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उत्तराखंडफीचर्ड

रुद्रप्रयाग में गुलदार का खौफ: 5 साल के मासूम को निवाला बना ले गया आदमखोर, आक्रोश में ग्रामीण, सवालों के घेरे में सिस्टम

The Hill India News
Last updated: February 4, 2026 2:30 am
The Hill India News
Published: February 4, 2026
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प्रतीकात्मक फोटो
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रुद्रप्रयाग (उत्तराखंड): देवभूमि उत्तराखंड के शांत पहाड़ों में एक बार फिर खून की होली खेली गई है। रुद्रप्रयाग जिले से दिल दहला देने वाली एक घटना सामने आई है, जहां एक आदमखोर गुलदार ने 5 साल के मासूम बच्चे को अपना निवाला बना लिया। इस घटना ने न केवल एक परिवार की खुशियां उजाड़ दी हैं, बल्कि पूरे राज्य में ‘मानव-वन्यजीव संघर्ष’ की भयावहता को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया है।

Contents
सिन्द्रवाणी गांव में कोहराम: मासूम की तलाश में रात भर जागता रहा गांववन विभाग की सुस्ती और सिस्टम पर गंभीर सवालडर के साए में बचपन: घरों में कैद होने को मजबूर ग्रामीणजिलाधिकारी की निगरानी में 6 टीमें मैदान मेंक्या केवल मुआवजे से भरेंगे जख्म?आखिर कब थमेगा यह खूनी खेल?

सिन्द्रवाणी गांव में कोहराम: मासूम की तलाश में रात भर जागता रहा गांव

रुद्रप्रयाग की ग्राम पंचायत सारी के सिन्द्रवाणी गांव में मंगलवार की शाम किसी काल की तरह आई। जानकारी के मुताबिक, 5 साल का मासूम बच्चा जब अपने घर के पास खेल रहा था, तभी घात लगाकर बैठे गुलदार ने बिजली की गति से हमला किया और बच्चे को गर्दन से दबोचकर घने जंगलों की ओर ओझल हो गया।

परिजनों के चीखने-चिल्लाने पर जब तक ग्रामीण इकट्ठा हुए, तब तक गुलदार मासूम को लेकर काफी दूर जा चुका था। पूरी रात गांव के लोग हाथों में लाठी-डंडे और मशालें लेकर जंगलों की खाक छानते रहे, लेकिन सुबह तक बच्चे का कोई सुराग नहीं लग सका। मासूम की मां का रो-रोकर बुरा हाल है और पिता बदहवास हालत में जंगल की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं।

वन विभाग की सुस्ती और सिस्टम पर गंभीर सवाल

घटना के बाद ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। स्थानीय निवासियों का सीधा आरोप है कि रुद्रप्रयाग में गुलदार का आतंक कोई नई बात नहीं है, लेकिन वन विभाग हमेशा की तरह ‘पोस्ट-मॉर्टम’ वाली कार्यशैली पर चल रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि जब घटना घटी, तब तत्काल कोई प्रभावी सर्च ऑपरेशन शुरू नहीं किया गया।

आरोप है कि विभाग के पास न तो आधुनिक ड्रोन कैमरे समय पर उपलब्ध हुए और न ही पिंजरे लगाने में तत्परता दिखाई गई। ग्रामीणों ने सवाल उठाया कि जब संवेदनशील इलाकों में लगातार हमले हो रहे हैं, तो शासन-प्रशासन स्थायी समाधान क्यों नहीं ढूंढ पा रहा है? क्या पहाड़ के मासूमों की जान इतनी सस्ती हो गई है?

डर के साए में बचपन: घरों में कैद होने को मजबूर ग्रामीण

सिन्द्रवाणी और आसपास के दर्जनों गांवों में अब दहशत का सन्नाटा पसरा हुआ है। शाम ढलते ही लोग अपने घरों के दरवाजे और खिड़कियां बंद कर दे रहे हैं। उत्तराखंड वन्यजीव हमलों की बढ़ती घटनाओं ने बच्चों की शिक्षा और रोजमर्रा की जिंदगी पर ब्रेक लगा दिया है। स्कूल जाने वाले छात्र डरे हुए हैं और खेतों में काम करने वाली महिलाएं बाहर निकलने से कतरा रही हैं। ग्रामीणों का कहना है कि वे अपने ही घरों में कैदी की तरह रहने को मजबूर हैं।

जिलाधिकारी की निगरानी में 6 टीमें मैदान में

बढ़ते दबाव और घटना की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन अब हरकत में आया है। जिलाधिकारी प्रतीक जैन खुद इस पूरे रेस्क्यू ऑपरेशन की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। उन्होंने घटना स्थल पर भारी फोर्स और वन विभाग की विशेष टीमों को तैनात करने के निर्देश दिए हैं।

रेस्क्यू ऑपरेशन की वर्तमान स्थिति:

  • कुल टीमें: 06 अलग-अलग टीमें गठित की गई हैं।

  • मैनपावर: वन विभाग के 20 कुशल कर्मी।

  • सुरक्षा बल: डीडीआरएफ (DDRF) के 9 जवान और जिला प्रशासन के 5 वरिष्ठ अधिकारी।

  • रणनीति: जंगल के उन संभावित इलाकों को चिह्नित किया गया है जहां गुलदार के छिपने की संभावना है।

प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) रजत सुमन ने मीडिया को बताया कि “विभाग पूरी संवेदनशीलता के साथ बच्चे की तलाश कर रहा है। रेस्क्यू टीमें गांव में तैनात हैं और जल्द ही गुलदार को पकड़ने के लिए पिंजरे भी लगाए जा रहे हैं।”

क्या केवल मुआवजे से भरेंगे जख्म?

रुद्रप्रयाग और पौड़ी जैसे जिलों में पिछले कुछ महीनों में दर्जनों हमले हुए हैं। प्रशासन हर बार मुआवजे का मरहम लगाकर शांत हो जाता है, लेकिन ग्रामीण अब स्थायी सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि उन्हें केवल पैसा नहीं, बल्कि अपने बच्चों के लिए सुरक्षित माहौल चाहिए। यदि इस बार आदमखोर गुलदार को ढेर नहीं किया गया या पकड़ा नहीं गया, तो पूरा क्षेत्र उग्र आंदोलन के लिए सड़क पर उतरेगा।

आखिर कब थमेगा यह खूनी खेल?

पहाड़ों में मानव-वन्यजीव संघर्ष अब एक सामाजिक संकट बन चुका है। आबादी क्षेत्र में गुलदार का बेखौफ घूमना वन्यजीव प्रबंधन की विफलताओं को उजागर करता है। सिन्द्रवाणी की इस घटना ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि उत्तराखंड के दूरस्थ गांवों में रहने वाले लोग आज भी बुनियादी सुरक्षा के लिए तरस रहे हैं। अब देखना यह होगा कि 6 टीमों का यह भारी-भरकम लाव-लश्कर मासूम को ढूंढ पाता है या नहीं, या फिर सिस्टम एक और नई फाइल बनाकर अगले हादसे का इंतजार करेगा।

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