
नैनीताल/हरिद्वार: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने एक बार फिर व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) और अपनी मर्जी से जीवन जीने के अधिकार को सर्वोपरि माना है। माननीय न्यायालय ने हरिद्वार के एक प्रेमी जोड़े की याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यदि दो वयस्क आपसी सहमति से साथ रहना चाहते हैं, तो न तो समाज और न ही परिवार उनके अधिकारों का हनन कर सकता है। न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ ने मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस को सुरक्षा प्रदान करने के आदेश जारी किए हैं।
क्या है हरिद्वार का यह प्रेम प्रसंग?
पूरा मामला हरिद्वार जिले के पथरी थाना क्षेत्र से जुड़ा है। यहाँ के रहने वाले एक युवक और युवती ने उच्च न्यायालय की शरण ली थी। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, वे दोनों एक ही धर्म के हैं और लंबे समय से एक-दूसरे के साथ प्रेम संबंध में हैं। दोनों ने परिपक्वता का परिचय देते हुए जल्द ही विवाह के बंधन में बंधने का निर्णय लिया है।
हालांकि, समाज के रूढ़िवादी ढांचे और पारिवारिक विरोध के कारण उनके इस निर्णय में बाधा उत्पन्न हो गई। युवती के परिजनों ने इस रिश्ते को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और जोड़े पर अलग होने का दबाव बनाने लगे।
परिजनों से जान का खतरा और कोर्ट में गुहार
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि उनके परिवार वाले न केवल इस रिश्ते के खिलाफ हैं, बल्कि उन्हें जान से मारने की धमकियां भी दे रहे हैं। याचिका में आरोप लगाया गया कि उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता में अवैध रूप से हस्तक्षेप किया जा रहा है और वे डर के साये में जीने को मजबूर हैं।
सुनवाई के दौरान प्रेमी जोड़ा व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश हुआ। न्यायालय ने सबसे पहले उनकी पहचान की पुष्टि की और उनकी उम्र से संबंधित दस्तावेजों की जांच की। कोर्ट ने पाया कि दोनों ही कानूनी रूप से बालिग (Adult) हैं और बिना किसी दबाव या जबरदस्ती के, स्वेच्छा से एक साथ रहने का निर्णय ले चुके हैं।
संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा: ‘लता सिंह’ केस का हवाला
न्यायमूर्ति आलोक मेहरा ने मामले की सुनवाई करते हुए ऐतिहासिक ‘लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लेख किया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है।
अदालत ने सख्त लहजे में कहा कि जब दो वयस्क स्वेच्छा से साथ रहने का फैसला करते हैं, तो किसी भी तीसरे पक्ष (चाहे वे माता-पिता ही क्यों न हों) को उनके जीवन में व्यवधान डालने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
हाईकोर्ट का पुलिस को कड़ा आदेश
न्यायालय ने हरिद्वार जिले के पथरी थानाध्यक्ष को तत्काल प्रभाव से निर्देश जारी किए हैं:
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तत्काल सुरक्षा: याचिकाकर्ताओं को उनकी आवश्यकतानुसार उचित सुरक्षा प्रदान की जाए ताकि उनके जीवन को कोई खतरा न हो।
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काउंसलिंग और हिदायत: विरोध कर रहे परिजनों को थाने बुलाकर कानून के दायरे में रहने की सख्त हिदायत दी जाए।
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कानूनी कार्रवाई: यदि परिवार की ओर से किसी भी प्रकार का उत्पीड़न या हिंसा की जाती है, तो पुलिस को उनके खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा गया है।
व्यक्तिगत स्वायत्तता की जीत
उत्तराखंड हाईकोर्ट का यह फैसला उन लोगों के लिए एक नजीर है जो आज भी परिवार के नाम पर युवाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का दमन करना चाहते हैं। यह आदेश न केवल एक जोड़े की जान बचाने वाला है, बल्कि समाज को यह संदेश भी देता है कि कानून की नजर में ‘सहमति’ और ‘संवैधानिक अधिकार’ सर्वोपरि हैं।



