हल्द्वानी/नैनीताल, 27 जून 2026: उत्तराखंड के नैनीताल जनपद से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर सामने आ रही है, जो सीधे तौर पर हजारों अभिभावकों की जेब और उनके बच्चों के भविष्य से जुड़ी है। जिले के प्राइवेट स्कूलों द्वारा विभिन्न मदों के नाम पर की जा रही अवैध और अत्यधिक वसूली पर जिला प्रशासन ने अब तक का सबसे कड़ा रुख अपनाया है। जिलाधिकारी (डीएम) ललित मोहन रयाल के कड़े तेवरों के बाद शिक्षा विभाग पूरी तरह एक्शन मोड में आ गया है। जिलाधिकारी के अनुमोदन के उपरांत मुख्य शिक्षा अधिकारी गोविन्द राम जायसवाल ने जनपद के सभी निजी शिक्षण संस्थानों के लिए एक विस्तृत और बेहद सख्त गाइडलाइन जारी कर दी है। इस नए आदेश के लागू होने के बाद अब स्कूलों द्वारा की जाने वाली अनर्गल वसूली पर पूरी तरह रोक लग जाएगी।
विगत लंबे समय से जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग को अभिभावकों की ओर से शिकायतें मिल रही थीं कि नया शैक्षणिक सत्र शुरू होते ही कई नामी और स्थानीय स्कूल अलग-अलग मदों के नाम पर फीस बढ़ा देते हैं। इन शिकायतों का संज्ञान लेते हुए जिलाधिकारी ललित मोहन रयाल ने स्पष्ट किया है कि शिक्षा के पवित्र मंदिर को व्यापार का जरिया नहीं बनने दिया जाएगा और निजी स्कूलों की मनमानी फीस वसूली के चलते किसी भी अभिभावक का मानसिक और आर्थिक शोषण बर्दाश्त नहीं होगा। प्रशासन के इस अप्रत्याशित और कड़े कदम से जहां मनमानी करने वाले स्कूल प्रबंधकों में हड़कंप मच गया है, वहीं मध्यमवर्गीय अभिभावकों ने राहत की बड़ी सांस ली है।
अलग-अलग मदों के नाम पर वसूली बंद, केवल विकास शुल्क को मंजूरी
मुख्य शिक्षा अधिकारी द्वारा जारी आधिकारिक आदेश के अनुसार, अब कोई भी निजी स्कूल शिक्षण शुल्क (ट्यूशन फीस) और परीक्षा शुल्क (एग्जाम फीस) के अलावा किसी भी अन्य काल्पनिक या अलग-अलग नामों से अतिरिक्त धनराशि नहीं वसूल सकेगा। अक्सर देखा जाता था कि स्कूल प्रबंधन एनुअल चार्ज, मिसलेनियस चार्ज, एक्टिविटी फीस और डिजिटल लर्निंग फीस जैसे दर्जनों नाम रखकर अभिभावकों पर आर्थिक बोझ डाल देते थे, जिस पर अब पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है।
प्रवेश शुल्क (एडमिशन फीस) को लेकर भी स्थिति साफ की गई है। नए नियमों के मुताबिक, एडमिशन फीस केवल वास्तविक खर्च के आधार पर ही ली जा सकती है, उसमें मुनाफाखोरी की कोई गुंजाइश नहीं होगी। इसके अतिरिक्त, अन्य सभी छोटे-मोटे शुल्कों को मिलाकर केवल एक ‘विकास शुल्क’ (डेवलपमेंट फीस) के रूप में रखने की अनुमति दी गई है। यह विकास शुल्क भी न्यूनतम होना चाहिए और इसे लागू करने से पहले विद्यालय की अभिभावक-शिक्षक संघ यानी पीटीए (Parent-Teacher Association) की लिखित स्वीकृति लेना अनिवार्य कर दिया गया है। बिना पीटीए की मर्जी के स्कूल अपनी मर्जी से ₹1 भी नहीं बढ़ा सकेंगे।
शुल्क वृद्धि की सीमा तय: 3 साल में अधिकतम 10 प्रतिशत की छूट
सरकारी शर्तों और नियमों का हवाला देते हुए शिक्षा विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि कोई भी निजी विद्यालय हर साल अपनी मर्जी से फीस नहीं बढ़ा सकता। नए नियमों के अंतर्गत, निजी विद्यालय तीन वर्षों के अंतराल में अधिकतम दस प्रतिशत (10%) तक ही शुल्क वृद्धि करने के पात्र होंगे। इस सीमित वृद्धि के लिए भी उन्हें पीटीए की सामान्य सभा में प्रस्ताव पास कराना होगा। यदि अभिभावक इस वृद्धि से असहमत होते हैं, तो स्कूल प्रबंधन को अपनी लागत का पूरा ब्यौरा प्रशासन के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।
इसके साथ ही, पूरे शैक्षणिक सत्र के दौरान परीक्षाओं के आयोजन को लेकर भी एकरूपता तय कर दी गई है। अब पूरे साल में केवल चार मासिक (मंथली), एक अर्द्धवार्षिक (हाफ-इयरली) और एक वार्षिक (एनुअल) परीक्षा ही आयोजित की जा सकेगी। परीक्षाओं के नाम पर होने वाले खर्च को नियंत्रित करने के लिए परीक्षा शुल्क की अधिकतम सीमा ₹600 (छह सौ रुपये) निर्धारित की गई है। इससे अधिक परीक्षा शुल्क लेना कानूनी रूप से अपराध माना जाएगा। वहीं, स्कूल छोड़ने वाले छात्रों के लिए ट्रांसफर सर्टिफिकेट यानी टीसी (TC) का शुल्क मात्र ₹1 (एक रुपया) तय किया गया है, जो अब तक कई स्कूलों में सैकड़ों रुपयों में वसूला जाता था।
