
नैनीताल: उत्तराखंड के राजनीतिक गलियारों में एक बार फिर चुनाव याचिकाओं को लेकर हलचल तेज हो गई है। लोहाघाट विधानसभा सीट से कांग्रेस के विधायक खुशाल सिंह अधिकारी के निर्वाचन को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका पर नैनीताल हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता की दलीलें सुनीं और विपक्षी पक्ष को 12 मई को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। इस मामले के अदालत में पहुंचने के बाद उत्तराखंड की राजनीति में एक नया कानूनी दांव-पेच शुरू हो गया है।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद लोहाघाट विधानसभा क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। बीते विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार खुशाल सिंह अधिकारी ने जीत हासिल की थी। हालांकि, उनकी इस जीत को उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पराजित प्रत्याशी पूरन सिंह फर्त्याल ने चुनाव याचिका दायर कर नैनीताल हाईकोर्ट में चुनौती दी है।
याचिकाकर्ता पूरन सिंह फर्त्याल की ओर से आरोप लगाया गया है कि विधायक खुशाल सिंह अधिकारी द्वारा नामांकन पत्र के दौरान नियमों का घोर उल्लंघन किया गया। याचिका में मुख्य रूप से यह कहा गया है कि खुशाल सिंह अधिकारी ने 24 जनवरी 2022 को अपना नामांकन दाखिल किया था, जबकि उन्होंने शपथ पत्र 28 जनवरी को प्रस्तुत किया। नियमानुसार शपथ पत्र नामांकन के साथ ही दाखिल किया जाना अनिवार्य होता है।
संपत्ति के ब्यौरे और सरकारी ठेकों को छिपाने का आरोप
याचिका में केवल समय का ही नहीं, बल्कि सूचनाओं को छिपाने का भी गंभीर आरोप लगाया गया है। फर्त्याल का आरोप है कि विधायक ने अपने शपथ पत्र में कई गलत और भ्रामक जानकारियां दीं। इसके साथ ही, उन्होंने अपनी आय के वास्तविक स्रोतों का सही विवरण नहीं दिया।
सबसे बड़ा आरोप यह लगाया गया है कि जब खुशाल सिंह अधिकारी ने नामांकन दाखिल किया, उस समय उनके नाम पर 25 सरकारी कार्यों के ठेके चल रहे थे, जिसकी जानकारी उन्होंने चुनाव आयोग से छिपाई। इतना ही नहीं, याचिकाकर्ता का यह भी कहना है कि चुनाव जीतने और विधायक बनने के बाद भी उन्होंने दो सरकारी ठेके लिए, जो कि जनप्रतिनिधित्व कानून और आचार संहिता का खुला उल्लंघन है। इन्हीं आधारों पर विधायक का निर्वाचन (विधायिका) रद्द करने की मांग की गई है।
नैनीताल हाईकोर्ट में 5 मई की सुनवाई
आज यानी 5 मई को नैनीताल हाईकोर्ट की एकलपीठ के समक्ष इस मामले को लेकर तीखी बहस हुई। सुनवाई के दौरान विपक्षी (खुशाल सिंह अधिकारी) के अधिवक्ताओं की ओर से दलील दी गई कि याचिका में कई तकनीकी और कानूनी कमियां हैं। उनका तर्क था कि इस आधार पर याचिका सुनवाई के योग्य नहीं है और इसे प्रारंभिक स्तर पर ही निरस्त कर दिया जाना चाहिए।
इसके जवाब में याचिकाकर्ता के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों और नज़ीरों (Precedents) का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि नामांकन पत्र के नियमों और संपत्ति के उचित विवरण का खुलासा न करना एक गंभीर अनियमितता है। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुना और याचिकाकर्ता के तर्कों को संज्ञान में लेते हुए विपक्षी पक्ष को अपना पक्ष रखने के लिए 12 मई की तिथि निर्धारित की है।
राजनीतिक और कानूनी निहितार्थ
इस मामले पर पूरे कुमाऊं मंडल और विशेष रूप से लोहाघाट क्षेत्र की जनता की नजरें टिकी हुई हैं। यदि नैनीताल हाईकोर्ट याचिकाकर्ता के तर्कों से सहमत होती है और विधायक के खिलाफ आरोपों को सही पाती है, तो उत्तराखंड की सियासत में एक बड़ा उलटफेर देखने को मिल सकता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे मामले जनप्रतिनिधियों की पारदर्शिता और जवाबदेही को कटघरे में खड़ा करते हैं। चुनाव के समय संपत्ति और अनुबंधों (Contracts) की जानकारी छिपाने के मामलों पर न्यायालय का रुख हमेशा से सख्त रहा है। अब 12 मई की सुनवाई में यह तय होगा कि इस चुनाव याचिका पर आगे किस तरह से सुनवाई होगी और अदालत क्या रुख अपनाती है।
आगे की राह
फिलहाल गेंद नैनीताल हाईकोर्ट के पाले में है। 12 मई को होने वाली सुनवाई में विधायक खुशाल सिंह अधिकारी के वकीलों को इन आरोपों का बिंदुवार जवाब देना होगा। पूरन सिंह फर्त्याल के आरोपों की सत्यता और तकनीकी पहलुओं पर बहस के बाद ही अदालत कोई अंतिम फैसला या आगे की दिशा तय करेगी।
उत्तराखंड के चुनावी इतिहास में चुनाव याचिकाओं का असर काफी गहरा रहा है, और लोहाघाट का यह प्रकरण राज्य की राजनीति का एक नया और महत्वपूर्ण अध्याय बन चुका है।



