
बेंगलुरु: खाकी वर्दी के पीछे छिपे मानवीय चेहरे को पहचानते हुए कर्नाटक सरकार और पुलिस विभाग ने एक बेहद संवेदनशील फैसला लिया है। राज्य के हजारों पुलिसकर्मियों के लिए अब उनके जीवन के सबसे खास दिन—जन्मदिन और शादी की सालगिरह—ड्यूटी के तनाव के बीच नहीं, बल्कि परिवार के साथ बीतेंगे। कर्नाटक के डीजी-आईजीपी डॉ. एम.ए. सलीम ने एक आधिकारिक सर्कुलर जारी कर राज्य के सभी पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए इन विशेष अवसरों पर ‘स्पेशल कैज़ुअल लीव’ (विशेष आकस्मिक अवकाश) का प्रावधान अनिवार्य कर दिया है।
तनावपूर्ण जीवन में सुकून की एक पहल
पुलिस की नौकरी अपनी कठिन परिस्थितियों, अनिश्चित कार्य घंटों और मानसिक दबाव के लिए जानी जाती है। त्योहार हों या आपात स्थिति, पुलिसकर्मी अक्सर अपनी व्यक्तिगत खुशियों का त्याग कर समाज की सुरक्षा में डटे रहते हैं। ऐसे में कर्नाटक पुलिस के आला अधिकारियों का यह मानना है कि काम के बोझ तले दबे जवानों को भावनात्मक रूप से ‘रीचार्ज’ होने की सख्त जरूरत है।
इस नए आदेश के तहत, अब राज्य का कोई भी सिपाही या अधिकारी अपने जन्मदिन या वैवाहिक वर्षगांठ पर अवकाश के लिए आवेदन करता है, तो यूनिट हेड को उसे अनिवार्य रूप से मंजूरी देनी होगी। यह कदम न केवल एक प्रशासनिक सुधार है, बल्कि पुलिस बल के प्रति विभाग की संवेदनशीलता का एक बड़ा प्रमाण भी है।
सर्कुलर का मुख्य उद्देश्य: “खुश पुलिस, बेहतर सेवा”
सर्कुलर में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि पुलिसकर्मियों का मानसिक स्वास्थ्य उनकी कार्यक्षमता से सीधे जुड़ा हुआ है। विभाग का मानना है कि:
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मनोबल में वृद्धि: जब एक जवान अपने परिवार के साथ महत्वपूर्ण पल साझा करता है, तो उसका संगठन के प्रति जुड़ाव और मोराल बढ़ता है।
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तनाव प्रबंधन: लगातार ड्यूटी से होने वाले ‘बर्नआउट’ को कम करने में यह छोटी छुट्टियाँ रामबाण का काम करती हैं।
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अनुशासन और प्रदर्शन: मानसिक रूप से संतुष्ट कर्मचारी अधिक अनुशासित होता है और जनता के साथ उसका व्यवहार भी अधिक सौम्य और प्रभावी हो जाता है।
डीजी-आईजीपी डॉ. एम.ए. सलीम का दूरगामी दृष्टिकोण
यह पहल डॉ. एम.ए. सलीम की कार्यशैली का हिस्सा मानी जा रही है, जो पुलिस बल के आधुनिकीकरण के साथ-साथ उनके कल्याण (Welfare) को भी प्राथमिकता देते रहे हैं। आदेश में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि पूरे राज्य में इस नीति का एक समान पालन सुनिश्चित किया जाए। किसी भी यूनिट हेड द्वारा इन खास दिनों पर छुट्टी देने में आनाकानी नहीं की जानी चाहिए, बशर्ते कोई अत्यधिक गंभीर कानून-व्यवस्था की स्थिति न खड़ी हो।
“यह सिर्फ एक दिन की छुट्टी नहीं है, बल्कि उन जवानों की मेहनत और उनके परिवारों के बलिदान का सम्मान है जो दिन-रात देश की सेवा में लगे रहते हैं।” – विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का बयान
राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा और मॉडल की संभावना
विशेषज्ञों का मानना है कि कर्नाटक पुलिस का यह मॉडल देश के अन्य राज्यों के लिए भी एक नजीर पेश कर सकता है। अक्सर पुलिस सुधारों (Police Reforms) की बात करते समय हम केवल हथियारों और तकनीक पर ध्यान देते हैं, लेकिन ‘ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट’ के इस पहलू को नजरअंदाज कर दिया जाता है।
अतीत के संदर्भ: हाल के वर्षों में कई राज्यों ने पुलिसकर्मियों के लिए साप्ताहिक अवकाश (Weekly Off) सुनिश्चित करने की कोशिश की है, लेकिन स्टाफ की कमी के चलते यह पूरी तरह सफल नहीं हो पाया। कर्नाटक का यह ‘स्पेशल लीव’ मॉडल क्रियान्वयन में आसान है क्योंकि यह साल में केवल दो विशेष दिनों से जुड़ा है।
वर्क-लाइफ बैलेंस: क्यों है अनिवार्य?
एक पुलिसकर्मी के जीवन में निजी और पेशेवर जीवन के बीच संतुलन (Work-Life Balance) अक्सर बिगड़ा रहता है। शोध बताते हैं कि पारिवारिक आयोजनों में शामिल न हो पाने के कारण पुलिसकर्मियों में चिड़चिड़ापन और अवसाद जैसी समस्याएं घर कर जाती हैं। कर्नाटक पुलिस का यह निर्णय इस खाई को पाटने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
कर्नाटक पुलिस द्वारा उठाया गया यह मानवीय कदम स्वागत योग्य है। यह न केवल जवानों के चेहरों पर मुस्कान लाएगा, बल्कि भविष्य में एक अधिक संवेदनशील और ऊर्जावान पुलिस बल का निर्माण भी करेगा। जब रक्षक स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करेगा, तभी वह समाज की बेहतर रक्षा कर पाएगा।