“शिक्षा जैसी बुनियादी आवश्यकता के नाम पर अभिभावकों का आर्थिक उत्पीड़न किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं है। आदेशों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों को भारी आर्थिक दंड भुगतना होगा और ज़रूरत पड़ने पर उनकी एनओसी (NOC) निरस्त कर ताला लगा दिया जाएगा।” — ललित मोहन रयाल, जिलाधिकारी, नैनीताल
एकमुश्त फीस के लिए बाध्य करने पर रोक, 1 जुलाई से होगा अतिरिक्त राशि का समायोजन
इस सरकारी आदेश का सबसे महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पहलू यह है कि प्रशासन ने केवल भविष्य के लिए नियम नहीं बनाए हैं, बल्कि वर्तमान सत्र में हो चुकी अवैध वसूली पर भी कैंची चलाई है। आदेश में साफ कहा गया है कि वर्तमान सत्र 2026-27 में जिन विद्यालयों ने विभिन्न मदों के अंतर्गत अभिभावकों से अतिरिक्त राशि वसूल कर ली है, उन्हें वह पैसा हर हाल में वापस या समायोजित (एडजस्ट) करना होगा। इस अतिरिक्त राशि का समायोजन 1 जुलाई 2026 से शुरू होने वाले आगामी महीनों के शुल्क में अनिवार्य रूप से शुरू कर दिया जाएगा। यदि किसी स्कूल ने बहुत ज्यादा अतिरिक्त रकम ले ली है, तो उसका समायोजन आने वाले अगले दो-तीन महीनों की फीस में क्रमिक रूप से किया जाएगा।
इसके अलावा, मध्यमवर्गीय परिवारों की व्यावहारिक दिक्कतों को समझते हुए जिला प्रशासन ने फीस जमा करने की व्यवस्था को बेहद लचीला बनाने का निर्देश दिया है। अब कोई भी स्कूल अभिभावकों पर छमाही या सालाना फीस एक साथ जमा करने का दबाव नहीं बना सकता। स्कूलों को अभिभावकों के सामने मासिक (मंथली), त्रैमासिक (क्वार्टरली), छमाही (हाफ-इयरली) और वार्षिक भुगतान के सभी विकल्प खुले रखने होंगे। अभिभावक अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार किसी भी एक विकल्प को चुनने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होंगे।
उल्लंघन करने पर 5 लाख का जुर्माना और मान्यता रद्द करने की कार्रवाई
नैनीताल जिला प्रशासन ने इस बार केवल कागजी आदेश जारी नहीं किए हैं, बल्कि उल्लंघनकर्ताओं से निपटने के लिए बेहद कड़े दंडात्मक प्रावधानों का भी खाका तैयार किया है। मुख्य शिक्षा अधिकारी गोविन्द राम जायसवाल के अनुसार, यदि कोई भी विद्यालय इन दिशा-निर्देशों की अवहेलना करता पाया जाता है या निजी स्कूलों की मनमानी फीस से जुड़े नियमों को हल्के में लेता है, तो उसके खिलाफ निम्नलिखित वैधानिक कार्रवाई की जाएगी:
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आरटीआई एक्ट के तहत कार्रवाई: नियमों के प्रथम उल्लंघन पर शिक्षा का अधिकार (RTI) अधिनियम के अंतर्गत ₹1,00,000 (एक लाख रुपये) का तत्काल आर्थिक दंड लगाया जाएगा।
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सीबीएसई बायलॉज के तहत जुर्माना: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के नियमों का उल्लंघन करने वाले मान्यता प्राप्त स्कूलों पर ₹5,00,000 (पांच लाख रुपये) तक का भारी जुर्माना ठोंका जाएगा।
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मान्यता और एनओसी की जब्ती: लगातार नियमों की अनदेखी करने वाले स्कूलों की मान्यता प्रत्याहरण (Withdrawal of Recognition) और राज्य सरकार द्वारा दी जाने वाली अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया जाएगा।
जिला प्रशासन की इस अभूतपूर्व कार्रवाई ने साफ कर दिया है कि उत्तराखंड में शिक्षा व्यवस्था को पारदर्शी और जन-हितैषी बनाने के लिए सरकार और अधिकारी पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। हल्द्वानी और काठगोदाम सहित पूरे नैनीताल जनपद के अभिभावक संघों ने इस फैसले का स्वागत किया है और इसे आम जनता की एक बड़ी जीत बताया है। अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इन आदेशों को धरातल पर कितनी कड़ाई से अनुपालन करवा पाता है और मनमानी करने वाले स्कूलों पर कब पहली गाज गिरती है।
