लखनऊ: उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले राज्यसभा की 10 सीटों का चुनाव सियासी तौर पर बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर 2026 को मतदान की तारीख तय की है। इन सीटों में से नौ सदस्यों का कार्यकाल 25 नवंबर को समाप्त हो रहा है, जबकि एक सीट पूर्व राज्यसभा सदस्य दिनेश शर्मा के इस्तीफे के बाद पहले से खाली है।
मौजूदा विधानसभा संख्या बल के आधार पर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन और समाजवादी पार्टी के बीच मुकाबले का मुख्य केंद्र 10वीं सीट बन सकती है। गणित के मुताबिक भाजपा-एनडीए सात सीटों पर मजबूत स्थिति में है, जबकि सपा के लिए दो सीटों का रास्ता बनता दिखाई दे रहा है। इसके बाद बचने वाली एक सीट के लिए अतिरिक्त और दूसरी वरीयता के वोटों का गणित महत्वपूर्ण हो सकता है।
397 विधायक, एक सीट के लिए करीब 37 वोट
उत्तर प्रदेश विधानसभा में कुल 403 सीटें हैं, लेकिन छह विधायकों के निधन के बाद मौजूदा संख्या 397 है। मौजूदा गणित के अनुसार राज्यसभा की एक सीट के लिए करीब 37 प्रथम वरीयता के वोट जरूरी हैं। यही संख्या इस पूरे चुनावी गणित की सबसे अहम कड़ी है।
यानी 10 सीटों के चुनाव में सभी दलों को अपने उम्मीदवारों के लिए वोटों का बेहद सावधानी से प्रबंधन करना होगा। सात सीटों तक पहुंचने के लिए एनडीए के पास पर्याप्त संख्या बताई जा रही है, जबकि सपा के 101 विधायकों के आधार पर दो सीटों का गणित बनता है। सपा-कांग्रेस के कुल संख्या बल को लेकर भी अलग-अलग रिपोर्टों में करीब 103 का आंकड़ा दिया गया है।
असली कहानी 10वीं सीट पर शुरू होगी
पहली नजर में सात सीटें एनडीए और दो सीटें सपा के खाते में जाती दिखाई देने के बाद सवाल बचता है कि 10वीं सीट पर किसके उम्मीदवार को पर्याप्त वोट मिलेंगे?
यहीं से राज्यसभा चुनाव का वरीयता मतदान महत्वपूर्ण हो जाता है। राज्यसभा चुनाव में विधायक उम्मीदवारों को प्राथमिकता के क्रम में वोट देते हैं। ऐसे में जिन दलों के पास अपने तय उम्मीदवारों को जिताने के बाद अतिरिक्त वोट बचते हैं, उनकी दूसरी वरीयता के वोट अंतिम सीट के समीकरण को प्रभावित कर सकते हैं।
यही वजह है कि 10वीं सीट के लिए केवल मौजूदा संख्या बल ही नहीं, बल्कि उम्मीदवारों की संख्या, नामांकन के बाद समर्थन का गणित और अलग-अलग दलों के विधायकों की प्राथमिकताएं भी महत्वपूर्ण होंगी।
क्या सपा उतारेगी तीसरा उम्मीदवार?
सपा के सामने सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल तीसरे उम्मीदवार को लेकर है। उपलब्ध रिपोर्टों में बताया गया है कि पार्टी की ओर से दो सीटों पर राम गोपाल यादव और आलोक रंजन जैसे नाम चर्चा में हैं, जबकि तीसरी सीट पर उम्मीदवार उतारने की संभावना को लेकर भी मंथन की खबरें सामने आई हैं।
अगर सपा तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतारती है, तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती अतिरिक्त प्रथम वरीयता के वोट जुटाने की होगी। मौजूदा संख्या बल से दो उम्मीदवारों को आवश्यक वोट देने के बाद सपा के पास कुछ अतिरिक्त वोट बचते हैं, लेकिन तीसरे उम्मीदवार को जीत दिलाने के लिए उसे अतिरिक्त समर्थन की आवश्यकता होगी।
यहीं पर दूसरी पार्टियों, सहयोगी दलों या अन्य विधायकों के समर्थन का सवाल अहम हो जाता है।
हालांकि, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि कौन सा विधायक किस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करेगा। नामांकन और अंतिम उम्मीदवारों की तस्वीर साफ होने के बाद ही वास्तविक मुकाबले का स्वरूप स्पष्ट होगा।
भाजपा-एनडीए के पास कितना संख्या बल?
