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Reading: उत्तराखंड की वित्तीय सेहत पर बड़ा सवाल: कर्ज का अनुपात घटा, राजस्व अधिशेष भी कायम, फिर भी 53% आय के लिए केंद्र पर निर्भरता क्यों?
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The Hill India > Blog > उत्तराखंड > उत्तराखंड की वित्तीय सेहत पर बड़ा सवाल: कर्ज का अनुपात घटा, राजस्व अधिशेष भी कायम, फिर भी 53% आय के लिए केंद्र पर निर्भरता क्यों?
उत्तराखंडफीचर्ड

उत्तराखंड की वित्तीय सेहत पर बड़ा सवाल: कर्ज का अनुपात घटा, राजस्व अधिशेष भी कायम, फिर भी 53% आय के लिए केंद्र पर निर्भरता क्यों?

The Hill India News
Last updated: August 12, 2026 4:39 am
The Hill India News
Published: August 12, 2026
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अपनी कमाई बढ़ाए बिना क्या आत्मनिर्भर बन पाएगा उत्तराखंड? वेतन, पेंशन और ब्याज में राजस्व का करीब 61% हिस्सा खर्च; विकास के लिए संसाधन जुटाना सबसे बड़ी चुनौती

देहरादून। पहाड़, पर्यटन, तीर्थाटन और जलविद्युत के लिए देश-दुनिया में पहचान रखने वाले उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की तस्वीर कई मायनों में राहत देने वाली है, लेकिन इसके भीतर कुछ ऐसी चुनौतियां भी छिपी हैं, जिन्हें नजरअंदाज करना आने वाले वर्षों में राज्य के लिए भारी पड़ सकता है। राज्य के ऊपर कर्ज का बोझ जरूर है, लेकिन सकल राज्य घरेलू उत्पाद यानी GSDP के मुकाबले कुल देनदारियों का अनुपात पिछले कुछ वर्षों में लगातार नियंत्रित हुआ है। दूसरी ओर, सरकार ने 2026-27 के बजट में राजस्व खाते में करीब ₹2,536 करोड़ के राजस्व अधिशेष का अनुमान लगाया है। यह वित्तीय अनुशासन की दृष्टि से सकारात्मक संकेत माना जा सकता है।

Contents
अपनी कमाई बढ़ाए बिना क्या आत्मनिर्भर बन पाएगा उत्तराखंड? वेतन, पेंशन और ब्याज में राजस्व का करीब 61% हिस्सा खर्च; विकास के लिए संसाधन जुटाना सबसे बड़ी चुनौतीकर्ज कम होना राहत की बात, लेकिन पूरी तस्वीर नहीं2026-27 में राजस्व अधिशेष सरकार के लिए सकारात्मक संकेतकेंद्र से मिलने वाली राशि पर 53 प्रतिशत निर्भरता क्यों अहम?GST बना राज्य की कमाई का सबसे बड़ा आधारगैर-कर राजस्व बढ़ाना भी जरूरीविकास के लिए पूंजीगत खर्च बढ़ाने की कोशिशशिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्र पर भी बड़ा खर्चवेतन-पेंशन-ब्याज: बजट की सबसे बड़ी चुनौतीराजकोषीय घाटा भी चिंता का विषयकर्ज-जीडीपी अनुपात में गिरावट राहत का संकेतआंकड़ों की व्याख्या में सावधानी भी जरूरीपर्यटन और जलविद्युत में छिपी हैं बड़ी संभावनाएंआत्मनिर्भरता का रास्ता क्या हो सकता है?असली चुनौती: केंद्र पर निर्भरता घटाना नहीं, अपनी क्षमता बढ़ानाउत्तराखंड की वित्तीय कहानी का निष्कर्ष

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू उतना ही महत्वपूर्ण है। उत्तराखंड की अनुमानित राजस्व प्राप्तियों में करीब 53 प्रतिशत हिस्सा केंद्र से मिलने वाली राशि का है। यानी राज्य अपनी कुल राजस्व जरूरतों के लिए अभी भी केंद्र से मिलने वाले कर हस्तांतरण और अनुदानों पर काफी हद तक निर्भर है। राज्य के अपने कर और गैर-कर स्रोतों से करीब 47 प्रतिशत राजस्व आने का अनुमान है।

