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विधानसभा चुनावों में NOTA का बढ़ता असर: असम में सबसे ज्यादा, तमिलनाडु में सबसे कम पड़े वोट

चार राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश पुदुचेरी में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजों ने जहां कई राजनीतिक समीकरण बदल दिए, वहीं एक बार फिर “नोटा” यानी “None of the Above” ने भी सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है। चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक बड़ी संख्या में मतदाताओं ने किसी भी उम्मीदवार या राजनीतिक दल को पसंद नहीं किया और उन्होंने ईवीएम में दिए गए NOTA विकल्प का इस्तेमाल किया। यह संकेत है कि देश में एक ऐसा वर्ग लगातार बढ़ रहा है जो चुनावी प्रक्रिया में भाग तो लेना चाहता है, लेकिन उपलब्ध उम्मीदवारों से संतुष्ट नहीं है।

इस बार के विधानसभा चुनावों में सबसे ज्यादा NOTA वोट असम में दर्ज किए गए। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार असम में कुल 1.23 प्रतिशत मतदाताओं ने NOTA का बटन दबाया। यह पांचों राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सबसे अधिक प्रतिशत है। असम में कुल 2 लाख 67 हजार 191 लोगों ने NOTA को चुना। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह संख्या केवल असंतोष नहीं बल्कि मतदाताओं की बढ़ती राजनीतिक जागरूकता को भी दर्शाती है।

पश्चिम बंगाल NOTA वोटों के मामले में दूसरे स्थान पर रहा। यहां कुल 0.78 प्रतिशत मतदाताओं ने NOTA का इस्तेमाल किया। संख्या के हिसाब से देखें तो पश्चिम बंगाल में 4 लाख 94 हजार 932 लोगों ने किसी भी उम्मीदवार को वोट देने से इनकार करते हुए NOTA चुना। बंगाल में इस बार चुनाव बेहद हाई प्रोफाइल और राजनीतिक तनाव से भरे रहे। ऐसे माहौल में इतनी बड़ी संख्या में NOTA वोट पड़ना राजनीतिक दलों के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है।

पुदुचेरी में 0.77 प्रतिशत मतदाताओं ने NOTA को चुना, जबकि केरल में यह आंकड़ा 0.57 प्रतिशत रहा। तमिलनाडु में सबसे कम 0.41 प्रतिशत वोट NOTA को मिले। हालांकि प्रतिशत कम होने के बावजूद तमिलनाडु में NOTA की अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तिरुपत्तूर विधानसभा सीट रही, जहां चुनाव का फैसला केवल 1 वोट से हुआ। यहां विजय की पार्टी टीवीके के उम्मीदवार ने डीएमके प्रत्याशी को सिर्फ एक वोट के अंतर से हराया। खास बात यह रही कि इस सीट पर 747 वोट NOTA को पड़े। यदि इनमें से कुछ वोट भी किसी उम्मीदवार के पक्ष में जाते तो परिणाम पूरी तरह बदल सकता था।

विशेषज्ञों का कहना है कि NOTA अब केवल प्रतीकात्मक विकल्प नहीं रह गया है। भले ही भारतीय चुनाव प्रणाली में NOTA को सबसे अधिक वोट मिलने पर चुनाव रद्द नहीं होता, लेकिन इसके जरिए मतदाता राजनीतिक दलों को स्पष्ट संदेश देते हैं कि वे बेहतर उम्मीदवार चाहते हैं। कई बार NOTA के वोट जीत और हार के अंतर से अधिक होते हैं, जिससे यह साबित होता है कि यदि राजनीतिक दल उम्मीदवार चयन में सावधानी बरतें तो चुनावी नतीजों पर बड़ा असर पड़ सकता है।

भारत में पहली बार NOTA का विकल्प 2014 के लोकसभा चुनाव में लागू किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद चुनाव आयोग ने ईवीएम मशीनों में NOTA का विकल्प जोड़ा। इसका उद्देश्य मतदाताओं को यह अधिकार देना था कि यदि उन्हें कोई भी उम्मीदवार पसंद न हो तो वे अपनी नाराजगी दर्ज करा सकें। इसके बाद से हर चुनाव में NOTA वोटों की संख्या लगातार चर्चा का विषय रही है।

इस बार के चुनाव परिणामों ने यह साफ कर दिया है कि मतदाता अब केवल वोट डालने तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि वे अपनी पसंद और नापसंद को खुलकर जाहिर भी कर रहे हैं। राजनीतिक दलों के लिए यह संकेत है कि केवल चुनावी वादों से काम नहीं चलेगा, बल्कि साफ छवि, मजबूत नेतृत्व और जनता से जुड़े उम्मीदवारों को मैदान में उतारना होगा। आने वाले समय में NOTA भारतीय राजनीति में और अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है।

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