
नैनीताल: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने किच्छा के सिरौली कलां नगर पालिका चुनाव में हो रही देरी को लेकर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए न केवल राज्य चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए, बल्कि न्यायालय की छवि को धूमिल करने की कोशिश करने वाले तत्वों को भी जमकर फटकार लगाई।
सुनवाई के दौरान एक वीडियो क्लिप का जिक्र आने पर, जिसमें विपक्षी पक्ष द्वारा कोर्ट की प्रक्रिया को “तारीख पर तारीख” कहकर उपहास उड़ाने की कोशिश की गई थी, माननीय न्यायालय ने गहरी नाराजगी व्यक्त की। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “यह न्यायालय है, कोई फिल्म नहीं। हम इस मामले में तारीखें नहीं दे रहे, बल्कि हर हफ्ते सुनवाई कर रहे हैं। न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुंचाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
चुनाव आयोग की असमर्थता पर कोर्ट का असंतोष
सोमवार को हुई सुनवाई में राज्य चुनाव आयोग के सचिव वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश हुए। आयोग की ओर से एक शपथ पत्र दाखिल किया गया, जिसमें कहा गया कि आयोग चुनाव कराने के लिए पूरी तरह सक्षम और तैयार है, लेकिन कुछ तकनीकी और प्रशासनिक बाधाएं प्रक्रिया को बाधित कर रही हैं।
हालांकि, न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की पीठ आयोग के इन तर्कों से संतुष्ट नजर नहीं आई। कोर्ट ने संकेत दिए कि जनहित के मामलों में प्रशासनिक बहानेबाजी के आधार पर लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अनिश्चितकाल के लिए नहीं रोका जा सकता। कोर्ट का मानना है कि चुनाव कराना संवैधानिक बाध्यता है और इसमें देरी स्थानीय निवासियों के अधिकारों का हनन है।
सिरौली कलां का विवाद: 6 साल से उलझा विकास का पहिया
इस पूरे विवाद की जड़ साल 2018 में हुए किच्छा नगर पालिका के विस्तारीकरण में छिपी है। मोहम्मद याशीन और अन्य ग्रामीणों द्वारा दायर जनहित याचिका के अनुसार:
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विस्तारीकरण और वार्ड विवाद: 2018 में सिरौली कलां, बंडिया और देवरिया जैसे क्षेत्रों को नगर पालिका किच्छा में शामिल किया गया था। इस दौरान सिरौली कलां क्षेत्र को वार्ड नंबर 17, 18, 19 और 20 के रूप में विभाजित किया गया।
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करोड़ों का निवेश: पिछले 6 वर्षों में नगर पालिका प्रशासन ने सिरौली कलां क्षेत्र में लगभग 5 करोड़ रुपये के विकास कार्य कराए हैं। सड़कें, नालियां और स्ट्रीट लाइट जैसे बुनियादी ढांचे पर भारी बजट खर्च किया गया है।
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पृथक्करण का विरोध: अब सरकार द्वारा सिरौली कलां को किच्छा नगर पालिका से अलग करने की कवायद चल रही है, जिसका स्थानीय निवासी पुरजोर विरोध कर रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जब क्षेत्र नगर पालिका का हिस्सा है और वहां विकास कार्य हो चुके हैं, तो उसे चुनाव से वंचित रखना और प्रशासक के भरोसे छोड़ना अनुचित है।
प्रशासक राज और आम जनता की मुश्किलें
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नगर निकाय का कार्यकाल समाप्त होने के बाद अब वहां प्रशासक तैनात हैं। निर्वाचित प्रतिनिधियों के अभाव में आम जनता के छोटे-छोटे प्रशासनिक कार्य रुक गए हैं। स्थानीय लोगों की मांग है कि सिरौली कलां को नगर पालिका का हिस्सा बनाए रखा जाए और अन्य निकायों की तर्ज पर यहाँ भी अविलंब चुनाव संपन्न कराए जाएं।
कोर्ट ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि न्याय के दरवाजे हर नागरिक के लिए खुले हैं और कोई भी पक्षकार किसी को कोर्ट आने से नहीं रोक सकता। न्यायालय सभी पक्षों को विस्तार से सुनने के बाद ही अपना अंतिम निर्णय सुनाएगा।
सिरौली कलां का यह मामला केवल एक चुनाव का नहीं, बल्कि शहरी नियोजन और लोकतांत्रिक अधिकारों के बीच के संघर्ष का है। “तारीख पर तारीख” जैसे जुमलों का इस्तेमाल कर न्यायपालिका को चुनौती देने वालों को हाईकोर्ट ने आइना दिखाकर यह स्पष्ट कर दिया है कि कानून की प्रक्रिया ठोस तथ्यों पर चलती है, संवादों पर नहीं। अब सबकी नजरें आगामी सप्ताह की सुनवाई पर टिकी हैं।