सबसे बड़ी चिंता यह है कि राज्य की अपनी और केंद्र से मिलने वाली कुल राजस्व प्राप्तियों में से बड़ी राशि पहले से तय खर्चों में चली जाती है। वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान पर ही 2026-27 में करीब ₹41,172 करोड़ खर्च होने का अनुमान है। यह कुल अनुमानित राजस्व प्राप्तियों का लगभग 61 प्रतिशत है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि उत्तराखंड पर कितना कर्ज है, बल्कि यह भी है कि सरकार के पास विकास, रोजगार, बुनियादी ढांचे और भविष्य के निवेश के लिए वास्तव में कितने संसाधन बचते हैं।

यही वजह है कि उत्तराखंड की वित्तीय सेहत को समझने के लिए कर्ज के आंकड़े के साथ-साथ अपनी आय, केंद्रीय निर्भरता, राजस्व खर्च, पूंजीगत निवेश और प्रतिबद्ध व्यय को भी एक साथ देखना जरूरी है।

कर्ज कम होना राहत की बात, लेकिन पूरी तस्वीर नहीं

किसी राज्य की वित्तीय स्थिति का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि उसके ऊपर कितने हजार करोड़ रुपये का कर्ज है। इसके लिए यह देखना भी जरूरी होता है कि राज्य की अर्थव्यवस्था यानी GSDP के मुकाबले उसकी कुल देनदारियां कितनी हैं और वह अपने कर्ज का भुगतान किस क्षमता से कर रहा है।

उत्तराखंड पर भी हजारों करोड़ रुपये का कर्ज है। हालांकि, कर्ज के अनुपात को राज्य की अर्थव्यवस्था के आकार के संदर्भ में देखने पर पिछले वर्षों में स्थिति में सुधार दिखाई देता है।

कैग के 2024-25 के वास्तविक खातों के मुताबिक, मार्च 2025 के अंत में उत्तराखंड का सार्वजनिक ऋण करीब ₹73,026 करोड़ था। इसके अलावा सार्वजनिक खाता देनदारियां करीब ₹17,631 करोड़ रहीं। दोनों को मिलाकर कुल देनदारियां करीब ₹90,657 करोड़ रहीं, जो राज्य के GSDP का लगभग 23.96 प्रतिशत थीं।

यह अनुपात 2023-24 में 24.10 प्रतिशत था। इससे पहले 2022-23 में यह 24.89 प्रतिशत, 2021-22 में 28 प्रतिशत और 2020-21 में 31.66 प्रतिशत रहा था।

यानी महामारी के दौर में जहां राज्य की अर्थव्यवस्था पर दबाव था और देनदारियों का अनुपात काफी ऊंचा था, वहीं उसके बाद इसमें धीरे-धीरे कमी आई है। 2020-21 के 31.66 प्रतिशत से घटकर 2024-25 में करीब 23.96 प्रतिशत तक पहुंचना वित्तीय प्रबंधन की दिशा में एक सकारात्मक संकेत है।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि उत्तराखंड के सामने कर्ज की कोई चुनौती नहीं है। ब्याज भुगतान सरकार के बजट पर लगातार बड़ा बोझ बना हुआ है। इसलिए कर्ज का अनुपात नियंत्रित रहने के बावजूद भविष्य में उधारी की जरूरत और उसके ब्याज खर्च पर नजर रखना जरूरी होगा।

2026-27 में राजस्व अधिशेष सरकार के लिए सकारात्मक संकेत

उत्तराखंड सरकार ने 2026-27 के बजट में ₹2,536 करोड़ का राजस्व अधिशेष अनुमानित किया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि सरकार की अनुमानित राजस्व प्राप्तियां उसके राजस्व खर्च से अधिक रहने की उम्मीद है।

राजस्व अधिशेष को सामान्य तौर पर वित्तीय अनुशासन का सकारात्मक संकेत माना जाता है। इसका मतलब यह है कि सरकार अपने नियमित और रोजमर्रा के खर्च को पूरा करने के लिए राजस्व खाते में लगातार कर्ज लेने पर निर्भर नहीं है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। राजस्व अधिशेष होने का मतलब यह नहीं कि सरकार के पास असीमित पैसा उपलब्ध है। सरकार को वेतन, पेंशन, ब्याज, सामाजिक योजनाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन और अन्य जरूरी सेवाओं पर लगातार खर्च करना पड़ता है।

