हरिद्वार, 27 जून 2026: देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, शांतिकुंज हरिद्वार के पावन परिसर में ‘दधीचि अंगदान संकल्प अभियान’ के अंतर्गत एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य आयोजन किया गया। इस ऐतिहासिक विमर्श में केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे.पी. नड्डा और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मुख्य अतिथियों के रूप में शिरकत की। राष्ट्रीय स्तर की इस संगोष्ठी में देश-विस्तार से जुटे प्रख्यात चिकित्सा विशेषज्ञों, समाजशास्त्रियों, आध्यात्मिक विचारकों तथा सैकड़ों साधकों ने अंगदान की महत्ता और इसकी वैज्ञानिक व आध्यात्मिक प्रासंगिकता पर गंभीर मंथन किया। कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण वह क्षण रहा जब शांतिकुंज के आचार्यों द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उपस्थित सैकड़ों राष्ट्र-आराधकों और साधकों को अंगदान का सामूहिक संकल्प दिलाया गया, जिससे पूरा परिसर सामाजिक चेतना की नई ऊर्जा से ओतप्रोत हो उठा।
राष्ट्रीय संगोष्ठी को संबोधित करते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री जे.पी. नड्डा ने अत्यंत सारगर्भित शब्दों में कहा कि अंगदान मानव सेवा का सर्वोच्च और सर्वोत्तम कार्य है। यह एक ऐसा पुनीत माध्यम है, जिसके द्वारा असमय काल के गाल में समा रहे या गंभीर बीमारियों से जूझ रहे जरूरतमंद लोगों को एक नया जीवन और नई मुस्कान प्रदान की जा सकती है। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि वर्तमान समय में अंगदान को केवल एक वैज्ञानिक प्रक्रिया के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसे वैज्ञानिक और आध्यात्मिक दोनों दृष्टियों के समन्वय से समझने की परम आवश्यकता है। जब तक समाज का प्रत्येक नागरिक इसके आध्यात्मिक मूल्य को नहीं समझेगा, तब तक इसे पूर्ण स्वीकार्यता मिलना कठिन है।

स्वास्थ्य क्षेत्र में नीतिगत सुधार और सुदृढ़ संस्थागत ढांचा
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने देश की स्वास्थ्य नीतियों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत सरकार आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में देश की चिकित्सा सेवाओं को अधिक सुलभ, किफायती, प्रभावी और पूरी तरह से जन-केंद्रित बनाने के लिए निरंतर मिशन मोड में कार्य कर रही है। पिछले एक दशक में भारतीय स्वास्थ्य क्षेत्र में संरचनात्मक और नीतिगत स्तर पर व्यापक सुधार हुए हैं। अंगदान एवं अंग प्रत्यारोपण (ट्रांसप्लांटेशन) की संपूर्ण व्यवस्था को पारदर्शी और मजबूत बनाने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक सुदृढ़ संस्थागत ढांचे का विकास किया गया है। केंद्र सरकार अब राज्यों में भी अंगदान से जुड़े क्षेत्रीय संगठनों को सक्रिय और साधन-संपन्न बना रही है, ताकि ग्रामीण स्तर तक इसका लाभ पहुंच सके।
नड्डा ने देश के बदलते परिदृश्य पर संतोष व्यक्त करते हुए साझा किया कि निरंतर जागरूकता अभियानों के सकारात्मक परिणाम अब धरातल पर दिखने लगे हैं। देश में अंगदान करने वाले दाताओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। हालांकि, उन्होंने सचेत करते हुए कहा कि भारत जैसी विशाल आबादी वाले देश में केवल सरकारी प्रयासों से शत-प्रतिशत सफलता संभव नहीं है। इसे समाज के हर वर्ग की सक्रिय जनभागीदारी से एक व्यापक राष्ट्रीय जनआंदोलन का रूप दिया जाना चाहिए। जब गायत्री परिवार और दधीचि देहदान समिति जैसे मंचों के माध्यम से चलाया जा रहा यह अंगदान संकल्प अभियान देश के प्रत्येक नागरिक के संस्कार का हिस्सा बनेगा, तभी हम अंग प्रत्यारोपण के अभाव में होने वाली असमय मौतों को पूरी तरह रोकने में सफल हो सकेंगे।
