JSSC पेपर लीक मामले में अभय तिवारी का नाम जांच के केंद्र में, छात्रों के पोस्टर में भाई, भाभी, साला, साली और कई अन्य रिश्तेदारों के BSO बनने का दावा; जांच एजेंसी खंगाल रही भर्ती प्रक्रिया से जुड़े हर पहलू
रांची/झारखंड: झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं की कथित अनियमितताओं को लेकर चल रही जांच अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है, जहां सिर्फ पेपर लीक या परीक्षा प्रक्रिया में गड़बड़ी के आरोप ही नहीं, बल्कि चयनित अभ्यर्थियों के आपसी रिश्तों को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। JSSC CGL और JPSC से जुड़े कथित परीक्षा घोटाले की जांच के बीच अभय तिवारी का नाम जांच एजेंसी के रडार पर है। इसी बीच छात्रों और अभ्यर्थियों की ओर से सामने लाए गए एक पोस्टर ने पूरे मामले को और चर्चा में ला दिया है। पोस्टर में दावा किया गया है कि अभय तिवारी के परिवार और रिश्तेदारी से जुड़े कई लोगों का चयन JSSC CGL में BSO यानी प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी के पद पर हुआ।
हालांकि, यहां यह स्पष्ट करना बेहद जरूरी है कि किसी व्यक्ति का किसी प्रतियोगी परीक्षा में चयन होना या किसी आरोपी से पारिवारिक रिश्ता होना अपने आप में किसी अपराध का प्रमाण नहीं है। पोस्टर में किए गए दावों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित लोगों की भूमिका का अंतिम निर्धारण जांच एजेंसी तथा अदालत की प्रक्रिया के जरिए ही हो सकता है। लेकिन एक ही भर्ती और एक ही पद से जुड़े इतने रिश्तों के दावे ने पारदर्शिता और चयन प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
अभय तिवारी के इर्द-गिर्द रिश्तेदारों की लंबी सूची, छात्रों ने पोस्टर के जरिए उठाए सवाल
छात्रों के बीच प्रसारित पोस्टर में अभय तिवारी को केंद्र में रखते हुए उसके परिवार और रिश्तेदारों की एक लंबी सूची दिखाई गई है। इसमें दावा किया गया है कि अभय तिवारी खुद JSSC CGL में BSO पद पर चयनित हुआ और उसकी रैंक-1 बताई गई है। इसके अलावा उसके भाई, भाभी, साला और साली समेत कई अन्य रिश्तेदारों के भी इसी पद पर चयनित होने का दावा पोस्टर में किया गया है।
पोस्टर में रिश्तों की जो कड़ी दिखाई गई है, उसमें केवल करीबी पारिवारिक सदस्य ही नहीं बल्कि ममेरे भाई, चाचा के साढ़ू का बेटा, मौसा के भाई का बेटा, साले का मौसेरा भाई और बहनोई के भतीजे जैसे रिश्ते भी शामिल बताए गए हैं।
यही वजह है कि अभ्यर्थियों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या इतने सारे रिश्तेदारों का एक ही परीक्षा में एक ही पद के लिए सफल होना महज संयोग था या इसके पीछे किसी तरह की अनियमितता की संभावना की भी जांच होनी चाहिए।
फिलहाल इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा।
BSO पद पर चयन को लेकर पोस्टर में क्या-क्या दावे?
छात्रों की ओर से लगाए गए पोस्टर में अभय तिवारी से जुड़े कई लोगों के नाम और उनकी कथित रैंक का उल्लेख किया गया है। पोस्टर के अनुसार:
- अभय तिवारी — BSO, रैंक-1 होने का दावा
- उपेन्द्र मिश्रा — अभय का ममेरा भाई, BSO में रैंक-51
- तेजनारायण पंडित — चाचा के साढ़ू का बेटा, BSO में रैंक-68
- बापी कुमार मिश्रा — मौसा के भाई का बेटा, BSO में रैंक-124
- विक्रम पांडेय — साले का मौसेरा भाई, BSO में रैंक-127
- सुमित कुमार तिवारी — बहनोई के भतीजे, BSO में रैंक-143
इसके अलावा पोस्टर में अभय तिवारी के भाई, भाभी, साला और साली के भी BSO पद पर चयन का दावा किया गया है।
इन दावों के सामने आने के बाद अभ्यर्थियों की मांग है कि चयन प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड, परीक्षा केंद्रों की गतिविधियां, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, अभ्यर्थियों के डिजिटल रिकॉर्ड और चयन प्रक्रिया के प्रत्येक चरण की निष्पक्ष जांच की जाए।
सिर्फ रिश्तेदारी नहीं, अभय तिवारी की परीक्षा यात्रा भी जांच का हिस्सा
अभय तिवारी को लेकर जांच इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि मामला केवल उसके JSSC CGL में चयन तक सीमित नहीं बताया जा रहा। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, अभय तिवारी गोड्डा जिले के पोड़ैयाहाट में प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी के पद पर तैनात था।
इससे पहले उसके एक परीक्षा आयोजन से जुड़ी कंपनी TDPL से जुड़े होने की बात सामने आई है। बताया गया है कि वह कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर के तौर पर काम कर चुका था। इसी कंपनी का संबंध 14वीं JPSC सिविल सेवा परीक्षा के आयोजन से जोड़ा जा रहा है।
यही कड़ी जांच एजेंसी के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सवाल यह है कि परीक्षा आयोजन से जुड़ी कंपनी में काम करने वाले किसी व्यक्ति को परीक्षा प्रक्रिया के दौरान किस स्तर तक जानकारी या पहुंच हासिल थी और क्या उस पहुंच का कभी गलत इस्तेमाल किया गया?