इसलिए राजस्व अधिशेष को बनाए रखने के साथ-साथ पूंजीगत खर्च बढ़ाना भी जरूरी है। पूंजीगत खर्च के जरिए सड़क, पुल, अस्पताल, स्कूल, सिंचाई, परिवहन और अन्य दीर्घकालिक परिसंपत्तियां तैयार होती हैं, जो भविष्य की अर्थव्यवस्था को मजबूती देती हैं।

केंद्र से मिलने वाली राशि पर 53 प्रतिशत निर्भरता क्यों अहम?

2026-27 के बजट अनुमानों के मुताबिक उत्तराखंड को कुल ₹67,526 करोड़ की राजस्व प्राप्तियां होने की उम्मीद है।

इसमें राज्य के अपने कर और गैर-कर स्रोतों से करीब ₹31,620 करोड़ जुटाने का अनुमान है। वहीं केंद्र से करों में हिस्सेदारी और अनुदान के रूप में करीब ₹35,906 करोड़ मिलने का अनुमान है।

यानी कुल राजस्व प्राप्तियों में लगभग 47 प्रतिशत हिस्सा राज्य के अपने संसाधनों का और करीब 53 प्रतिशत हिस्सा केंद्र से मिलने वाले संसाधनों का है।

केंद्र से मिलने वाली इस राशि में करीब ₹17,415 करोड़ केंद्रीय करों में राज्य की हिस्सेदारी और करीब ₹18,491 करोड़ अनुदान के रूप में अनुमानित हैं।

यह आंकड़ा उत्तराखंड की वित्तीय संरचना की एक बड़ी तस्वीर सामने रखता है। राज्य की अर्थव्यवस्था को चलाने और विकास योजनाओं को वित्तीय आधार देने में केंद्र से मिलने वाली राशि की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।

केंद्रीय हस्तांतरण देश के संघीय वित्तीय ढांचे का स्वाभाविक हिस्सा हैं और राज्यों को विकास के लिए संसाधन उपलब्ध कराने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन किसी भी राज्य की दीर्घकालिक वित्तीय मजबूती के लिए अपनी आय बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है।

यही वजह है कि उत्तराखंड के सामने आने वाले वर्षों में सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि वह अपने कर और गैर-कर राजस्व को कितनी तेजी से बढ़ा सकता है।

GST बना राज्य की कमाई का सबसे बड़ा आधार

उत्तराखंड के अपने कर राजस्व में वस्तु एवं सेवा कर यानी SGST सबसे बड़ा स्रोत बना हुआ है।

2026-27 के बजट अनुमान के अनुसार राज्य के अपने कर राजस्व से करीब ₹25,913 करोड़ मिलने की उम्मीद है। इसमें SGST से करीब ₹12,200 करोड़, आबकारी से करीब ₹5,384 करोड़, स्टांप एवं पंजीकरण से करीब ₹3,092 करोड़, VAT/बिक्री कर से करीब ₹2,652 करोड़ और मोटर वाहन कर से करीब ₹1,703 करोड़ मिलने का अनुमान है।

इन आंकड़ों से साफ है कि राज्य के कर संग्रह में GST की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।

इसका एक अर्थ यह भी है कि उत्तराखंड को अपनी कर संग्रह क्षमता को मजबूत करने के लिए कारोबार के विस्तार, कर अनुपालन में सुधार, डिजिटल निगरानी और आर्थिक गतिविधियों के औपचारिकरण पर जोर देना होगा।

यदि राज्य में व्यापार और सेवा क्षेत्र का विस्तार होता है, पर्यटन गतिविधियां बढ़ती हैं, औद्योगिक निवेश आता है और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं तो अप्रत्यक्ष रूप से कर संग्रह का आधार भी मजबूत हो सकता है।

गैर-कर राजस्व बढ़ाना भी जरूरी

राज्य के पास सिर्फ कर ही आय का स्रोत नहीं है। गैर-कर राजस्व भी वित्तीय मजबूती में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

2026-27 में उत्तराखंड का अपना गैर-कर राजस्व करीब ₹5,707 करोड़ रहने का अनुमान है। 2025-26 के संशोधित अनुमान में यह करीब ₹5,198 करोड़ था।