“मृत्यु के पश्चात भी यदि हमारे नश्वर शरीर का कोई भी अंग किसी तड़पते हुए जरूरतमंद व्यक्ति को नया जीवन दे सकता है, तो इससे बड़ा मानव कल्याण और परमार्थ का कार्य ब्रह्मांड में दूसरा कोई नहीं हो सकता।” — मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी
सनातन संस्कृति में समाहित है त्याग और परमार्थ: मुख्यमंत्री धामी
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने संबोधन में भारतीय ज्ञान परंपरा और सनातन मूल्यों का स्मरण कराया। उन्होंने कहा कि भारत की सनातन संस्कृति सदैव से ही ‘इदम न मम्’ (यह मेरा नहीं है) की भावना, त्याग, समर्पण, निस्वार्थ सेवा और परमार्थ की महान परंपरा पर आधारित रही है। हमारी संस्कृति ने हमें सिखाया है कि परोपकार से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। मुख्यमंत्री ने पौराणिक आख्यानों का संदर्भ देते हुए महर्षि दधीचि के महान त्याग का उदाहरण दिया, जिन्होंने मानवता और धर्म की रक्षा के लिए देवताओं के अनुरोध पर जीवित रहते हुए अपनी अस्थियों तक का सहर्ष दान कर दिया था। उन्हीं की स्मृति को यह अंगदान संकल्प अभियान समर्पित है।
मुख्यमंत्री ने महाभारत कालीन राजा शिवि की कथा का भी उल्लेख किया, जिन्होंने शरणागत एक छोटे से पक्षी (कपोत) के प्राणों की रक्षा के लिए बाज के समक्ष अपने स्वयं के शरीर का मांस तराश कर अर्पित कर दिया था। उन्होंने कहा कि ये गाथाएं कोई साधारण कहानियां नहीं हैं, बल्कि ये भारतीय जनमानस में रची-बसी अगाध करुणा, जीव-दया और परोपकार की उस पराकाष्ठा को दर्शाती हैं जो विश्व में अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलती। इसी गौरवशाली परंपरा को आधुनिक संदर्भों में आगे बढ़ाते हुए आज के युवाओं को इस महा-अभियान से जुड़कर मानवता के संरक्षण में अपनी भूमिका सुनिश्चित करनी चाहिए।

उत्तराखंड में स्वास्थ्य अवसंरचना का आधुनिकीकरण और रोडमैप
राज्य की नीतिगत तैयारियों पर चर्चा करते हुए मुख्यमंत्री धामी ने कहा कि वर्तमान में देश के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लिए ऐतिहासिक कार्य किए जा रहे हैं। आयुष्मान भारत जैसी विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना ने निर्धन परिवारों को गंभीर बीमारियों के इलाज की चिंता से मुक्त किया है। इसी क्रम में उत्तराखंड सरकार भी राज्य के दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों में चिकित्सा ढांचे को सुदृढ़ बनाने के लिए निरंतर कड़े फैसले ले रही है। राज्य में अंगदान और अंग प्रत्यारोपण प्रणाली को सुचारू, त्वरित और प्रभावी बनाने के लिए एक व्यापक रोडमैप तैयार किया जा रहा है।
उन्होंने घोषणा की कि इस संवेदनशील कार्य को गति देने के लिए सरकारी एवं निजी चिकित्सालयों, जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन, परिवहन विभाग तथा सामाजिक संस्थाओं के बीच एक उच्च स्तरीय अंतर-विभागीय समन्वय तंत्र (इंटर-डिपार्टमेंटल कोऑर्डिनेशन) स्थापित किया जा रहा है। इसके अंतर्गत ‘ग्रीन कॉरिडोर’ जैसी आपातकालीन व्यवस्थाओं को और अधिक संस्थागत बनाया जाएगा। मुख्यमंत्री ने महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया कि देहरादून स्थित दून मेडिकल कॉलेज में उत्तराखंड के पहले सरकारी ‘ऊतक प्रत्यारोपण केंद्र’ (टीशू ट्रांसप्लांट सेंटर) के निर्माण का कार्य युद्धस्तर पर चल रहा है। इसके साथ ही विभिन्न जिलों में क्षेत्रीय अंग बैंकों (ऑर्गन बैंक) और जिला स्तरीय अंगदान केंद्रों के एक विस्तृत नेटवर्क को विकसित किया जा रहा है, ताकि आपात स्थिति में किसी भी जरूरतमंद को बिना किसी बाधा के समय पर अंग उपलब्ध हो सकें।
