देहरादून। उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय (UTU) के बहुचर्चित पेपर लीक मामले की जांच अब और व्यापक होती जा रही है। इस मामले में गिरफ्तार असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. आशीष कुमार गुप्ता की भूमिका केवल मौजूदा परीक्षा तक सीमित थी या फिर पिछले वर्षों में आयोजित अन्य परीक्षाओं में भी किसी प्रकार की अनियमितता हुई थी, इसकी गहन जांच शुरू कर दी गई है। पुलिस, विश्वविद्यालय प्रशासन और फॉरेंसिक विशेषज्ञों की संयुक्त पड़ताल में अब वर्ष 2010 से लेकर 2026 तक आयोजित कई परीक्षा प्रक्रियाओं को जांच के दायरे में लाया जा रहा है।
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि डॉ. आशीष कुमार गुप्ता पिछले लगभग 16 वर्षों से उत्तराखंड के विभिन्न निजी इंजीनियरिंग संस्थानों में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत रहे हैं। इस दौरान उन्हें कई बार उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय की विभिन्न परीक्षाओं के लिए प्रश्नपत्र तैयार करने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी। जांच एजेंसियों का मानना है कि यदि किसी स्तर पर परीक्षा की गोपनीयता से समझौता किया गया है तो उसके सभी पहलुओं की निष्पक्ष जांच आवश्यक है। इसी उद्देश्य से पुलिस उनके पूरे शैक्षणिक और परीक्षा संबंधी रिकॉर्ड का विश्लेषण कर रही है।
पुलिस के अनुसार, डॉ. गुप्ता ने मार्च 2010 से जुलाई 2013 तक DIT यूनिवर्सिटी, अगस्त 2013 से सितंबर 2018 तक JBIT संस्थान, सितंबर 2018 से जुलाई 2019 तक उत्तरांचल यूनिवर्सिटी तथा जुलाई 2019 से जुलाई 2026 तक शिवालिक कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में सेवाएं दीं। इन संस्थानों में कार्यरत रहने के दौरान उन्होंने कई विषयों के प्रश्नपत्र तैयार किए थे। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि उन्होंने किन-किन परीक्षाओं के लिए प्रश्नपत्र तैयार किए और क्या उन परीक्षाओं की गोपनीयता भी किसी स्तर पर प्रभावित हुई थी।
जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा डिजिटल साक्ष्यों का विश्लेषण है। पुलिस ने आरोपी प्रोफेसर के मोबाइल फोन, लैपटॉप, ई-मेल, व्हाट्सएप चैट, क्लाउड स्टोरेज और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा है। विशेषज्ञ यह पता लगाने का प्रयास कर रहे हैं कि प्रश्नपत्र किस माध्यम से साझा किए गए, किन लोगों तक पहुंचे और इस पूरे नेटवर्क में कौन-कौन शामिल था। यदि जांच में अन्य व्यक्तियों की संलिप्तता सामने आती है तो उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि फिलहाल किसी पुराने मामले में निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी, लेकिन उपलब्ध तथ्यों के आधार पर सभी संभावित पहलुओं की जांच की जा रही है। जांच का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि किसी परीक्षा की गोपनीयता पहले भी भंग हुई है तो उसके जिम्मेदार लोगों को कानून के दायरे में लाया जा सके। इसी कारण वर्ष 2010 से अब तक की कई परीक्षा प्रक्रियाओं और प्रश्नपत्र निर्माण से जुड़े रिकॉर्ड का सत्यापन किया जा रहा है।
इस मामले में शिवालिक कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग ने भी सख्त रुख अपनाते हुए डॉ. आशीष कुमार गुप्ता की सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी हैं। संस्थान के निदेशक प्रोफेसर टी.एस. सिद्धू ने बताया कि नियमानुसार नोटिस जारी करने के बाद आरोपी प्रोफेसर को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि परीक्षा की गोपनीयता किसी भी शैक्षणिक संस्था की विश्वसनीयता का सबसे महत्वपूर्ण आधार होती है और इस प्रकार की लापरवाही या अनियमितता किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।
उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय ने भी इस मामले को अत्यंत गंभीर मानते हुए डॉ. गुप्ता पर अगले सात वर्षों तक विश्वविद्यालय की किसी भी परीक्षा संबंधी गतिविधि में भाग लेने पर प्रतिबंध लगा दिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और छात्रों का विश्वास बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता है। साथ ही विश्वविद्यालय ने परीक्षा गोपनीयता से जुड़े सभी सुरक्षा प्रोटोकॉल की समीक्षा शुरू कर दी है, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।
पुलिस के अनुसार, यह पूरा मामला विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक डॉ. विनय कुमार पटेल की लिखित शिकायत के बाद सामने आया। शिकायत में आरोप लगाया गया कि 7 और 8 जुलाई को आयोजित होने वाली आंतरिक परीक्षाओं के प्रश्नपत्रों की गोपनीयता भंग करते हुए उन्हें कुछ लोगों को अनुचित लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से लीक किया गया। शिकायत मिलने के बाद प्रेमनगर थाने में मामला दर्ज किया गया और प्रारंभिक जांच के आधार पर मुख्य आरोपी डॉ. आशीष कुमार गुप्ता को गिरफ्तार कर लिया गया।
देहरादून के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) प्रमेन्द्र डोबाल ने कहा कि मामले की निष्पक्ष और वैज्ञानिक तरीके से जांच की जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि जांच के दौरान किसी अन्य व्यक्ति, छात्र, कर्मचारी या बाहरी नेटवर्क की संलिप्तता सामने आती है तो उसके खिलाफ भी भारतीय न्याय संहिता (BNS) की संबंधित धाराओं के तहत कठोर कार्रवाई की जाएगी। पुलिस फिलहाल फॉरेंसिक रिपोर्ट और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर पूरे नेटवर्क की कड़ियां जोड़ने में जुटी हुई है।
गौरतलब है कि यह मामला ‘मशीन लर्निंग फॉर इंटरनेट ऑफ थिंग्स’ तथा ‘इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड थ्योरी’ विषयों की परीक्षाओं से जुड़ा है। आरोप है कि परीक्षा आयोजित होने से पहले ही दोनों विषयों के प्रश्नपत्र कुछ छात्रों तक पहुंच गए थे, जिसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने तत्काल कार्रवाई करते हुए पूरे मामले की जांच शुरू कराई। इस घटना ने प्रदेश की उच्च शिक्षा व्यवस्था और परीक्षा सुरक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक समय में परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह डिजिटल सुरक्षा, एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्र वितरण, सीमित एक्सेस कंट्रोल और नियमित ऑडिट जैसी व्यवस्थाओं से और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है। वहीं छात्र संगठनों ने भी पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, दोषियों को कड़ी सजा और परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग की है।
फिलहाल पूरे प्रदेश की निगाहें इस जांच पर टिकी हुई हैं। यदि जांच में यह साबित होता है कि पेपर लीक का नेटवर्क वर्षों से सक्रिय था, तो यह उत्तराखंड की उच्च शिक्षा व्यवस्था के लिए एक बड़ा खुलासा साबित हो सकता है। वहीं यदि यह मामला केवल वर्तमान परीक्षा तक सीमित पाया जाता है, तब भी विश्वविद्यालयों की परीक्षा सुरक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। पुलिस और विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद सभी तथ्य सार्वजनिक किए जाएंगे और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कठोरतम कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी।
