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40 दिन बाद थमी अमेरिका-ईरान जंग: 2 हफ्ते के सीजफायर पर सहमति, होर्मुज जलडमरूमध्य खोलने का ऐलान

The Hill India News
Last updated: April 8, 2026 4:39 am
The Hill India News
Published: April 8, 2026
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करीब 40 दिनों तक चले तनावपूर्ण और विनाशकारी संघर्ष के बाद अमेरिका और ईरान के बीच आखिरकार राहत की खबर सामने आई है। दोनों देशों ने दो हफ्तों के अस्थायी युद्ध-विराम (सीजफायर) पर सहमति जताई है, जिससे न केवल युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में हालात सामान्य होने की उम्मीद जगी है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एक बड़ा संकट टलता नजर आ रहा है। इस समझौते का सबसे अहम पहलू होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलना है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक माना जाता है।

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस सीजफायर का ऐलान अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ के माध्यम से किया। उन्होंने बताया कि यह समझौता पाकिस्तान की ओर से दिए गए प्रस्ताव के आधार पर हुआ है, जिसमें दो हफ्तों तक सभी सैन्य गतिविधियों को रोकने और होर्मुज जलडमरूमध्य को तत्काल प्रभाव से खोलने की बात शामिल है। ट्रंप के अनुसार, अमेरिका इस दो सप्ताह की अवधि का उपयोग ईरान के साथ एक स्थायी और व्यापक शांति समझौते के लिए बातचीत करने में करेगा।

ट्रंप ने अपने बयान में यह भी कहा कि अमेरिकी सेना अपने लगभग सभी रणनीतिक सैन्य लक्ष्यों को हासिल कर चुकी है और अब समय आ गया है कि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित की जाए। उन्होंने यह भी खुलासा किया कि ईरान की ओर से अमेरिका को 10 बिंदुओं का प्रस्ताव मिला है, जिसे बातचीत के लिए एक मजबूत आधार माना जा रहा है।

हालांकि, इस युद्ध-विराम के साथ एक महत्वपूर्ण शर्त भी जुड़ी हुई है। अमेरिका ने साफ किया है कि सीजफायर तभी लागू होगा जब ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह सुरक्षित और बिना किसी बाधा के खोलने पर सहमत होगा। यह जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, और इसके बंद होने से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारी अस्थिरता देखने को मिली थी।

ईरान की ओर से भी इस समझौते को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर बयान जारी कर कहा कि यदि ईरान पर हमले पूरी तरह बंद हो जाते हैं, तो उनकी सशस्त्र सेनाएं भी अपनी रक्षात्मक कार्रवाई रोक देंगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि दो हफ्तों की अवधि के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य से सुरक्षित आवाजाही की अनुमति दी जाएगी, लेकिन इसके लिए ईरानी सैन्य बलों के साथ समन्वय आवश्यक होगा।

अराघची ने यह भी संकेत दिया कि ईरान इस समझौते को केवल एक अस्थायी राहत के रूप में देख रहा है। उनका कहना है कि ईरान लंबे समय से इस बात पर जोर देता रहा है कि जलडमरूमध्य को पूरी तरह खोलना केवल एक व्यापक और स्थायी शांति समझौते के तहत ही संभव है, जिसमें अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा भविष्य में किसी भी हमले की गारंटी न दी जाए।

इस युद्ध-विराम के पीछे कूटनीतिक प्रयासों की भी अहम भूमिका रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन ने इस पूरे मामले में मध्यस्थ की भूमिका निभाई और ईरान को लचीला रुख अपनाने के लिए प्रेरित किया। चीन, जो ईरान का एक प्रमुख सहयोगी है, ने तेहरान को समझाया कि क्षेत्रीय स्थिरता और वैश्विक आर्थिक संतुलन के लिए तनाव कम करना आवश्यक है।

इसके अलावा, पाकिस्तान द्वारा प्रस्तुत प्रस्ताव भी इस समझौते की नींव बना। पाकिस्तान ने दोनों देशों के बीच संवाद स्थापित करने और युद्ध को रोकने के लिए सक्रिय भूमिका निभाई, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना की जा रही है।

हालांकि, इस समझौते से पहले हालात बेहद गंभीर हो चुके थे। ट्रंप ने कुछ ही घंटे पहले एक कड़ी चेतावनी देते हुए कहा था कि यदि समझौता नहीं हुआ, तो “एक पूरी सभ्यता खत्म हो सकती है।” उन्होंने ईरान के बिजलीघरों और पुलों पर हमले की धमकी भी दी थी। लेकिन अचानक आए इस बदलाव ने यह संकेत दिया कि दोनों पक्ष अब टकराव के बजाय समाधान की दिशा में बढ़ना चाहते हैं।

इस 40 दिनों की जंग में भारी जनहानि हुई है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान में 1900 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं लेबनान में, जहां इजरायल और ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह के बीच संघर्ष जारी है, 1500 से ज्यादा लोग मारे गए हैं और लाखों लोग विस्थापित हुए हैं। इजरायल में भी कई लोगों की जान गई है, जबकि अमेरिका के भी सैनिक हताहत हुए हैं।

इस युद्ध-विराम से जहां एक ओर आम लोगों को राहत मिलेगी, वहीं वैश्विक बाजारों में भी स्थिरता आने की उम्मीद है। खासकर तेल बाजार, जो इस संघर्ष के चलते काफी प्रभावित हुआ था, अब धीरे-धीरे सामान्य स्थिति की ओर लौट सकता है।

आने वाले दो हफ्ते इस पूरे घटनाक्रम के लिए बेहद अहम साबित होंगे। अगर इस दौरान दोनों देश स्थायी शांति समझौते तक पहुंचने में सफल होते हैं, तो यह न केवल मध्य पूर्व बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हो सकता है। हालांकि, अभी भी कई चुनौतियां बाकी हैं और यह देखना दिलचस्प होगा कि यह अस्थायी युद्ध-विराम स्थायी शांति में बदल पाता है या नहीं।

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