गैर-कर राजस्व में विभिन्न शुल्क, रॉयल्टी, लाभांश और अन्य प्राप्तियां शामिल हो सकती हैं। उत्तराखंड जैसे प्राकृतिक संसाधनों और पर्यटन क्षमता वाले राज्य के लिए गैर-कर आय बढ़ाने की संभावनाएं महत्वपूर्ण हैं।

हालांकि, पर्यटन और जलविद्युत को सीधे-सीधे राज्य की सबसे बड़ी सरकारी आय बताना सही नहीं होगा। पर्यटन का प्रभाव इससे कहीं व्यापक है। इससे होटल, होमस्टे, रेस्तरां, परिवहन, स्थानीय बाजार, हस्तशिल्प और सेवा क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं।

इसी तरह जलविद्युत राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र है। लेकिन बिजली उत्पादन से होने वाली रॉयल्टी, लाभांश और अन्य प्राप्तियां अलग-अलग वित्तीय मदों में दर्ज होती हैं। इसलिए पर्यटन और जलविद्युत का महत्व केवल सरकारी खजाने में सीधे जमा होने वाले राजस्व से नहीं मापा जा सकता।

विकास के लिए पूंजीगत खर्च बढ़ाने की कोशिश

राज्य सरकार ने 2026-27 में ₹64,989 करोड़ का राजस्व खर्च प्रस्तावित किया है। इसके अलावा पूंजीगत व्यय यानी दीर्घकालिक परिसंपत्तियों के निर्माण पर करीब ₹18,153 करोड़ का प्रावधान किया गया है।

पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान की तुलना में पूंजीगत व्यय में करीब 22 प्रतिशत की वृद्धि प्रस्तावित है। यह राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है, क्योंकि पूंजीगत खर्च भविष्य में आर्थिक गतिविधियों की क्षमता बढ़ाता है।

सड़कों, पुलों, परिवहन, शहरी बुनियादी ढांचे, कृषि और अन्य क्षेत्रों में पूंजी निवेश बढ़ाने की कोशिश की गई है। सड़कों और पुलों के लिए करीब ₹2,106 करोड़ के पूंजीगत परिव्यय का प्रावधान किया गया है।

उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य के लिए सड़क और पुल सिर्फ विकास परियोजनाएं नहीं हैं, बल्कि आर्थिक गतिविधियों की रीढ़ हैं। बेहतर सड़क संपर्क से पर्यटन, कृषि उत्पादों की बाजार तक पहुंच, स्थानीय कारोबार और रोजगार को बढ़ावा मिल सकता है।

शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक क्षेत्र पर भी बड़ा खर्च

राज्य सरकार के बजट में सामाजिक क्षेत्र को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

2026-27 में शिक्षा, खेल, कला एवं संस्कृति के लिए करीब ₹13,201 करोड़, कृषि एवं संबद्ध गतिविधियों के लिए ₹6,078 करोड़, ग्रामीण विकास के लिए करीब ₹5,533 करोड़, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण के लिए करीब ₹4,916 करोड़ और सामाजिक कल्याण एवं पोषण के लिए करीब ₹4,556 करोड़ का प्रावधान किया गया है।

यह खर्च बताता है कि सरकार के सामने केवल आर्थिक विकास ही प्राथमिकता नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और सामाजिक सुरक्षा को भी बनाए रखना जरूरी है।

उत्तराखंड में भौगोलिक परिस्थितियां अन्य राज्यों से अलग हैं। दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और प्रशासनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने की लागत अधिक होती है। ऐसे में राज्य को सीमित संसाधनों के भीतर सामाजिक सेवाओं और विकास कार्यों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।

वेतन-पेंशन-ब्याज: बजट की सबसे बड़ी चुनौती

उत्तराखंड की वित्तीय तस्वीर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा Committed Expenditure यानी प्रतिबद्ध व्यय है।

वेतन, पेंशन और ब्याज ऐसे खर्च हैं जिन्हें सरकार अचानक कम या बंद नहीं कर सकती। 2026-27 में वेतन पर करीब ₹22,105 करोड़, पेंशन पर करीब ₹11,137 करोड़ और ब्याज भुगतान पर करीब ₹7,929 करोड़ खर्च होने का अनुमान है।

