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उत्तराखंड वन विभाग में बड़े फेरबदल की तैयारी: 12 जून को CSB बैठक में तय होगा DFO और CF स्तर के अधिकारियों का भविष्य

The Hill India News
Last updated: June 9, 2026 1:29 am
The Hill India News
Published: June 9, 2026
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देहरादून: उत्तराखंड प्रशासनिक गलियारों से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है। राज्य के वन विभाग में व्यापक स्तर पर प्रशासनिक सर्जरी की पटकथा लिखी जा चुकी है। प्रदेश में भीषण वनाग्नि का दौर अभी पूरी तरह थमा भी नहीं है कि विभाग के शीर्ष और संवेदनशील पदों पर तैनात भारतीय वन सेवा (IFS) और प्रांतीय वन सेवा (SFS) के अधिकारियों के तबादलों को लेकर शासन स्तर पर कसरत अंतिम दौर में पहुंच गई है।

Contents
वन महकमे की रीढ़ ‘DFO’ की कुर्सियों पर चलेगी तबादला एक्सप्रेसमुख्य सचिव की अध्यक्षता में 12 जून को सिविल सर्विस बोर्ड की बैठकगढ़वाल से कुमाऊं तक हिलेंगे कई बड़े वन प्रभागराजाजी टाइगर रिजर्व के निदेशक और CF स्तर पर भी बड़े बदलाव के संकेतमध्यक्रम के प्रशासनिक ढांचे में भी बदलाव: ACF और SDO सूची तैयार

विश्वस्त सूत्रों के मुताबिक, राज्य के कई जिलों के डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) और कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट (CF) के कार्यक्षेत्र में बदलाव की सूची तैयार हो चुकी है। इस महा-तबादला सूची पर अंतिम मुहर लगाने के लिए आगामी 12 जून को सिविल सर्विस बोर्ड (CSB) की एक अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक बुलाई गई है। इस बैठक के बाद वन महकमे की पूरी तस्वीर बदलने की उम्मीद है।

वन महकमे की रीढ़ ‘DFO’ की कुर्सियों पर चलेगी तबादला एक्सप्रेस

उत्तराखंड के भौगोलिक और पर्यावरणीय ढांचे में वन विभाग की भूमिका सर्वोपरि है। इस व्यवस्था में डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (DFO) के पद को वन प्रशासन की सबसे मजबूत रीढ़ माना जाता है। किसी भी वन प्रभाग (Forest Division) की सुरक्षा, वन्यजीव प्रबंधन, वनाग्नि नियंत्रण, अवैध शिकार व कटान पर रोक और सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को धरातल पर उतारने की शत-प्रतिशत जिम्मेदारी डीएफओ के कंधों पर होती है।

यही वजह है कि इन पदों पर होने वाला कोई भी फेरबदल सीधे तौर पर उत्तराखंड के जंगलों की सेहत और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है। इस बार शासन ने तबादला नीति के तहत बेहद गोपनीय और गंभीर तरीके से काम किया है। हाल ही में जंगलों में भड़की भीषण आग के दौरान किस अधिकारी का प्रदर्शन कैसा रहा, किसने संकट के समय मुस्तैदी दिखाई और कहां प्रशासनिक शिथिलता देखने को मिली, इन सभी बिंदुओं का एक विस्तृत रिपोर्ट कार्ड तैयार किया गया है। अधिकारियों के इसी ‘परफॉर्मेंस इंडेक्स’ और क्षेत्रीय आवश्यकताओं के आधार पर नई तैनाती की रूपरेखा बनाई गई है।

मुख्य सचिव की अध्यक्षता में 12 जून को सिविल सर्विस बोर्ड की बैठक

इस पूरी प्रशासनिक कवायद को अंतिम रूप देने और वैधानिक स्वीकृति प्रदान करने के लिए आगामी 12 जून को सिविल सर्विस बोर्ड की उच्च स्तरीय बैठक आयोजित होने जा रही है। शासन द्वारा प्रस्तावित इस बैठक की अध्यक्षता उत्तराखंड के मुख्य सचिव आनंद वर्धन करेंगे। बैठक की संवेदनशीलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें प्रमुख सचिव (वन), प्रमुख वन संरक्षक (HoFF) सहित वन मुख्यालय और शासन के कई अन्य वरिष्ठ नीति-निर्माता अधिकारी व्यक्तिगत रूप से मौजूद रहेंगे।

माना जा रहा है कि इस बैठक के दौरान सिविल सर्विस बोर्ड के सामने रखे जाने वाले स्थानांतरण प्रस्तावों के हर एक पहलू पर गहनता से विचार-विमर्श होगा। बोर्ड की हरी झंडी मिलते ही मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) के अनुमोदन के बाद आधिकारिक स्थानांतरण सूची जारी कर दी जाएगी।