हालांकि, इन सवालों का जवाब अभी जांच के दायरे में है और किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
13 साल में करीब 12 परीक्षाएं पास करने का दावा भी चर्चा में
मीडिया रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि अभय तिवारी ने पिछले करीब 13 वर्षों में लगभग 12 अलग-अलग सरकारी नौकरी से संबंधित परीक्षाओं में सफलता हासिल की। इनमें JSSC CGL के अलावा JPSC की विभिन्न परीक्षाओं, दारोगा, नेवी, BARC और शिक्षक भर्ती जैसी परीक्षाओं का उल्लेख किया गया है।
किसी अभ्यर्थी का लगातार कई प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल होना अपने आप में कोई अपराध नहीं है। कई प्रतिभाशाली अभ्यर्थी अलग-अलग परीक्षाओं में सफलता हासिल करते हैं। लेकिन जब उसी व्यक्ति का नाम किसी परीक्षा आयोजन से जुड़ी कंपनी के साथ सामने आता है और बाद में परीक्षा प्रक्रिया में कथित गड़बड़ी की जांच शुरू होती है, तो जांच एजेंसी के लिए उसकी पूरी परीक्षा और रोजगार से जुड़ी पृष्ठभूमि महत्वपूर्ण हो सकती है।
इसी कारण अभय तिवारी की परीक्षा यात्रा भी जांच के दायरे में होने की बात कही जा रही है।
भाई अक्षय तिवारी और भाभी सुषमा कुमारी का भी नाम
जांच से जुड़े दावों में अभय तिवारी के भाई अक्षय तिवारी का नाम भी सामने आया है। बताया गया है कि अक्षय का चयन JSSC CGL के जरिए हुआ और वह झारखंड सरकार के महिला एवं बाल विकास विभाग में कार्यरत हैं। उनके 14वीं JPSC प्रारंभिक परीक्षा पास करने का भी दावा किया गया है।
इसी तरह अभय की भाभी सुषमा कुमारी के बारे में भी बताया गया है कि उनका चयन JSSC CGL के जरिए हुआ और वह विजिलेंस विभाग में कार्यरत हैं।
इन सभी मामलों में यह ध्यान रखना जरूरी है कि सरकारी नौकरी में चयन की प्रक्रिया और किसी आपराधिक साजिश में कथित भूमिका दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए केवल रिश्तेदारी या चयन के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। जांच एजेंसी को यह देखना होगा कि चयन निष्पक्ष प्रक्रिया से हुआ था या उसमें किसी तरह का हस्तक्षेप किया गया था।
CID के सामने सबसे बड़ा सवाल—क्या परीक्षा प्रक्रिया तक थी अंदरूनी पहुंच?
अब जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है कि यदि परीक्षा में वास्तव में कोई संगठित अनियमितता हुई, तो उसका तंत्र क्या था?
जांच एजेंसी के सामने कई संभावित सवाल हो सकते हैं—
क्या अभय तिवारी को परीक्षा से जुड़ी गोपनीय जानकारी तक पहुंच थी?
क्या परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र या उसके हिस्से किसी के पास पहुंचे?
क्या किसी अभ्यर्थी को अनुचित लाभ पहुंचाया गया?
क्या किसी चयनित अभ्यर्थी और परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े व्यक्ति के बीच असामान्य संपर्क था?
क्या किसी तरह का आर्थिक लेन-देन हुआ?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या अभय तिवारी से जुड़े रिश्तेदारों के चयन में किसी प्रकार की मदद या अनुचित हस्तक्षेप किया गया?
