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संसद में निशिकांत दुबे की नेहरू-इंदिरा पर टिप्पणियों से भड़का विपक्ष, प्रियंका गांधी बोलीं- ‘यह लोकतंत्र का अपमान’

The Hill India News
Last updated: February 4, 2026 1:34 pm
The Hill India News
Published: February 4, 2026
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नई दिल्ली: संसद का बजट सत्र बुधवार को एक बार फिर तीखी नोकझोंक और हंगामे की भेंट चढ़ गया। लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान उस समय अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो गई, जब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद निशिकांत दुबे छह अलग-अलग किताबें लेकर सदन के पटल पर पहुंच गए। इन किताबों के अंशों को कोट करते हुए दुबे ने देश के पूर्व प्रधानमंत्रियों—पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी—के खिलाफ बेहद व्यक्तिगत और आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं। इन टिप्पणियों के बाद विपक्ष ने जोरदार विरोध दर्ज कराया, जिसके चलते सदन की कार्यवाही बाधित हुई।

Contents
निशिकांत दुबे के दावे और सदन में तनावप्रियंका गांधी का तीखा हमला: “सरकार की सनक है नेहरू का नाम लेना”सोशल मीडिया पर ‘जंग’ जारी: “लंका में आग लग जाएगी”स्पीकर ओम बिरला के पास पहुंची शिकायतसंसदीय नियमों पर बहस: विपक्ष का ‘दोहरा मापदंड’ का आरोपलोकतंत्र की गरिमा पर सवाल?

निशिकांत दुबे के दावे और सदन में तनाव

बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने चर्चा के दौरान नेहरू-गांधी परिवार के ऐतिहासिक संदर्भों को लेकर कई तीखे हमले किए। उन्होंने कथित ऐतिहासिक दस्तावेजों और किताबों का हवाला देते हुए पंडित नेहरू के लिए “अमर्यादित” शब्दों का प्रयोग किया और इंदिरा गांधी के निजी व राजनीतिक संबंधों को लेकर दावों की झड़ी लगा दी।

हैरानी की बात यह रही कि जब पीठासीन अधिकारी कृष्णा प्रसाद टेनेटी ने उन्हें बार-बार रोकने की कोशिश की और संसदीय गरिमा बनाए रखने का निर्देश दिया, तब भी दुबे अपनी बात पर अड़े रहे। उन्होंने अपनी टिप्पणियों को जारी रखा, जिससे विपक्षी खेमे में भारी आक्रोश फैल गया। कांग्रेस सहित ‘इंडिया’ गठबंधन के सांसदों ने वेल में आकर नारेबाजी शुरू कर दी, जिसके बाद सदन की कार्यवाही को स्थगित करना पड़ा।

प्रियंका गांधी का तीखा हमला: “सरकार की सनक है नेहरू का नाम लेना”

इस पूरे घटनाक्रम पर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने केंद्र की मोदी सरकार और सदन के संचालन के तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े किए। मीडिया से बातचीत में प्रियंका ने आरोप लगाया कि सरकार दोहरे मापदंड अपना रही है।

“जब मोदी सरकार सदन की कार्यवाही में बाधा डालना चाहती है, तो वह निशिकांत दुबे जैसे सांसदों को खड़ा कर देती है। एक तरफ नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जी को प्रकाशित किताबों से कोट करने की अनुमति नहीं दी जाती, उनका माइक बंद कर दिया जाता है, वहीं दूसरी ओर निशिकांत दुबे छह किताबें लेकर आते हैं और उन्हें लगातार बोलने दिया जाता है।” — प्रियंका गांधी, कांग्रेस महासचिव

प्रियंका ने आगे कहा कि यह केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उन करोड़ों मतदाताओं का अपमान है जिन्होंने विपक्ष को चुनकर भेजा है। उन्होंने इसे प्रधानमंत्री मोदी की “सनक” करार देते हुए कहा कि ज्वलंत मुद्दों से देश का ध्यान भटकाने के लिए बार-बार नेहरू जी का नाम घसीटा जा रहा है।

सोशल मीडिया पर ‘जंग’ जारी: “लंका में आग लग जाएगी”

सदन में हंगामे के बाद भी निशिकांत दुबे शांत नहीं हुए। शाम को उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर एक पत्र साझा किया, जो कथित तौर पर पंडित नेहरू ने जनरल करियप्पा को लिखा था। दुबे ने पोस्ट में चेतावनी भरे लहजे में लिखा: “कुछ कहूंगा तो बवाल हो जाएगा, कांग्रेस की लंका में आग लग जाएगी? नेहरू-गांधी परिवार जानी दुश्मन हो जाएगा?”

दुबे के इस रुख ने राजनीतिक माहौल को और भी गरमा दिया है, जिससे आने वाले दिनों में संसद के भीतर टकराव और बढ़ने के आसार हैं।

स्पीकर ओम बिरला के पास पहुंची शिकायत

सदन की कार्यवाही स्थगित होने के बाद विपक्षी सांसदों का एक प्रतिनिधिमंडल लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मिला। सूत्रों के अनुसार, सांसदों ने निशिकांत दुबे के आचरण और उनके द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा पर कड़ी आपत्ति जताई।

  • विपक्ष की मांग: निशिकांत दुबे की टिप्पणियों को सदन की कार्यवाही से हटाया जाए (Expunge)।

  • स्पीकर का निर्देश: स्पीकर ओम बिरला ने विपक्षी सांसदों की बातें सुनने के बाद उनसे पूरे मामले की लिखित शिकायत मांगी है, ताकि नियमानुसार कार्रवाई की जा सके।

संसदीय नियमों पर बहस: विपक्ष का ‘दोहरा मापदंड’ का आरोप

विपक्षी सांसदों ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि सत्ता पक्ष के सदस्यों को इतिहास की पुनर्व्याख्या करने और अपमानजनक भाषा बोलने की छूट दी जा रही है, जबकि विपक्ष के माइक को अक्सर “तथ्यों की जांच” के नाम पर म्यूट कर दिया जाता है। कांग्रेस ने दावा किया कि राहुल गांधी द्वारा उद्धृत किए गए साक्ष्यों को रिकॉर्ड पर नहीं लिया जाता, जबकि बीजेपी के दावों पर कोई लगाम नहीं है।


लोकतंत्र की गरिमा पर सवाल?

संसद के भीतर जिस तरह का ‘बुक वॉर’ और निजी हमलों का सिलसिला शुरू हुआ है, वह भारतीय संसदीय लोकतंत्र की समृद्ध परंपराओं के लिए एक बड़ी चुनौती है। नीतिगत चर्चाओं के बजाय व्यक्तिगत चरित्र चित्रण और इतिहास के विवादास्पद पहलुओं पर बहस ने सदन के समय और जनता के पैसे की बर्बादी पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सबकी नजर स्पीकर ओम बिरला के फैसले पर है कि वे लिखित शिकायत के बाद क्या दंडात्मक या सुधारात्मक कदम उठाते हैं।

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