अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपनी आर्थिक और व्यापारिक नीतियों को लेकर बड़ा ऐलान किया है। इस बार उनका निशाना जेनेरिक दवाओं का आयात है। ट्रंप ने घोषणा की है कि अमेरिका में आयात होने वाली जेनेरिक दवाओं पर चरणबद्ध तरीके से भारी टैरिफ लगाया जाएगा। उनके प्रस्तावित प्लान के अनुसार शुरुआती दो वर्षों तक आयातित जेनेरिक दवाओं पर कोई टैरिफ नहीं लगाया जाएगा, लेकिन इसके बाद तीसरे वर्ष 100 प्रतिशत और चौथे वर्ष से 200 प्रतिशत तक टैरिफ लागू किया जाएगा। इस फैसले का सबसे अधिक असर भारत पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है, क्योंकि भारत अमेरिका को जेनेरिक दवाओं का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता है और अमेरिकी स्वास्थ्य व्यवस्था में भारतीय दवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है।
डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर इस नीति की घोषणा करते हुए कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य दवा निर्माण उद्योग को दोबारा अमेरिका में स्थापित करना है। उनका कहना है कि अमेरिका लंबे समय से विदेशी देशों, विशेष रूप से भारत और चीन, पर दवाओं की आपूर्ति के लिए निर्भर रहा है। अब समय आ गया है कि आवश्यक दवाओं का उत्पादन अमेरिका में ही बढ़ाया जाए, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक मजबूत बनाया जा सके।
ट्रंप की योजना के अनुसार 1 अगस्त से नई नीति लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाए जाएंगे। शुरुआती दो वर्षों तक कंपनियों को अमेरिका में उत्पादन इकाइयाँ स्थापित करने का अवसर दिया जाएगा और इस दौरान आयातित जेनेरिक दवाओं पर कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा। इसके बाद यदि कंपनियां अमेरिका में उत्पादन शुरू नहीं करती हैं तो तीसरे वर्ष उन पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा और अगले चरण में यह बढ़कर 200 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जो कंपनियां निर्धारित समय के भीतर अमेरिका में अपने प्लांट और आवश्यक उपकरण स्थापित नहीं करेंगी, उनके खिलाफ अतिरिक्त दंडात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है।
हालांकि ट्रंप ने यह भी कहा कि यह नीति केवल जेनेरिक दवाओं पर लागू होगी। पेटेंटेड, ब्रांडेड और इनोवेटिव दवाओं के लिए मौजूदा व्यवस्था में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। उनके अनुसार इन दवाओं से जुड़ी वर्तमान नीति सफल रही है और उसे यथावत रखा जाएगा।
भारत के लिए यह घोषणा बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। भारत को लंबे समय से “दुनिया की फार्मेसी” कहा जाता है, क्योंकि यहां कम लागत में उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाओं का उत्पादन होता है। भारतीय दवा कंपनियां अमेरिका सहित दुनिया के अनेक देशों को जीवनरक्षक और आवश्यक दवाएं निर्यात करती हैं। अमेरिका के जेनेरिक दवा बाजार में भारतीय कंपनियों की हिस्सेदारी लगभग 40 प्रतिशत बताई जाती है, जो इस क्षेत्र में भारत की मजबूत स्थिति को दर्शाती है।
उद्योग से जुड़े आंकड़ों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत ने अमेरिका को लगभग 9.7 अरब डॉलर मूल्य की फार्मास्युटिकल दवाओं का निर्यात किया। यह भारत के कुल वैश्विक फार्मा निर्यात का लगभग 38 प्रतिशत हिस्सा था। ऐसे में यदि भविष्य में अमेरिका में भारी टैरिफ लागू होता है तो भारतीय दवा कंपनियों के निर्यात पर दबाव बढ़ सकता है। विशेष रूप से वे कंपनियां प्रभावित हो सकती हैं जिनका बड़ा कारोबार अमेरिकी बाजार पर निर्भर है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आयातित दवाओं पर 100 से 200 प्रतिशत तक शुल्क लगाया जाता है तो भारतीय कंपनियों की लागत बढ़ जाएगी और अमेरिकी बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर अमेरिका में दवाओं की कीमतें भी बढ़ने की आशंका है, क्योंकि जेनेरिक दवाएं आमतौर पर कम कीमत पर उपलब्ध होती हैं और लाखों अमेरिकी मरीज इन्हीं पर निर्भर रहते हैं।
भारत में निर्मित जेनेरिक दवाओं का उपयोग अमेरिका में हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, कैंसर, डिप्रेशन, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी बीमारियों, संक्रामक रोगों और गर्भनिरोधक दवाओं सहित अनेक उपचारों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2024 में अमेरिका में गर्भनिरोधक गोलियों के लिए लिखे गए कुल प्रिस्क्रिप्शन में लगभग 65 प्रतिशत दवाएं भारत की प्रमुख कंपनियों द्वारा तैयार की गई थीं। इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय दवा उद्योग अमेरिकी स्वास्थ्य प्रणाली का एक अहम हिस्सा बन चुका है।
हालांकि फिलहाल इस प्रस्तावित नीति के वास्तविक प्रभाव को लेकर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। भारत और अमेरिका के बीच पहले से व्यापार संबंधी कई मुद्दों पर बातचीत चल रही है। दोनों देशों के बीच फार्मास्युटिकल क्षेत्र में सहयोग को लेकर भी समझौते और वार्ताएं जारी हैं। ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि अंतिम निर्णय से पहले दोनों देशों के बीच इस विषय पर विस्तृत चर्चा हो सकती है और भारतीय उद्योग के हितों को ध्यान में रखते हुए समाधान तलाशा जा सकता है।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यदि भारतीय कंपनियां समय रहते अमेरिका में उत्पादन इकाइयों की स्थापना करती हैं या स्थानीय साझेदारों के साथ निवेश बढ़ाती हैं, तो संभावित टैरिफ के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। वहीं भारत सरकार भी इस मुद्दे पर कूटनीतिक और व्यापारिक स्तर पर सक्रिय भूमिका निभा सकती है ताकि भारतीय फार्मा उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति बनी रहे।
कुल मिलाकर, डोनाल्ड ट्रंप की यह नई टैरिफ नीति केवल अमेरिका की घरेलू उत्पादन रणनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक दवा व्यापार पर भी पड़ सकता है। भारत जैसे बड़े जेनेरिक दवा निर्यातक देश के लिए यह एक महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले समय में दोनों देशों के बीच होने वाली व्यापारिक वार्ताएं, निवेश संबंधी फैसले और नीति में संभावित बदलाव यह तय करेंगे कि भारतीय फार्मा उद्योग इस चुनौती को अवसर में बदल पाता है या नहीं। फिलहाल पूरी दुनिया की नजर अमेरिका की इस नई नीति और उसके वैश्विक प्रभाव पर टिकी हुई है।