इन तीनों को जोड़ने पर करीब ₹41,172 करोड़ की राशि बनती है।

यह कुल अनुमानित राजस्व प्राप्तियों ₹67,526 करोड़ का लगभग 61 प्रतिशत है।

यही वह आंकड़ा है जो उत्तराखंड की वित्तीय चुनौती को सबसे स्पष्ट तरीके से सामने रखता है। सरकार की राजस्व आय का बड़ा हिस्सा ऐसे खर्चों में चला जाता है जिन्हें तुरंत कम करना संभव नहीं है।

इसका मतलब यह है कि नई योजनाओं, विकास परियोजनाओं और भविष्य के निवेश के लिए उपलब्ध वित्तीय गुंजाइश सीमित हो जाती है।

इसलिए राज्य को सिर्फ नई आय बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि प्रतिबद्ध व्यय के बेहतर प्रबंधन पर भी ध्यान देना होगा।

राजकोषीय घाटा भी चिंता का विषय

एक तरफ राजस्व अधिशेष सकारात्मक संकेत दे रहा है, लेकिन दूसरी तरफ राजकोषीय घाटा सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है।

2026-27 में राजकोषीय घाटा करीब ₹15,989 करोड़, यानी GSDP का लगभग 3.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है। 2025-26 के संशोधित अनुमान में यह करीब 3.4 प्रतिशत था।

राजकोषीय घाटे का अर्थ है कि सरकार की कुल आय और कुल खर्च के बीच अंतर बना हुआ है। इस अंतर को पूरा करने के लिए सरकार को उधारी का सहारा लेना पड़ सकता है।

यहां राजस्व अधिशेष और राजकोषीय घाटे के बीच अंतर समझना बेहद जरूरी है। राजस्व खाते में अधिशेष होने के बावजूद सरकार के कुल बजट में घाटा हो सकता है, खासकर तब जब सरकार बड़े पैमाने पर पूंजीगत निवेश कर रही हो।

इसलिए हर राजकोषीय घाटा अपने आप में खराब नहीं होता। यदि उधारी का इस्तेमाल सड़क, पुल, अस्पताल, सिंचाई, शिक्षा या अन्य उत्पादक परिसंपत्तियां बनाने में किया जाए और भविष्य में उससे आर्थिक गतिविधि तथा राजस्व बढ़े, तो इसका सकारात्मक प्रभाव हो सकता है। लेकिन लगातार बढ़ती उधारी और ब्याज का बोझ भविष्य में वित्तीय दबाव पैदा कर सकता है।

कर्ज-जीडीपी अनुपात में गिरावट राहत का संकेत

कैग के आंकड़ों के मुताबिक उत्तराखंड की कुल देनदारियों और GSDP के बीच अनुपात में लगातार कमी आई है।

2020-21 में यह अनुपात करीब 31.66 प्रतिशत था। 2021-22 में यह 28 प्रतिशत, 2022-23 में 24.89 प्रतिशत, 2023-24 में 24.10 प्रतिशत और 2024-25 में करीब 23.96 प्रतिशत रहा।

यह गिरावट निश्चित तौर पर राहत देने वाली है।

इससे संकेत मिलता है कि राज्य की अर्थव्यवस्था के आकार की तुलना में देनदारियों का अनुपात महामारी के बाद कम हुआ है। लेकिन वित्तीय विशेषज्ञों के नजरिए से इसे अंतिम उपलब्धि नहीं माना जा सकता।

राज्य को यह सुनिश्चित करना होगा कि आने वाले वर्षों में विकास की रफ्तार कर्ज और ब्याज के बोझ से आगे रहे। यदि GSDP तेजी से बढ़ता है और कर्ज नियंत्रित रहता है तो Debt-GSDP Ratio को कम रखने में मदद मिलेगी।

आंकड़ों की व्याख्या में सावधानी भी जरूरी

उत्तराखंड के कर्ज से जुड़े आंकड़ों में अलग-अलग वित्तीय दस्तावेजों में कुछ अंतर दिखाई दे सकता है। उदाहरण के लिए कैग के फाइनेंस अकाउंट में 31 मार्च 2025 को व्यापक अर्थ में बकाया देनदारियों का आंकड़ा करीब ₹94,666.04 करोड़ दर्ज है, जबकि Accounts at a Glance में ऋण-जीडीपी अनुपात से जुड़े आंकड़ों के संदर्भ में करीब ₹90,657 करोड़ की देनदारियां बताई गई हैं।