दूसरी तरफ भाजपा के पास विधानसभा में 256 विधायक बताए जा रहे हैं। इसके अलावा अपना दल (एस), आरएलडी, सुभासपा और निषाद पार्टी समेत सहयोगी दलों के विधायक भी एनडीए के संख्या बल में शामिल हैं। कुछ रिपोर्टों में सहयोगियों और संभावित समर्थकों को जोड़कर एनडीए का आंकड़ा करीब 292 से 294 तक बताया गया है। हालांकि सहयोगी दलों के सभी विधायकों के मतदान व्यवहार को लेकर अंतिम स्थिति चुनाव के समय ही स्पष्ट होगी।
इस संख्या बल के आधार पर एनडीए सात सीटों के लिए आवश्यक वोट जुटाने की स्थिति में दिखाई देता है। सात उम्मीदवारों के चुनाव के बाद बचने वाले वोट 10वीं सीट के गणित में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
यही वह बिंदु है जहां सपा और भाजपा दोनों के लिए दूसरी वरीयता के वोट अहम हो जाते हैं।
बसपा के लिए भी बड़ा बदलाव
इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की स्थिति भी चर्चा में है। बसपा के पास फिलहाल उत्तर प्रदेश विधानसभा में कोई विधायक नहीं है और राज्यसभा सदस्य रामजी गौतम का कार्यकाल भी समाप्त होने वाला है। ऐसे में मौजूदा संख्या बल के आधार पर बसपा के राज्यसभा में प्रतिनिधित्व खत्म होने की स्थिति बन रही है।
यानी इस चुनाव के बाद राज्यसभा में उत्तर प्रदेश से बसपा की मौजूदगी नहीं रह सकती है, जब तक चुनावी गणित में कोई अप्रत्याशित बदलाव न हो।
यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछली बार राज्यसभा चुनाव के दौरान बसपा का उम्मीदवार दूसरे दलों के विधायकों के समर्थन से निर्वाचित हुआ था। इस बार विधानसभा में बसपा के पास कोई विधायक नहीं होने से उसके पास वैसा संख्या बल उपलब्ध नहीं है।
तीसरे उम्मीदवार के लिए कितने वोटों की जरूरत?
सपा के सामने तीसरा उम्मीदवार उतारने पर सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि आवश्यक संख्या कहां से आएगी। उपलब्ध संख्या बल के अनुसार सपा के पास 101 विधायक हैं। दो उम्मीदवारों के लिए लगभग 74 वोट चाहिए होंगे, जिसके बाद कुछ वोट बचते हैं। सपा-कांग्रेस के कुल 103 विधायकों का आंकड़ा लिया जाए तो दो सीटों के बाद अतिरिक्त वोटों की संख्या कुछ और बढ़ती है।
लेकिन तीसरी सीट के लिए केवल बचे हुए वोट पर्याप्त नहीं हो सकते। उसे अतिरिक्त समर्थन की जरूरत पड़ सकती है। यही कारण है कि चुनाव की घोषणा के साथ ही संभावित उम्मीदवारों और विधायकों के बीच राजनीतिक संपर्क का दौर महत्वपूर्ण हो सकता है।
हालांकि, क्रॉस-वोटिंग या किसी विधायक के पार्टी लाइन से अलग मतदान करने की संभावना को अभी तथ्य के रूप में नहीं कहा जा सकता। मतदान के दिन तक विधायकों की प्राथमिकताएं बदल सकती हैं और अंतिम परिणाम आधिकारिक मतगणना के बाद ही सामने आएगा।
16 अक्टूबर को होगा मतदान
चुनाव आयोग के कार्यक्रम के अनुसार उत्तर प्रदेश की 10 राज्यसभा सीटों के लिए 16 अक्टूबर 2026 को मतदान होगा और उसी दिन मतगणना भी की जाएगी। नामांकन की प्रक्रिया 29 सितंबर से शुरू होगी, जबकि नामांकन की अंतिम तारीख 6 अक्टूबर है। 7 अक्टूबर को नामांकन पत्रों की जांच और 9 अक्टूबर को नाम वापस लेने की अंतिम तारीख निर्धारित है।
इसका मतलब यह है कि आने वाले दिनों में तस्वीर तेजी से बदल सकती है। अभी जिन नामों की चर्चा है, वे अंतिम उम्मीदवार हों, यह जरूरी नहीं है। वास्तविक मुकाबला नामांकन की अंतिम सूची सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा।
2027 से पहले शक्ति प्रदर्शन का मौका
उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। ऐसे में राज्यसभा चुनाव का महत्व केवल 10 सीटों तक सीमित नहीं है। दोनों प्रमुख दलों के लिए यह चुनाव अपने-अपने विधायक संख्या बल, सहयोगियों के साथ तालमेल और अतिरिक्त वोटों को संभालने की क्षमता दिखाने का अवसर होगा।
खासकर 10वीं सीट पर अगर एक से ज्यादा उम्मीदवार मैदान में आते हैं, तो वरीयता मतदान, अतिरिक्त वोट और सहयोगी दलों की भूमिका चुनाव की दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक बन सकते हैं।
फिलहाल संख्या बल का मोटा गणित सात सीटों के लिए एनडीए और दो सीटों के लिए सपा की स्थिति को दर्शाता है, जबकि 10वीं सीट पर मुकाबले की तस्वीर उम्मीदवारों की अंतिम सूची और मतदान के समय उपलब्ध संख्या बल पर निर्भर करेगी।
यानी यूपी का यह राज्यसभा चुनाव केवल 10 सीटों का चुनाव नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दलों के बीच राजनीतिक रणनीति, सहयोगी प्रबंधन और विधायक संख्या बल की परीक्षा भी बन सकता है। अब नजर 29 सितंबर से शुरू होने वाली नामांकन प्रक्रिया और इस बात पर रहेगी कि भाजपा, सपा और अन्य दल अंतिम तौर पर कितने उम्मीदवार मैदान में उतारते हैं।
