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राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि: कलकत्ता हाईकोर्ट का कड़ा रुख, बंगाल सरकार को 31 मार्च तक BSF को जमीन सौंपने का अल्टीमेटम

The Hill India News
Last updated: January 30, 2026 2:37 am
The Hill India News
Published: January 30, 2026
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कोलकाता: भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से एक ऐतिहासिक और कड़ा फैसला सुनाते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है। अदालत ने कहा है कि राज्य के नौ सीमावर्ती जिलों में बाड़बंदी (Fencing) के लिए अधिग्रहित की गई जमीन को आगामी 31 मार्च तक हर हाल में सीमा सुरक्षा बल (BSF) को सौंप दिया जाए। अदालत ने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मसलों में प्रशासनिक शिथिलता या चुनावी व्यस्तता को बहाना नहीं बनाया जा सकता।

Contents
क्या है पूरा विवाद? सुरक्षा और सीमाओं का गणितPIL और पूर्व सेना अधिकारी की चिंतासुधांशु त्रिवेदी का हमला: “घुसपैठ की राजनीति पर करारा प्रहार”भूमि अधिग्रहण का ‘आपातकालीन प्रावधान’ और अगला कदम

क्या है पूरा विवाद? सुरक्षा और सीमाओं का गणित

भारत और बांग्लादेश के बीच कुल 4,096 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जिसका सबसे बड़ा हिस्सा—लगभग 2,216 किलोमीटर—अकेले पश्चिम बंगाल से होकर गुजरता है। सामरिक दृष्टिकोण से यह हिस्सा बेहद संवेदनशील माना जाता है।

अदालत में पेश किए गए तथ्यों के अनुसार, साल 2016 से अब तक कई कैबिनेट मंजूरियां और केंद्र सरकार द्वारा फंड जारी किए जाने के बावजूद, सीमा का एक बड़ा हिस्सा अब भी बिना बाड़ के है। इस ‘खुली सीमा’ का फायदा उठाकर सीमा पार से घुसपैठ, मवेशी तस्करी, जाली भारतीय मुद्रा (FICN) का प्रसार और नार्कोटिक्स जैसे गंभीर अपराधों को अंजाम दिया जाता है। हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि जब जमीन का अधिग्रहण हो चुका है और केंद्र द्वारा मुआवजा दिया जा चुका है, तो जमीन हस्तांतरण में देरी का कोई कानूनी या नैतिक आधार नहीं बचता।

PIL और पूर्व सेना अधिकारी की चिंता

यह कानूनी लड़ाई एक जनहित याचिका (PIL) के माध्यम से शुरू हुई, जिसे भारतीय सेना के एक सेवानिवृत्त अधिकारी ने दायर किया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि राज्य सरकार की टालमटोल वाली नीति के कारण सीमा सुरक्षा ग्रिड (Border Security Grid) में कई बड़े छेद (Gaps) रह गए हैं। BSF चाहकर भी उन क्षेत्रों में बाड़ नहीं लगा पा रही है जहाँ जमीन का कब्जा उसे नहीं मिला है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य सरकार के उन तर्कों को सिरे से खारिज कर दिया, जिनमें वोटर लिस्ट रिवीजन और आगामी प्रशासनिक कार्यों का हवाला देकर समय मांगा गया था। कोर्ट ने कहा, “चुनाव और प्रशासनिक कार्य अपनी जगह हैं, लेकिन राष्ट्र की अखंडता और सुरक्षा से समझौता करने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती।”

सुधांशु त्रिवेदी का हमला: “घुसपैठ की राजनीति पर करारा प्रहार”

अदालत के इस फैसले ने पश्चिम बंगाल की सियासत में भी उबाल ला दिया है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने इस फैसले का स्वागत करते हुए तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार पर तीखा हमला बोला।

नई दिल्ली में पत्रकारों से बात करते हुए त्रिवेदी ने कहा, “यह फैसला केवल एक अदालती आदेश नहीं है, बल्कि यह उन ताकतों को करारा जवाब है जो वोट बैंक की राजनीति के लिए देश की सुरक्षा को दांव पर लगाते रहे हैं। बंगाल सरकार जानबूझकर जमीन हस्तांतरण में देरी कर रही थी ताकि घुसपैठियों के लिए गलियारा खुला रहे।“ उन्होंने आगे दावा किया कि बंगाल की जनता अब ऐसी सरकार को बर्दाश्त नहीं करेगी जो सीमा सुरक्षा में बाधक बनती हो।

भूमि अधिग्रहण का ‘आपातकालीन प्रावधान’ और अगला कदम

अदालत ने केवल समय सीमा ही तय नहीं की है, बल्कि भविष्य के लिए एक मिसाल पेश करने की भी कोशिश की है। हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से पूछा है कि क्या भविष्य में ऐसे संवेदनशील प्रोजेक्ट्स के लिए Land Acquisition Act के तहत ‘आपातकालीन प्रावधानों’ (Urgency Clause) का उपयोग किया जा सकता है, ताकि वर्षों तक फाइलें न लटकी रहें।

अदालत द्वारा उठाए गए मुख्य बिंदु:

  • नौ जिलों का कवरेज: उत्तर और दक्षिण 24 परगना, नदिया, मुर्शिदाबाद, मालदा सहित अन्य सीमावर्ती जिलों में बाड़बंदी का काम पूरा करना अनिवार्य।

  • राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोच्च: किसी भी राज्य का आंतरिक मामला राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रोटोकॉल को ओवरराइड नहीं कर सकता।

  • समयबद्ध रिपोर्ट: 31 मार्च की डेडलाइन के बाद, अगली सुनवाई 2 अप्रैल 2026 को होगी, जिसमें अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) जमा करनी होगी।

पश्चिम बंगाल में भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़बंदी का काम पूरा होना केवल तस्करी रोकने के लिए ही नहीं, बल्कि आतंकवाद और अवैध अप्रवास पर लगाम लगाने के लिए भी आवश्यक है। कलकत्ता हाईकोर्ट का यह हस्तक्षेप केंद्र-राज्य संबंधों और सुरक्षा प्रोटोकॉल के बीच एक नया संतुलन पैदा करेगा। अब सभी की निगाहें राज्य सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं कि क्या वह 31 मार्च की समय सीमा का पालन करती है या इस मामले में कानूनी पेच फंसाने की कोशिश जारी रहती है।

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