इन आंकड़ों को एक ही श्रेणी का मानना उचित नहीं होगा। अलग-अलग वित्तीय दस्तावेजों में देनदारियों की परिभाषा और गणना का दायरा अलग हो सकता है।

इसलिए उत्तराखंड की वित्तीय स्थिति पर चर्चा करते समय यह देखना जरूरी है कि कौन सा आंकड़ा किस वित्तीय अवधारणा को दर्शाता है। केवल किसी एक कर्ज आंकड़े के आधार पर राज्य को आर्थिक रूप से मजबूत या कमजोर बताना पूरी तस्वीर पेश नहीं करेगा।

पर्यटन और जलविद्युत में छिपी हैं बड़ी संभावनाएं

उत्तराखंड की सबसे बड़ी ताकत उसकी प्राकृतिक और भौगोलिक क्षमता है। चारधाम यात्रा, धार्मिक पर्यटन, साहसिक पर्यटन, वेलनेस, योग, वन्यजीव पर्यटन और पहाड़ी क्षेत्रों की प्राकृतिक सुंदरता राज्य के लिए बड़े आर्थिक अवसर पैदा करती है।

पर्यटन को सिर्फ सरकारी टैक्स आय से जोड़कर देखना सही नहीं होगा। इसका प्रभाव रोजगार, होटल, होमस्टे, परिवहन, स्थानीय उत्पाद, रेस्तरां और छोटे कारोबार तक फैलता है।

यदि पर्यटन को पूरे साल चलने वाली आर्थिक गतिविधि के रूप में विकसित किया जाए, तो स्थानीय स्तर पर आय और रोजगार दोनों बढ़ सकते हैं।

इसी तरह जलविद्युत उत्तराखंड की एक महत्वपूर्ण आर्थिक ताकत है। हालांकि पर्यावरणीय संतुलन, आपदा जोखिम और स्थानीय हितों को ध्यान में रखते हुए इसका विकास करना जरूरी होगा।

आत्मनिर्भरता का रास्ता क्या हो सकता है?

उत्तराखंड को वित्तीय रूप से अधिक आत्मनिर्भर बनाने के लिए सबसे पहले अपने Own Tax Revenue को बढ़ाना होगा। इसके लिए कर संग्रह की क्षमता बढ़ाने, कर चोरी रोकने और आर्थिक गतिविधियों का विस्तार करने की जरूरत होगी।

दूसरा रास्ता गैर-कर राजस्व को मजबूत करना है। पर्यटन, जलविद्युत, सरकारी संपत्तियों, विभिन्न सेवाओं और अन्य संसाधनों से मिलने वाली आय को बेहतर तरीके से प्रबंधित किया जा सकता है।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम प्रतिबद्ध खर्च को नियंत्रित करना होगा। वेतन और पेंशन को अचानक कम करना संभव नहीं है, लेकिन नई भर्ती, संस्थागत पुनर्गठन, डिजिटल प्रशासन और खर्च की प्राथमिकताओं के जरिए भविष्य के राजस्व खर्च को अधिक टिकाऊ बनाया जा सकता है।

चौथा रास्ता पूंजीगत निवेश बढ़ाना है। सड़क, पुल, स्वास्थ्य, शिक्षा, सिंचाई और डिजिटल कनेक्टिविटी जैसी परिसंपत्तियां भविष्य में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ा सकती हैं।

पांचवां महत्वपूर्ण कदम राज्य के छोटे शहरों और पहाड़ी क्षेत्रों में रोजगार आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देना है। यदि युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार और उद्यमिता के अवसर मिलते हैं तो पलायन पर भी असर पड़ सकता है और राज्य की आर्थिक गतिविधियां अधिक व्यापक हो सकती हैं।

असली चुनौती: केंद्र पर निर्भरता घटाना नहीं, अपनी क्षमता बढ़ाना

केंद्र से मिलने वाले संसाधन उत्तराखंड के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसलिए इसे सिर्फ निर्भरता के रूप में देखना उचित नहीं होगा। उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां, सीमावर्ती स्थिति और पहाड़ी क्षेत्र में बुनियादी ढांचा तैयार करने की अधिक लागत ऐसी परिस्थितियां हैं जिनमें केंद्रीय सहायता की भूमिका स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण रहती है।

