
देश में दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की शुरुआत भले ही उम्मीद से बेहतर रही हो, लेकिन आने वाले महीनों में अल नीनो का बढ़ता प्रभाव चिंता का कारण बनता जा रहा है। मौसम विभाग और अंतरराष्ट्रीय मौसम एजेंसियों की चेतावनियों के बीच केंद्र सरकार ने भी संभावित संकट से निपटने के लिए व्यापक तैयारियां शुरू कर दी हैं। कृषि मंत्रालय ने देशभर के 197 ऐसे जिलों की पहचान की है, जहां अल नीनो का सबसे ज्यादा असर पड़ सकता है और सूखे जैसी स्थिति बनने की आशंका है।
मॉनसून ने 4 जून को केरल में दस्तक दी थी और इसके बाद तेजी से आगे बढ़ते हुए कई राज्यों को कवर कर लिया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जुलाई के अंत और अगस्त-सितंबर के दौरान अल नीनो के सक्रिय होने से बारिश में भारी कमी आ सकती है, जिससे कृषि क्षेत्र पर गंभीर असर पड़ सकता है।
मॉनसून की तेज शुरुआत, लेकिन आगे खतरे के संकेत
इस वर्ष मॉनसून ने अपेक्षाकृत अच्छी शुरुआत की है। केरल पहुंचने के कुछ ही दिनों के भीतर यह तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र के कई हिस्सों तक फैल चुका है। पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में भी अच्छी बारिश दर्ज की जा रही है। वर्तमान में मॉनसून देश के लगभग 30 प्रतिशत हिस्से को कवर कर चुका है और अनुमान है कि 15 जुलाई तक यह पूरे देश में पहुंच जाएगा।
लेकिन मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि शुरुआती बारिश के बावजूद मॉनसून के दूसरे चरण में हालात बदल सकते हैं। अल नीनो के प्रभाव से अगस्त और सितंबर में सामान्य से काफी कम वर्षा होने की संभावना है। यही वजह है कि सरकार और कृषि विशेषज्ञ अभी से सतर्क हो गए हैं।
क्या होता है अल नीनो?
अल नीनो एक समुद्री और वायुमंडलीय घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। इसका असर दुनिया भर के मौसम चक्र पर पड़ता है। भारत में अल नीनो अक्सर कमजोर मॉनसून, कम बारिश और सूखे जैसी परिस्थितियों का कारण बनता है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के अनुसार इस साल दक्षिण-पश्चिम मॉनसून सामान्य के मुकाबले लगभग 90 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह आंकड़ा सामान्य से कम वर्षा की ओर संकेत करता है। यदि अल नीनो अपेक्षा से अधिक मजबूत हुआ तो कई राज्यों में बारिश की कमी गंभीर संकट पैदा कर सकती है।
197 जिलों की पहचान, सरकार अलर्ट मोड पर
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि अल नीनो के संभावित प्रभाव को देखते हुए देशभर में 197 संवेदनशील जिलों की पहचान की गई है। इन जिलों में सूखे और कम वर्षा का खतरा सबसे अधिक माना जा रहा है।
उन्होंने कहा कि कृषि मंत्रालय ने सभी राज्यों के लिए अलग-अलग आपातकालीन योजनाएं तैयार की हैं। संभावित संकट की निगरानी के लिए नियमित समीक्षा बैठकें की जा रही हैं। साथ ही किसानों को समय पर राहत पहुंचाने के लिए बीज, उर्वरक और अन्य कृषि संसाधनों का पर्याप्त भंडारण भी किया गया है।
सरकार ने “खेत बचाओ अभियान” नाम से विशेष अभियान शुरू किया है, जिसके तहत किसानों को मौसम संबंधी जानकारी, वैकल्पिक फसलों और जल संरक्षण उपायों के बारे में जागरूक किया जा रहा है।
खरीफ फसलों पर सबसे बड़ा संकट
भारत की कृषि व्यवस्था काफी हद तक मॉनसून पर निर्भर है। देश के लगभग 60 प्रतिशत किसान खरीफ फसलों की बुवाई के लिए वर्षा का इंतजार करते हैं। धान, मक्का, सोयाबीन, कपास और दालों जैसी फसलें पर्याप्त बारिश पर निर्भर रहती हैं।
यदि अगस्त और सितंबर में वर्षा कम होती है तो इन फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है। इससे किसानों की आय पर असर पड़ने के साथ-साथ खाद्यान्न उत्पादन में भी गिरावट आ सकती है। पिछले कुछ वर्षों में सामान्य और बेहतर मॉनसून के कारण देश ने रिकॉर्ड खाद्यान्न उत्पादन हासिल किया था, लेकिन इस बार हालात चुनौतीपूर्ण दिखाई दे रहे हैं।
किन राज्यों पर सबसे ज्यादा असर?
मौसम विशेषज्ञों के अनुसार उत्तर भारत, पश्चिम भारत और मध्य भारत के कई हिस्सों में अल नीनो का प्रभाव सबसे अधिक महसूस किया जा सकता है।
मध्य प्रदेश के इंदौर, उज्जैन, रीवा, शहडोल, ग्वालियर, चंबल, जबलपुर, सागर और नर्मदापुरम संभागों में सामान्य से काफी कम बारिश की आशंका जताई गई है। इसके अलावा गुजरात, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के कई क्षेत्रों में भी सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अल नीनो अपनी पूरी ताकत के साथ सक्रिय होता है तो इन क्षेत्रों में जल संकट और कृषि नुकसान दोनों बढ़ सकते हैं।
दिल्ली-एनसीआर में भी बढ़ सकती हैं मुश्किलें
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और आसपास के इलाके पहले से ही भीषण गर्मी और लू का सामना कर रहे हैं। ऐसे में मॉनसून की अच्छी बारिश जलाशयों को भरने और भूजल स्तर बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है।
यदि अपेक्षा से कम वर्षा होती है तो पेयजल संकट गहरा सकता है। साथ ही गर्मी का प्रभाव भी लंबे समय तक बना रह सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि दिल्ली-एनसीआर में जल संरक्षण और जल प्रबंधन की दिशा में विशेष प्रयासों की जरूरत होगी।
WMO की चेतावनी से बढ़ी चिंता
संयुक्त राष्ट्र की मौसम एजेंसी विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने भी अल नीनो को लेकर चेतावनी जारी की है। एजेंसी के अनुसार अगस्त तक अल नीनो के सक्रिय होने की संभावना 80 प्रतिशत से अधिक है। वहीं सितंबर तक इसके पूरी तरह मजबूत होने की आशंका जताई गई है।
मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि यदि परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो इस वर्ष “सुपर अल नीनो” जैसी स्थिति भी बन सकती है, जिसका असर भारत समेत दुनिया के कई देशों के मौसम पर पड़ेगा।
चुनौती और तैयारी दोनों साथ-साथ
फिलहाल मॉनसून की रफ्तार उम्मीद जगाने वाली है, लेकिन अल नीनो का बढ़ता खतरा सरकार, किसानों और मौसम वैज्ञानिकों के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है। इसी वजह से केंद्र सरकार ने पहले से तैयारी शुरू कर दी है ताकि संभावित सूखे और फसल नुकसान की स्थिति में किसानों को राहत दी जा सके। आने वाले दो महीने तय करेंगे कि इस साल मॉनसून देश की अर्थव्यवस्था और कृषि क्षेत्र के लिए कितना फायदेमंद साबित होगा और अल नीनो कितना बड़ा असर दिखाता है।