गढ़वाल से कुमाऊं तक हिलेंगे कई बड़े वन प्रभाग

सूत्रों की मानें तो इस बार की तबादला सूची बेहद चौंकाने वाली हो सकती है, क्योंकि इसके दायरे में राज्य के सबसे महत्वपूर्ण और ‘मलाईदार’ माने जाने वाले वन प्रभाग आ रहे हैं। गढ़वाल मंडल की बात करें तो:

  • देहरादून वन प्रभाग

  • मसूरी वन प्रभाग

  • चकराता वन प्रभाग

  • टिहरी वन प्रभाग

इन सभी संवेदनशील प्रभागों में नए चेहरों को जिम्मेदारी सौंपने की प्रबल संभावना है। इसके पीछे शासन का उद्देश्य पर्वतीय और दुर्गम क्षेत्रों में लंबे समय से तैनात अधिकारियों को मैदानी और अधिक जिम्मेदारी वाले क्षेत्रों में लाकर एक नया प्रशासनिक संतुलन स्थापित करना है। कई ऐसे अधिकारी भी इस रडार पर हैं, जो एक ही प्रभाग या जिले में अपनी तय समय-सीमा से अधिक का कार्यकाल पूरा कर चुके हैं।

कुमाऊं मंडल में भी हलचल तेज है। तराई क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण प्रभागों—तराई पश्चिम, तराई पूर्वी और तराई केंद्रीय वन प्रभाग पर शासन की विशेष नजर है। ये प्रभाग न केवल जैव विविधता बल्कि राजस्व और अवैध खनन व कटान के दृष्टिकोण से भी बेहद संवेदनशील माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त, टोंस वन प्रभाग और रामनगर वन प्रभाग जैसे क्षेत्रों में भी नए अधिकारियों की ताजपोशी की तैयारी है। साथ ही, उपवन संरक्षक वानिकी प्रशिक्षण अकादमी के पद पर भी किसी अनुभवी और अकादमिक पृष्ठभूमि वाले अधिकारी को तैनात किया जा सकता है।

राजाजी टाइगर रिजर्व के निदेशक और CF स्तर पर भी बड़े बदलाव के संकेत

यह प्रशासनिक फेरबदल केवल डीएफओ स्तर तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। वन विभाग के उच्चाधिकारियों यानी कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट (CF) स्तर पर भी बड़े फेरबदल के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। विशेष रूप से देहरादून और उसके आस-पास के राष्ट्रीय पार्कों और वन्यजीव क्षेत्रों की निगरानी करने वाले कुछ बेहद वरिष्ठ अधिकारियों के विभागों में कैंची चल सकती है।

सबसे बड़ी और चौंकाने वाली चर्चा राजाजी टाइगर रिजर्व के निदेशक पद को लेकर चल रही है। वन्यजीव संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के नक्शे पर खास पहचान रखने वाले राजाजी टाइगर रिजर्व के निदेशक पद पर बदलाव को इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा उलटफेर माना जा रहा है। यदि यहां नेतृत्व परिवर्तन होता है, तो इसे राज्य सरकार की वन्यजीव पर्यटन और संरक्षण नीति में एक नए अध्याय के रूप में देखा जाएगा।

मध्यक्रम के प्रशासनिक ढांचे में भी बदलाव: ACF और SDO सूची तैयार

शीर्ष स्तर के साथ-साथ वन विभाग के मध्यक्रम के प्रशासनिक ढांचे को भी दुरुस्त करने की तैयारी पूरी हो चुकी है। सहायक वन संरक्षक (ACF) स्तर के अधिकारियों के तबादलों की सूची लगभग फाइनल हो चुकी है और इसके आदेश किसी भी वक्त जारी किए जा सकते हैं।

इसके साथ ही, पिछले काफी समय से लंबित चल रहे एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर भी इस बैठक के दौरान फैसला आ सकता है। विभाग के कुछ बेहद अनुभवी और वरिष्ठ रेंज अधिकारियों को वरिष्ठता के आधार पर प्रभारी उप प्रभागीय वनाधिकारी (SDO) की जिम्मेदारी देने का प्रस्ताव शासन स्तर पर विचाराधीन है। यदि इस फाइल को कैबिनेट या सिविल सर्विस बोर्ड से हरी झंडी मिलती है, तो मैदानी स्तर पर काम करने वाले कई फील्ड अफसरों को पहली बार उच्च प्रशासनिक और नीतिगत फैसले लेने वाली कुर्सियों पर बैठने का मौका मिलेगा।

अब वन महकमे से लेकर राजनीतिक गलियारों तक, सभी की निगाहें 12 जून को होने वाली सिविल सर्विस बोर्ड की बैठक पर टिक गई हैं। इस बैठक से निकलने वाले फैसले न केवल उत्तराखंड के बेशकीमती जंगलों की सुरक्षा का भविष्य तय करेंगे, बल्कि राज्य सरकार की प्रशासनिक दृढ़ता का संदेश भी देंगे।

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