
देहरादून: उत्तराखंड के जंगलों में राष्ट्रीय पशु की सुरक्षा और वन्यजीव तस्करी को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सूबे के वन क्षेत्र में पिछले दिनों हुई बाघों की संदिग्ध मौत की गुत्थी सुलझाने में उत्तराखंड वन विभाग पूरी ताकत से जुट गया है। इस हाई-प्रोफाइल उत्तराखंड बाघ शिकार मामला में विभाग को एक बड़ी कामयाबी हाथ लगी है। स्थानीय अदालत ने मामले के मुख्य आरोपी आलम उर्फ फम्मि की 24 घंटे की पुलिस रिमांड वन विभाग को सौंप दी है।
माना जा रहा है कि आज यानी 23 मई को सुबह 10 बजे से शुरू होने वाली इस रिमांड अवधि के दौरान वन विभाग की विशेष जांच टीम (SIT) आरोपी को कड़ी सुरक्षा के बीच घटनास्थल पर ले जाएगी। यहाँ वन्यजीव विशेषज्ञों और फॉरेंसिक टीम की मौजूदगी में ‘क्राइम सीन री-क्रिएशन’ (Crime Scene Re-creation) किया जाएगा, ताकि शिकारियों के पूरे नेटवर्क और कार्यप्रणाली (Modus Operandi) का भंडाफोड़ किया जा सके।
घटनास्थल से सुराग तलाशने की चुनौती, रडार पर पूरा नेटवर्क
उत्तराखंड वन विभाग के आला अधिकारियों के मुताबिक, घटना के दिन से ही टीम घटनास्थल से वैज्ञानिक और परिस्थितिजन्य साक्ष्य (Circumstantial Evidence) इकट्ठा करने में जुटी हुई है। हालांकि, शुरुआती दौर में विभाग के हाथ कोई बहुत बड़ा सुराग नहीं लगा था, लेकिन पकड़े गए आरोपियों से शुरुआती पूछताछ के बाद जांच की दिशा बदल गई है।
वन विभाग का प्राथमिक उद्देश्य इस पूरे घटनाक्रम से जुड़े हर छोटे-बड़े तथ्य को खंगालना है, ताकि न केवल वर्तमान मामले का पूरी तरह खुलासा हो सके, बल्कि भविष्य के लिए एक मजबूत चार्जशीट तैयार की जा सके। इस उत्तराखंड बाघ शिकार मामला ने राज्य में सक्रिय अंतर्राज्यीय शिकारी गिरोहों (Inter-state Poaching Gangs) की सक्रियता की ओर भी इशारा किया है, जिसके बाद से पूरे क्षेत्र में रेड अलर्ट जारी है।
आलम की रिमांड से खुलेंगे कई अनसुलझे पहलू
इस पूरे प्रकरण के सामने आने के बाद वन विभाग ने त्वरित कार्रवाई करते हुए सबसे पहले मुख्य सूत्रधार आलम उर्फ फम्मि को गिरफ्तार किया था, जिसे बाद में न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया था। जांच को तार्किक अंजाम तक पहुंचाने के लिए वन विभाग ने अदालत से आलम की कस्टडी रिमांड मांगी थी, जिसे कोर्ट ने जनहित और वन्यजीव संरक्षण की गंभीरता को देखते हुए मंजूर कर लिया।
हरिद्वार के प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) स्वप्निल अनिरुद्ध ने इस संबंध में मीडिया से बात करते हुए कहा:
“आरोपी आलम की रिमांड मिलना हमारी जांच के लिए एक टर्निंग पॉइंट है। इस 24 घंटे की अवधि में हमारी प्राथमिकता घटनास्थल से उन गायब कड़ियों को जोड़ना है जो अब तक अनसुलझी रही हैं। आरोपी की निशानदेही पर नए सबूतों की खोजबीन की जाएगी और यह पता लगाया जाएगा कि इस शिकार के पीछे असली वित्तीय मददगार (Financiers) कौन हैं।”