लेकिन दीर्घकाल में मजबूत राज्य वही होगा जिसकी अपनी आय लगातार बढ़ती रहे।

53 प्रतिशत केंद्रीय निर्भरता का मतलब यह नहीं कि राज्य कमजोर है। इसका मतलब यह है कि राज्य के पास अपने राजस्व आधार को और मजबूत करने की पर्याप्त गुंजाइश है।

यदि राज्य अपनी आय में लगातार वृद्धि करता है, कर्ज को नियंत्रित रखता है, ब्याज भुगतान का बोझ सीमित करता है और पूंजीगत निवेश बढ़ाता है तो केंद्र से मिलने वाले संसाधनों का इस्तेमाल भी अधिक प्रभावी तरीके से किया जा सकेगा।

उत्तराखंड की वित्तीय कहानी का निष्कर्ष

उत्तराखंड की वित्तीय सेहत की तस्वीर न तो पूरी तरह चिंताजनक है और न ही पूरी तरह बेफिक्र होने वाली। कर्ज-जीडीपी अनुपात में गिरावट, राजस्व अधिशेष और पूंजीगत खर्च में बढ़ोतरी राज्य के लिए सकारात्मक संकेत हैं। वहीं केंद्र से 53 प्रतिशत राजस्व निर्भरता, वेतन-पेंशन-ब्याज पर करीब 61 प्रतिशत राजस्व खर्च और 3.7 प्रतिशत का राजकोषीय घाटा आने वाले वर्षों की चुनौती को स्पष्ट करते हैं।

सबसे बड़ी बात यह है कि उत्तराखंड के पास आर्थिक क्षमता की कमी नहीं है। पर्यटन, जलविद्युत, कृषि एवं बागवानी, औषधीय पौधे, स्थानीय उत्पाद, सेवा क्षेत्र और नए निवेश के जरिए राज्य अपनी आर्थिक गतिविधियों का दायरा बढ़ा सकता है।

लेकिन इसके लिए सिर्फ बजट घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी। योजनाओं का समय पर क्रियान्वयन, सरकारी खर्च की गुणवत्ता, राजस्व संग्रह में सुधार, निवेश को प्रोत्साहन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करना जरूरी होगा।

आज उत्तराखंड की वित्तीय चुनौती को केवल “राज्य पर कितना कर्ज है?” इस सवाल से नहीं समझा जा सकता। असली सवाल यह है कि “राज्य अपनी कमाई कितनी तेजी से बढ़ा रहा है, उस कमाई में से कितना पैसा पहले से तय खर्चों में जा रहा है और विकास के लिए कितना संसाधन बच रहा है?”

यदि सरकार अपनी आय का आधार मजबूत करती है, प्रतिबद्ध खर्च को संतुलित रखती है, कर्ज को नियंत्रित करते हुए उत्पादक पूंजीगत निवेश बढ़ाती है और पर्यटन तथा जलविद्युत जैसे क्षेत्रों की व्यापक आर्थिक क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करती है, तो उत्तराखंड आने वाले वर्षों में अधिक मजबूत वित्तीय स्थिति की ओर बढ़ सकता है।

फिलहाल आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि उत्तराखंड ने कर्ज के अनुपात को नियंत्रित करने में प्रगति की है, लेकिन वित्तीय आत्मनिर्भरता की मंजिल अभी दूर है। केंद्र से मिलने वाली राशि पर निर्भरता को संतुलित करते हुए अपनी कमाई बढ़ाना ही राज्य की अगली बड़ी आर्थिक परीक्षा होगी।

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दिल्ली कैपिटल्स के क्रिकेटर अभिषेक पोरेल गिरफ्तार, मेडिकल छात्रा ने लगाए रेप और धमकी के गंभीर आरोप; शादी का वादा करने का भी दावा
लंदन में MBA, क्लासमेट से प्यार और अब मायावती के ‘संकटमोचक’! कौन हैं आकाश आनंद, जिन्हें BSP की नई उम्मीद माना जा रहा है?
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