पटाखे जलने से वातावरण में बारीक कणों के साथ कई तरह की गैसें भी फैलती हैं। वहीं, वाहनों से निकलने वाला धुआं, सड़कों पर उड़ती धूल, निर्माण कार्य और खुले में कूड़ा जलाना भी प्रदूषण बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
पहाड़ी क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां भी प्रदूषण के प्रभाव को बढ़ा सकती हैं। खासकर घाटियों में हवा का प्रवाह धीमा होने पर प्रदूषक कण एक स्थान पर जमा हो सकते हैं। यही वजह है कि सर्दियों के मौसम में पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता की नियमित निगरानी आवश्यक हो जाती है।
बच्चों और बुजुर्गों की सेहत पर पड़ सकता है असर
वायु प्रदूषण केवल पर्यावरण से जुड़ी समस्या नहीं है, बल्कि यह सीधे लोगों के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। पटाखों से निकलने वाला धुआं और सूक्ष्म कण सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर सकते हैं। इससे आंखों में जलन, गले में खराश, खांसी और सांस लेने में परेशानी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।
विशेष रूप से अस्थमा और सांस संबंधी बीमारियों से पीड़ित लोगों को अधिक सावधानी बरतने की जरूरत होती है। बच्चों और बुजुर्गों पर भी प्रदूषित हवा का असर जल्दी पड़ सकता है। ऐसे में जब शहरों में AQI का स्तर बढ़ रहा हो, तो लोगों को अनावश्यक रूप से धुएं और धूल वाले वातावरण में जाने से बचना चाहिए।
बड़ी दिवाली पर और बिगड़ सकती है हवा की गुणवत्ता
छोटी दिवाली के दौरान ही देहरादून समेत कई शहरों में प्रदूषण का स्तर बढ़ना चिंता का विषय है। अब बड़ी दिवाली पर आतिशबाजी का सिलसिला और तेज होने की आशंका है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब छोटी दिवाली पर ही राजधानी की हवा खराब श्रेणी में पहुंच गई, तो बड़ी दिवाली के बाद स्थिति क्या होगी?
हालांकि वास्तविक स्थिति का आकलन बड़ी दिवाली के बाद प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों से ही हो सकेगा, लेकिन मौजूदा आंकड़े पर्यावरण को लेकर सतर्क रहने का संकेत जरूर दे रहे हैं। लोगों को चाहिए कि वे त्योहार की खुशियां मनाते समय पर्यावरण और दूसरों की सेहत का भी ध्यान रखें। अनावश्यक पटाखों से बचना, कम धुआं फैलाने वाले विकल्प अपनाना और बच्चों को आतिशबाजी के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करना समय की जरूरत है।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने लोगों से की जागरूक रहने की अपील
उत्तराखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से शहरों में पर्यावरण की स्थिति बेहतर बनाए रखने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। बोर्ड की तरफ से लोगों को लंबे समय से आतिशबाजी के दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक किया जा रहा है। इस संबंध में बोर्ड के सदस्य सचिव पराग मधुकर ने कहा कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से शहरों में पर्यावरण को बेहतर रखने के लिए प्रयास किए गए हैं। साथ ही लोगों को भी काफी लंबे समय से आतिशबाजी को लेकर जागरूक किया गया है।
देवभूमि की पहचान बचाने की जिम्मेदारी सबकी
उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है और इसकी पहचान यहां के स्वच्छ वातावरण, प्राकृतिक सुंदरता और शांत पहाड़ी जीवन से जुड़ी हुई है। त्योहार खुशियां बांटने और एक-दूसरे के साथ समय बिताने का अवसर होते हैं, लेकिन इन खुशियों की कीमत पर्यावरण और लोगों की सेहत को चुकानी पड़े, यह उचित नहीं है।
छोटी दिवाली के आंकड़े पहले ही चेतावनी दे रहे हैं कि पटाखों का बढ़ता इस्तेमाल प्रदेश के शहरों की हवा को प्रभावित कर रहा है। ऐसे में बड़ी दिवाली पर लोगों को जिम्मेदारी के साथ त्योहार मनाने की जरूरत है। आखिरकार स्वच्छ हवा केवल किसी एक शहर या व्यक्ति की जरूरत नहीं, बल्कि हर नागरिक का अधिकार है। देवभूमि की प्राकृतिक सुंदरता और आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य के लिए जरूरी है कि हम त्योहार मनाने के साथ-साथ पर्यावरण को बचाने का संकल्प भी लें।
