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मतदाता सूची विवाद पर आज होगी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई  ‘जनता की वकील’ बनकर सुप्रीम कोर्ट पहुचेंगी ममता बनर्जी

The Hill India News
Last updated: February 4, 2026 3:20 am
The Hill India News
Published: February 4, 2026
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नई दिल्ली/कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में ‘मतदाता सूची’ को लेकर शुरू हुआ विवाद अब देश की सबसे बड़ी अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में जारी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रह सकती हैं। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इस कानूनी लड़ाई को ‘आर-पार’ का संघर्ष करार देते हुए ममता बनर्जी को ‘पीपुल्स एडवोकेट’ (जनता का वकील) के रूप में पेश किया है।

Contents
सुप्रीम कोर्ट की अहम सुनवाई: खुद दलीलें पेश कर सकती हैं ममतानिर्वाचन आयोग पर ‘अहंकार’ का आरोप और महाभियोग की मांगSIR प्रक्रिया पर सवाल: ‘चुनिंदा तरीके से हटाए जा रहे नाम’‘महा आपातकाल’ और लोकतंत्र पर खतराक्या है SIR का पूरा विवाद?कुर्सी नहीं, लोग स्थायी होते हैं

सुप्रीम कोर्ट की अहम सुनवाई: खुद दलीलें पेश कर सकती हैं ममता

प्राप्त जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम-पंचोली की विशेष पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी। यह सुनवाई मोस्तरी बानू, टीएमसी सांसद डेरेक ओ ब्रायन और डोला सेन द्वारा दायर तीन अलग-अलग याचिकाओं पर आधारित है।

राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि एलएलबी डिग्री धारक मुख्यमंत्री ममता बनर्जी स्वयं कोर्ट रूम में मौजूद रहकर दलीलें पेश कर सकती हैं। टीएमसी के आधिकारिक ‘X’ हैंडल पर साझा की गई तस्वीरों में ममता बनर्जी फाइलों के साथ सुप्रीम कोर्ट की ओर बढ़ती दिखाई दे रही हैं, जो इस मामले की गंभीरता को दर्शाता है।

निर्वाचन आयोग पर ‘अहंकार’ का आरोप और महाभियोग की मांग

सुप्रीम कोर्ट पहुंचने से पहले ममता बनर्जी ने दिल्ली में तीखे तेवर अपनाते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर ‘महाभियोग’ (Impeachment) चलाने का आह्वान करते हुए अन्य विपक्षी दलों से समर्थन मांगा है।

ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि एक दिन पहले जब वह अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ चुनाव आयोग से मिलने पहुंची थीं, तो उनके साथ अपमानजनक व्यवहार किया गया। बनर्जी ने कहा, “हमने उनसे विनम्रता की उम्मीद की थी, हम उनके लिए फूल और मिठाई भी लेकर गए थे, लेकिन उन्होंने अहंकार दिखाया और हमें धमकाया। निर्वाचन आयोग भाजपा के कार्यकर्ता की तरह काम कर रहा है।”

SIR प्रक्रिया पर सवाल: ‘चुनिंदा तरीके से हटाए जा रहे नाम’

मुख्यमंत्री का सबसे गंभीर आरोप मतदाता सूची से नाम हटाए जाने को लेकर है। उन्होंने दावा किया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के नाम पर पश्चिम बंगाल में उन लोगों को निशाना बनाया जा रहा है जो तृणमूल कांग्रेस के समर्थक हैं।

ममता बनर्जी के मुख्य आरोप:

  • एकतरफा कार्रवाई: अकेले उनके निर्वाचन क्षेत्र से 40,000 मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं।

  • हाशिए के समूहों पर प्रहार: हटाए गए नामों में ज्यादातर दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक (मुस्लिम) समुदायों के लोग हैं।

  • सांख्यिकीय तर्क: ममता ने कहा, “मेरे राज्य में 23% अनुसूचित जाति, 6% आदिवासी और 33% मुस्लिम हैं। क्या मैं उनसे यह कहूं कि आप राज्य छोड़कर चले जाएं?”

‘महा आपातकाल’ और लोकतंत्र पर खतरा

ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार और केंद्रीय एजेंसियों पर भी तीखा हमला बोला। उन्होंने मौजूदा स्थिति की तुलना ‘महा आपातकाल’ (Super Emergency) से करते हुए कहा कि बंगाल में उद्योगपतियों से लेकर आम जनता तक को परेशान किया जा रहा है। उन्होंने भाजपा को चुनौती देते हुए कहा कि बंगाल में भाजपा कभी सत्ता में नहीं आएगी क्योंकि लोग उनसे नफरत करते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि भाजपा के पुराने मतदाता भी इस बार तृणमूल को ही वोट देंगे।

क्या है SIR का पूरा विवाद?

निर्वाचन आयोग द्वारा पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) प्रक्रिया चलाई जा रही है। विपक्ष (TMC) का तर्क है कि यह प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है और इसका उपयोग वैध मतदाताओं को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर करने के लिए किया जा रहा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 19 जनवरी को अपने निर्देश में स्पष्ट किया था कि यह प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और किसी भी नागरिक को असुविधा नहीं होनी चाहिए।

कुर्सी नहीं, लोग स्थायी होते हैं

ममता बनर्जी ने अपने संबोधन के अंत में एक बड़ा संदेश देते हुए कहा कि लोकतंत्र में कुर्सियां स्थायी नहीं होतीं, बल्कि जनता स्थायी होती है। बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली यह सुनवाई न केवल बंगाल की मतदाता सूची का भविष्य तय करेगी, बल्कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठ रहे सवालों पर भी अदालत का रुख स्पष्ट करेगी।

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