इन सवालों का जवाब दस्तावेजों, डिजिटल साक्ष्यों, मोबाइल रिकॉर्ड, बैंकिंग लेन-देन, परीक्षा से संबंधित डेटा और संबंधित लोगों से पूछताछ के आधार पर ही मिल सकता है।
होटल और अन्य ठिकानों से जुड़े दावों की भी जांच
अभय तिवारी से जुड़े मामले में कुछ अन्य आरोप भी सामने आए हैं। रिपोर्टों के अनुसार, कथित तौर पर नौकरी में सेटिंग से जुड़े नेटवर्क के लिए एक होटल को लीज पर लेने की बात भी जांच में सामने आई है। CID की कार्रवाई में कुछ दस्तावेज और अन्य सामग्री मिलने का भी दावा किया गया है।
यदि जांच में इन दावों की पुष्टि होती है और इनका संबंध परीक्षा में अनियमितता से स्थापित होता है, तो मामला और गंभीर हो सकता है। लेकिन फिलहाल इन सभी बिंदुओं को जांच के आरोप और दावों के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
JPSC और परीक्षा कराने वाली कंपनी भी जांच के घेरे में
मामले का दायरा सिर्फ अभय तिवारी तक सीमित नहीं बताया जा रहा है। 14वीं JPSC सिविल सेवा परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर JPSC कार्यालय और परीक्षा आयोजित कराने वाली कंपनी TDPL से जुड़े पहलुओं की भी जांच की जा रही है।
रिपोर्टों के अनुसार, CID ने JPSC कार्यालय और परीक्षा एजेंसी से जुड़े स्थानों पर कार्रवाई की है। मामले में परीक्षा प्रक्रिया से जुड़े कई लोगों से पूछताछ और गिरफ्तारियों की बात भी सामने आई है।
पूर्व JPSC अध्यक्ष एल. खियांग्ते की गिरफ्तारी की खबर ने भी इस मामले को और गंभीर बना दिया है। उनके खिलाफ परीक्षा आयोजन के लिए TDPL को काम दिए जाने की प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं और नियमों की अनदेखी से जुड़े आरोपों की जांच की जा रही है।
इससे साफ है कि जांच का फोकस किसी एक व्यक्ति पर नहीं बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली की कार्यप्रणाली पर हो सकता है।
छात्रों की मांग—रिश्तेदारों की नहीं, चयन प्रक्रिया की हो फोरेंसिक जांच
इस पूरे मामले में छात्रों और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों की सबसे बड़ी चिंता यही है कि सरकारी नौकरी की परीक्षा व्यवस्था पर उनका भरोसा बना रहे।
यदि किसी परीक्षा में पेपर लीक, उत्तर में हेरफेर या किसी अभ्यर्थी को अनुचित लाभ पहुंचाने जैसी घटनाएं साबित होती हैं तो इसका सबसे बड़ा नुकसान उन हजारों युवाओं को होता है, जो वर्षों तक तैयारी करने के बाद परीक्षा देते हैं।
यही वजह है कि छात्र मांग कर रहे हैं कि केवल आरोपियों से पूछताछ करने के बजाय पूरी चयन प्रक्रिया का डिजिटल और दस्तावेजी ऑडिट किया जाए। परीक्षा केंद्रों के CCTV फुटेज, प्रश्नपत्रों की आवाजाही, सर्वर लॉग, मोबाइल और डिजिटल कम्युनिकेशन, मेरिट सूची और अभ्यर्थियों के परीक्षा प्रदर्शन जैसे पहलुओं की जांच की जाए।
सबसे बड़ा सवाल: संयोग या किसी बड़े नेटवर्क की कड़ी?
अभय तिवारी के परिवार और रिश्तेदारों से जुड़े लोगों के BSO पद पर चयन का दावा सामने आने के बाद यह मामला निश्चित तौर पर चर्चा में है। लेकिन पत्रकारिता और कानूनी दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि दावे और अपराध सिद्ध होने के बीच जांच और न्यायिक प्रक्रिया का लंबा रास्ता होता है।
यदि जांच में यह साबित होता है कि सभी चयन पूरी तरह पारदर्शी और मेरिट के आधार पर हुए थे, तो केवल रिश्तेदारी के आधार पर लगाए गए संदेहों का कोई कानूनी आधार नहीं रहेगा। दूसरी तरफ, यदि जांच एजेंसी को दस्तावेजी या डिजिटल साक्ष्य मिलते हैं कि किसी अभ्यर्थी को अनुचित लाभ पहुंचाया गया, परीक्षा की गोपनीय जानकारी साझा की गई या पैसे के बदले चयन प्रभावित किया गया, तो यह प्रतियोगी परीक्षा प्रणाली की गंभीर विफलता होगी।
फिलहाल अभय तिवारी से जुड़े आरोप, उसके परिवार के लोगों के चयन के दावे और JSSC-JPSC परीक्षा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की जांच आगे बढ़ रही है। अब सबसे ज्यादा नजर CID की जांच पर है कि वह रिश्तों की इस लंबी कड़ी को महज संयोग मानती है या इसके पीछे किसी संगठित नेटवर्क के सबूत सामने आते हैं।
सरकारी नौकरियों की परीक्षाओं में पारदर्शिता केवल चयनित अभ्यर्थियों के लिए नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं के भविष्य के लिए जरूरी है जो हर साल इन परीक्षाओं में अपना करियर दांव पर लगाते हैं। इसलिए इस मामले में सबसे अहम बात यही होगी कि जांच निष्पक्ष, तथ्य आधारित और सबूतों पर केंद्रित हो और जो भी दोषी साबित हो, उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई की जाए। साथ ही जिन अभ्यर्थियों का चयन पूरी तरह उनकी मेहनत और योग्यता के आधार पर हुआ है, उनके अधिकारों की भी रक्षा होनी चाहिए।
आखिरकार इस पूरे मामले का फैसला पोस्टर, आरोप या सोशल मीडिया की चर्चाओं से नहीं, बल्कि जांच में सामने आने वाले ठोस साक्ष्यों और अदालत के अंतिम निर्णय से ही होगा।