दो और आरोपी गिरफ्तार, मुख्य सरगना अभी भी फरार
डीएफओ स्वप्निल अनिरुद्ध के नेतृत्व में वन विभाग की टीम ने इस मामले में बैक-टू-बैक कार्रवाई करते हुए दो और संदिग्ध आरोपियों को धर दबोचा है। इन गिरफ्तारियों के बाद वन्यजीव तस्करों के हौसले पस्त नजर आ रहे हैं। हालांकि, वन विभाग का मानना है कि इस पूरे सिंडिकेट का सबसे महत्वपूर्ण और मास्टरमाइंड आरोपी अभी भी कानून की गिरफ्त से बाहर है। विभाग ने दावा किया है कि फरार आरोपी के संभावित ठिकानों पर लगातार दबिश दी जा रही है और उसे जल्द ही सलाखों के पीछे भेज दिया जाएगा।
| आरोपी का नाम | वर्तमान स्थिति | जांच में भूमिका |
| आलम उर्फ फम्मि | 24 घंटे की वन विभाग रिमांड पर | मुख्य ग्राउंड शूटर/तस्कर |
| आरोपी नंबर 2 | न्यायिक हिरासत में | मददगार और रेकी करने वाला |
| आरोपी नंबर 3 | न्यायिक हिरासत में | लॉजिस्टिक्स और परिवहन हैंडलर |
| मास्टरमाइंड (नाम गुप्त) | फरार (तलाश जारी) | सिंडिकेट किंगपिन / खरीदार |
लापरवाही पर प्रशासनिक हंटर: रेंजर पर गिर सकती है गाज
इस सनसनीखेज उत्तराखंड बाघ शिकार मामला के सामने आने के बाद वन विभाग के आंतरिक महकमे में भी हड़कंप मचा हुआ है। सुरक्षा में चूक और खुफिया तंत्र की विफलता को देखते हुए विभाग ने संबंधित रेंजर्स और कुछ जमीनी स्तर के अधिकारियों को ‘कारण बताओ नोटिस’ (Show Cause Notice) जारी किया है।
पहले गलियारों में चर्चा थी कि संबंधित क्षेत्र के रेंजर को सीधे निलंबित (Suspend) किया जा सकता है, लेकिन प्रशासनिक सूत्रों से मिल रही ताजा जानकारी के अनुसार, रेंजर पर तत्काल कड़े निलंबन के बजाय उन्हें हेड ऑफ फॉरेस्ट फोर्स (HoFF) कार्यालय, देहरादून में अटैच (संबद्ध) किया जा सकता है। इस विभागीय फेरबदल को जांच प्रभावित न होने देने के कदम के रूप में देखा जा रहा है।
भविष्य की रणनीति: शिकारियों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’
वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि आज होने वाला ‘क्राइम सीन री-क्रिएशन’ केवल इस केस को मजबूत करने के लिए नहीं है, बल्कि इससे मिलने वाले इनपुट्स के आधार पर भविष्य की सुरक्षा रणनीति तैयार की जाएगी। शिकारियों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली तकनीकों (जैसे जाल बिछाना, जहर देना या अवैध हथियारों का उपयोग) का बारीकी से अध्ययन किया जा रहा है।
उत्तराखंड वन विभाग इस पूरी कवायद के जरिए यह सुनिश्चित करना चाहता है कि राज्य के टाइगर रिजर्व और संरक्षित वनों में सुरक्षा घेरा इतना पुख्ता कर दिया जाए कि भविष्य में कोई भी शिकारी परिंदा भी पर न मार सके। इस मामले की अंतिम रिपोर्ट राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) को भी भेजी जानी है, जिसके चलते देहरादून से लेकर दिल्ली तक के अधिकारी इस पूरी तफ्तीश पर पैनी नजर रख रहे हैं।