गायत्री परिवार के योगदान और यज्ञीय जीवन पद्धति की सराहना
अपने संबोधन के अंतिम चरण में मुख्यमंत्री ने गायत्री परिवार की शताब्दी कालीन सेवाओं की भूरि-भूरि प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि शांतिकुंज ने पिछले एक सौ वर्षों से संपूर्ण विश्व में आध्यात्मिक चेतना, उच्च नैतिक मूल्यों और सामाजिक जागरूकता के प्रसार के लिए अनुकरणीय कार्य किया है। युगऋषि पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी और माता भगवती देवी शर्मा जी ने विशुद्ध आध्यात्मिक चिंतन और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अत्यंत सरल रूप में जन-जन तक पहुंचाया है। उनका दिया हुआ अमर संदेश “हम बदलेंगे तो युग बदलेगा” और “मनुष्य भटकेगा तो समाज भटकेगा” आज भी समाज में सकारात्मक और क्रांतिकारी परिवर्तन की सबसे बड़ी प्रेरणा है। गायत्री परिवार द्वारा इस अंगदान संकल्प अभियान को अपने हाथों में लेना इस आंदोलन की सफलता की गारंटी है।
कार्यक्रम की गरिमामयी अध्यक्षता करते हुए देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के प्रतिकुलपति डॉ. चिन्मय पण्ड्या ने यज्ञ की महत्ता को नए संदर्भों में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि यज्ञ केवल वेदियों में आहुति देने तक सीमित कोई धार्मिक अनुष्ठान मात्र नहीं है, बल्कि यज्ञ भारतीय संस्कृति का मूल मेरुदण्ड है। यह एक ऐसी उदात्त जीवन पद्धति है जो व्यक्ति के भीतर त्याग, आपसी सहयोग, कर्तव्यबोध और लोकमंगल की भावना को जाग्रत करती है। जब हम समाज के कल्याण के लिए, राष्ट्र की उन्नति के लिए अपने समय, अपनी प्रतिभा, अपने श्रम और अपने संचित संसाधनों का सहर्ष समर्पण करते हैं, तो वही यज्ञ की वास्तविक और व्यावहारिक भावना होती है। आज की संगोष्ठी और यह पवित्र अभियान इसी व्यावहारिक यज्ञ का आधुनिक स्वरूप है।
विद्वानों का मंथन एवं गणमान्य जनों की गरिमामयी उपस्थिति
इससे पूर्व, मुख्य अतिथियों ने दीप प्रज्वलित कर राष्ट्रीय संगोष्ठी का विधिवत शुभारंभ किया। संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में तकनीकी और सामाजिक पहलुओं पर विस्तृत चर्चा हुई। उत्तराखंड के आपदा प्रबंधन मंत्री मदन कौशिक ने आपदाओं के समय अंगदान के कानूनी और प्रशासनिक सुगमीकरण पर विचार रखे। रामकृष्ण मिशन के सचिव स्वामी दयामूर्त्यानंद जी ने अंगदान के प्रति धार्मिक भ्रांतियों को दूर करने पर व्याख्यान दिया। राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन (NOTTO) के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. अनिल कुमार, पद्मश्री नीलेश मांडलेवाला और स्वामी राम हिमालयन विश्वविद्यालय के कुलाधिपति डॉ. विजय धस्माना सहित देश के शीर्ष चिकित्सकों ने अंगदान के वैज्ञानिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक एवं कानूनी पहलुओं पर अपने शोध पत्र और विचार प्रस्तुत किए।
इस गरिमामयी राष्ट्रीय विमर्श के अवसर पर उत्तराखंड के राज्य मंत्री ओमप्रकाश जमदग्नि, एम्स ऋषिकेश की निदेशक प्रो. मीनू सिंह, शासन के वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, स्वास्थ्य महानिदेशालय के प्रतिनिधि, प्रख्यात चिकित्सक, वरिष्ठ पत्रकार, विभिन्न सामाजिक संगठनों के पदाधिकारी, गणमान्य नागरिक तथा देश के कोने-कोने से आए हजारों गायत्री साधक एवं देवसंस्कृति विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। संगोष्ठी के अंत में सभी ने एक स्वर में मानवता के कल्याणार्थ इस महाभियान को गांव-गांव तक पहुंचाने का संकल्प लिया।
